समीक्षा ३२
डॉ अंजना मुवेल की "शब्दवट" में पृष्ठ ४४ पर प्रकाशित एक संतृप्त कविता "बंधन" :--
कवियित्री झाबुआ जिले की आंचलिक क्षेत्र की साहित्य सेविका हैं। शासकीय महाविद्यालय झाबुआ में हिंदी की विभागाध्यक्ष डॉ अंजना मुवेल हिंदी लेखन का एक सशक्त हस्ताक्षर है। आपका कहानी संग्रह "चील गाड़ी प्रकाशित है।
"बंधन"
बंधन कोई
स्वीकार नहीं मुझे
बेड़ियां कभी
मंजूर नहीं मुझे
जंजीरे कोई
आज तक
बांध न पाई मुझे
"लेकिन
बना है सागर
जब से तू
नदी की तरह
तटबंध में
बही जा रही हूं मैं"
डॉ अंजना मुवेल
🌹🌷🌹🌷🌹🌷
मेरी नजर में
"बंधन कोई
स्वीकार नहीं मुझे"
"बेड़ियां कभी
मंजूर नहीं मुझे"
"जंजीरे कोई
आज तक
बांध न पाई मुझे"
एक बारीक सी लकीर देख रहे हो न वह नदी का उद्गम स्थल है। समय और दूरी के साथ यही धार एक नदी बनती चली गई। गति, विस्तार और प्रवाह ही इसके अवचेतन में पैठ गया। यदि इसे रोका गया तो इसकी संज्ञा बदल जाएगी। तब यह नदी की अपनी अस्मिता खो देगी। जैसे चम्बल चली थी जानापाव से फिर पूरे पथ पर बनी रही वह चम्बल ही। चलते चलते बाँध लिया गया उसे तो चम्बल चम्बल नही रही वह बाँध के स्वरूप में रूपान्तरित हो गई। एक युगों पुराना नाम गुम हो गया। लोगों ने नाम नया रख दिया "गाँधी सागर बाँध"। अब नहरों में बहता है इसका ही पानी और वे नहरें भी गाँधी सागर की हो गई। उसका पानी तो वही रहा पर उसका नाम और पहिचान कहीं पीछे छूट गई। पानी तो पहले भी परमार्थ में लगा रहता था वही अब भी लगा हुआ है। बन्धन के बाद नदी का नाम खो गया। इसलिये बन्धन नदी को स्वीकार नहीं। यह बंधन परकीय बंधन है। उसके अपने बन्धन नहीं है ये। जिस दिन ये बेड़ियाँ टूटेंगी मैं फिर नदी हो जाऊँगी। नाम भी मेरा अपना लौट आवेगा मैं फिर बहूँगीं अपनी मूल छबि में। मुझे बेड़ियाँ स्वीकार नहीं। मैं स्त्री हूँ, नारी हूँ। सभी ध्यान से सुनो! यह नदी मैं ही हूँ।
कुछ वर्जनाएँ सामाजिक होंगी पर वे बेड़ियाँ नहीं तटों की तरह मेरे नैसर्गिक बन्धन हैं। तटबन्ध तो असल में मेरे बन्धन नहीं मेरी अपनी स्वानुशासी सीमा रेखाएँ हैं।
(मेरी कविता "जीवन सरिता" से)
"जीवन की सरिता
सरिता के तटबन्ध
तटबन्धों पर सटे सुहाने घाट
घाट साक्षी है जीवन प्रवाह के
साक्षी है धार के,
गुजरते पानी के,
चढ़ते उफान के,
झरते प्रपात के,
और जल की शीतलता के,
निर्मलता के, सहजता के"
कविता कहती है
रास्ते में पड़ने वाले अवरोध मेरी जंजीरें नहीं है क्योंकि वे मेरा मार्ग परिवर्तित तो कर सकती हैं पर मुझे रोकती नहीं हैं। मैं स्त्री हूँ मुझे अवरोध बाँधते नहीं अपितु जीवन के विकल्पों का मार्ग प्रशस्त करते हैं।
कविता उपसंहार में अपना उद्देश्य स्पष्ट कर देती है। यहाँ यह भी स्पष्ट हो जाता है कि नदी का उपमेय क्यो लिया गया।
"लेकिन
बना है सागर
जब से तू
नदी की तरह
तटबंध में
बही जा रही हूं मैं"
मेरी नजर में कविता त्रिआयामी हैं। पहला आयाम प्रेमी और प्रेमिका का है। जिसका अविरल, निश्च्छल प्रेम उसे अपने प्रियतम तक पहुँचने को अपना निश्चय प्रकट करता है। दूसरा एक स्त्री-पुरुष का नैसर्गिक सम्बन्ध सिद्ध करती है परन्तु उसका सागर की तरफ बहना समर्पण के भाव को पुष्ट करता है।
तीसरा आयाम विशुद्ध अध्यात्म है। सरिता में जल है, सागर में भी जल है
मेरी कविता भी अंजना जी की तरह कहती है--
सुनो!
सरिता में बहता हूँ/जल का मैं कण हूँ, /आत्मा हूँ इसकी/यहाँ भी मैं - वहाँ भी मैं/मैंने तट देखे, तट बन्ध देखे/श्वासों के अनुबन्ध देखे/उतार/देखे, चढ़ाव देखे
मेरी खोज सागर है/हाँ, मै ही बहता हूँ उस ओर/राह में कहीं प्रपात हूँ/कहीं धार हूँ/पर मैं/जल का कण हूँ/हाँ मैं ही हूँ/न जीता हूँ , न मरता हूँ/यहाँ भी हूँ - वहाँ भी हूँ
डॉ अंजना जी की कविता में शब्द की तीनों शक्तियाँ सम्पक् रूप से प्रयुक्त हुई है इसके साथ ही भाव की आंतरिक और बाह्य शक्ति का कुशलता पूर्वक उपयोग हुआ है। नदी का आलम्बन ले कर तीनों आयामों का स्वतः अनुदर्शन स्पष्ट देखा जा सकता है। एक बारगी देखने से कविता लघु कविता लगती है लेकिन अर्थों में सम्पृक्त है। भावों से अमीर है। सहज सरल शब्दों के कारण कविता प्राकृत-माधुर्य से ओतप्रोत है। कविता के केन्द्र में नारी की उन्मुक्त छबि और प्रेम-पूर्णता का सौंदर्य प्रशंसनीय है।
रामनारायण सोनी
२८.०२.२०२०