हिन्दी कविता की समीक्षाएं

Friday, 28 February 2020

समीक्षा ३४

समीक्षा ३२

डॉ अंजना मुवेल की "शब्दवट" में पृष्ठ ४४ पर प्रकाशित एक संतृप्त कविता "बंधन" :--
कवियित्री झाबुआ जिले की आंचलिक क्षेत्र की साहित्य सेविका हैं। शासकीय महाविद्यालय झाबुआ में हिंदी की विभागाध्यक्ष डॉ अंजना मुवेल हिंदी लेखन का एक सशक्त हस्ताक्षर है। आपका कहानी संग्रह "चील गाड़ी प्रकाशित है।

  "बंधन"
बंधन कोई
स्वीकार नहीं मुझे
बेड़ियां कभी
मंजूर नहीं मुझे
जंजीरे कोई
आज तक
बांध न पाई मुझे
"लेकिन
बना है सागर
जब से तू
नदी की तरह
तटबंध में
बही जा रही हूं मैं"

डॉ अंजना मुवेल

🌹🌷🌹🌷🌹🌷

मेरी नजर में

"बंधन कोई
स्वीकार नहीं मुझे"

"बेड़ियां कभी
मंजूर नहीं मुझे"

"जंजीरे कोई
आज तक
बांध न पाई मुझे"

एक बारीक सी लकीर देख रहे हो न वह नदी का उद्गम स्थल है। समय और दूरी के साथ यही धार एक नदी बनती चली गई। गति, विस्तार और प्रवाह ही इसके अवचेतन में पैठ गया। यदि इसे रोका गया तो इसकी संज्ञा बदल जाएगी। तब यह नदी की अपनी अस्मिता खो देगी। जैसे चम्बल चली थी जानापाव से फिर पूरे पथ पर बनी रही वह चम्बल ही। चलते चलते बाँध लिया गया उसे तो चम्बल चम्बल नही रही वह बाँध के स्वरूप में रूपान्तरित हो गई। एक युगों पुराना नाम गुम हो गया। लोगों ने नाम नया रख दिया "गाँधी सागर बाँध"। अब नहरों में बहता है इसका ही पानी और वे नहरें भी गाँधी सागर की हो गई। उसका पानी तो वही रहा पर उसका नाम और पहिचान कहीं पीछे छूट गई। पानी तो पहले भी परमार्थ में लगा रहता था वही अब भी लगा हुआ है। बन्धन के बाद नदी का नाम खो गया। इसलिये बन्धन नदी को स्वीकार नहीं। यह बंधन परकीय बंधन है। उसके अपने बन्धन नहीं है ये। जिस दिन ये बेड़ियाँ टूटेंगी मैं फिर नदी हो जाऊँगी। नाम भी मेरा अपना लौट आवेगा मैं फिर बहूँगीं अपनी मूल छबि में। मुझे बेड़ियाँ स्वीकार नहीं। मैं स्त्री हूँ, नारी हूँ। सभी ध्यान से सुनो! यह नदी मैं ही हूँ।
कुछ वर्जनाएँ सामाजिक होंगी पर वे बेड़ियाँ नहीं तटों की तरह मेरे नैसर्गिक बन्धन हैं। तटबन्ध तो असल में मेरे बन्धन नहीं मेरी अपनी स्वानुशासी सीमा रेखाएँ हैं।

(मेरी कविता "जीवन सरिता" से)
"जीवन की सरिता
सरिता के तटबन्ध
तटबन्धों पर सटे सुहाने घाट
घाट साक्षी है जीवन प्रवाह के
साक्षी है धार के, 
गुजरते पानी के,
चढ़ते उफान के, 
झरते प्रपात के,
और जल की शीतलता के,
निर्मलता के, सहजता के"
कविता कहती है
रास्ते में पड़ने वाले अवरोध मेरी जंजीरें नहीं है क्योंकि वे मेरा मार्ग परिवर्तित तो कर सकती हैं पर मुझे रोकती नहीं हैं। मैं स्त्री हूँ मुझे अवरोध बाँधते नहीं अपितु जीवन के विकल्पों का मार्ग प्रशस्त करते हैं।
कविता उपसंहार में अपना उद्देश्य स्पष्ट कर देती है। यहाँ यह भी स्पष्ट हो जाता है कि नदी का उपमेय क्यो लिया गया।
"लेकिन
बना है सागर
जब से तू
नदी की तरह
तटबंध में
बही जा रही हूं मैं"
मेरी नजर में कविता त्रिआयामी हैं। पहला आयाम प्रेमी और प्रेमिका का है। जिसका अविरल, निश्च्छल प्रेम उसे अपने प्रियतम तक पहुँचने को अपना निश्चय प्रकट करता है। दूसरा एक स्त्री-पुरुष का नैसर्गिक सम्बन्ध सिद्ध करती है परन्तु उसका सागर की तरफ बहना समर्पण के भाव को पुष्ट करता है।
तीसरा आयाम विशुद्ध अध्यात्म है। सरिता में जल है, सागर में भी जल है
मेरी कविता भी अंजना जी की तरह कहती है--
सुनो!
सरिता में बहता हूँ/जल का मैं कण हूँ, /आत्मा हूँ इसकी/यहाँ भी मैं - वहाँ भी मैं/मैंने तट देखे, तट बन्ध देखे/श्वासों के अनुबन्ध देखे/उतार/देखे, चढ़ाव देखे
मेरी खोज सागर है/हाँ, मै ही बहता हूँ उस ओर/राह में कहीं प्रपात हूँ/कहीं धार हूँ/पर मैं/जल का कण हूँ/हाँ मैं ही हूँ/न जीता हूँ , न मरता हूँ/यहाँ भी हूँ  - वहाँ भी हूँ

डॉ अंजना जी की कविता में शब्द की तीनों शक्तियाँ सम्पक् रूप से प्रयुक्त हुई है इसके साथ ही भाव की आंतरिक और बाह्य शक्ति का कुशलता पूर्वक उपयोग हुआ है। नदी का आलम्बन ले कर तीनों आयामों का स्वतः अनुदर्शन स्पष्ट देखा जा सकता है। एक बारगी देखने से कविता लघु कविता लगती है लेकिन अर्थों में सम्पृक्त है। भावों से अमीर है। सहज सरल शब्दों के कारण कविता प्राकृत-माधुर्य से ओतप्रोत है। कविता के केन्द्र में नारी की उन्मुक्त छबि और प्रेम-पूर्णता का सौंदर्य प्रशंसनीय है।

रामनारायण सोनी
२८.०२.२०२०



Monday, 24 February 2020

समीक्षा ३२

समीक्षा २८

श्रृंगार रस की एक छोटी सी पर बड़ी कविता ; एक लब्धप्रतिष्ठित मूर्धन्य, बहुमुखी साहित्यकार  "वेद हिमांशु" की।
शिक्षा : एम ए (हिंदी साहित्य) 
प्रकाशित कृतियां ; स्याह हाशिए, नवीन धारा, फैक्ट्स के विरुद्ध।
सम्मान : भारत गौरव, साहित्य मनीषी, आचार्य-रत्न आदि।
विशेष : अमेरिका से प्रकाशित परिचय ग्रंथ "हूँ इज हूँ" में विश्व की प्रमुख 268 विशिष्ट विभूतियों में शामिल। 
अभिरुचि : कविता लेखन, लघुकथा, कहानी, व्यंग्य, समीक्षा रिपोर्ताज। 
प्रसारण : बीबीसी लंदन, दूरदर्शन, आकाशवाणी आदि से। 
प्रकाशन : धर्मयुग, हिंदुस्तान, कादंबिनी, वीणा, धर्मयुद्ध में। 
शिखर वार्ता : साहित्य गुंजन आदि

💎💎💎💎💎💎
"काव्य सुरभि" साझा प्रकाशन से :

"फूल छूना मना है"

"कभी-कभी 
कोई चिर परिचित चेहरा 
बहुत अजनबी लगता  
जैसे पहली बार देखा हो
निहायत भोला और मासूम 
मन करता है कि हथेलियों में 
लेकर, 
नेह से सहला दें,
और चन्द मधुर स्मृतियाँ 
अंकित कर दें, 
पलकों की चंचल तितलियों पर 
किन्तु वर्जनाओं की मौजूदगी 
वहां तक है 
जहां हवा भी नहीं जा सकती 
भला कहो तो- 
ऐसा कहां लिखा है कि 
फूल छूना मना है।"

वेद हिमांशु
🌹🌷🌹🌷🌹🌷

मेरी नजर में

कोई कहे कि टोपी पहन का "बुर्ज खलीफ़ा" का वर्णन करो तो टोपी गिरना तय है। सारा साहस बटोर कर यह साहस कर रहा हूँ।
संस्कृत में कहा गया है कि "रसात्मकम् वाक्यम् काव्यम्" अर्थात् रसयुक्त वाक्य ही काव्य है।
रस अन्त:करण की वह शक्ति है, जिसके कारण इन्द्रियाँ अपना कार्य करती हैं, मन कल्पना करता है, सपनों की स्मृति रहती है रस आनंद रूप है और यही आनंद विराट का अनुभव भी है। यही आनन्द अन्य सभी अनुभवों का अतिक्रमण भी है। 
श्रृंगार रस का स्थायी भाव है रति अथवा प्रीति है। इसके अभाव में जीवन की कल्पना व्यर्थ है।
श्रृंगार रस को रसराज या रसपति कहा गया है। नायक और नायिका के मन में संस्कार रूप में स्थित रति या प्रेम जब रस की अवस्था को पहुँचकर आस्वादन के योग्य हो जाता है तो वह 'श्रृंगार रस' कहलाता है। यह परिभाषा हिन्दी साहित्य के व्याकरण में थ्योरी की तरह लिखी है पर इस छोटी सी कविता में प्रेक्टीकल के रूप में लिखी है। यह प्रेक्टीकल साक्षात् जीवन की प्रयोगशाला का है। चौंकियो मत। यहाँ संपूर्ण कविता "वर्जनाओं की मौजूदगी" में अपनी परिधियों में चलती है और वहाँ पहुचती है जहाँ खुले आकाश और स्वच्छन्दताओं में भी शायद नहीं पहुँच पाते। वर्जनाएँ ऐसी है कि वे प्रदर्शन पर तो प्रतिबन्ध लगाती है पर आनन्द और आह्लाद के विस्तीर्ण प्राङ्गण में अनुभूति के शिखर तक ले जाती है। इन वर्जनाओं के चलते मुझे समीक्षा में भी प्रतिबन्धों का परिपालन करना है वस्तुतः संकेतों और रूपकों का ही आश्रय लेना होगा। 
किसी जमाने में साहिर लुधियानवी का एक गीत बड़ा प्रसिद्ध हुआ था: 
"चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएँ हम दोनों।"
"न मेरे दिल की धड़कन लड़खड़ाये
मेरी बातों में
न ज़ाहिर हो तुम्हारी
कश्मकश का राज़ नज़रों से"
यहाँ भी वही वर्जनाएँ आ कर खड़ी हो गई। प्रदर्शन नहीं अनुभूति की ऊँचाइयाँ मौजूद हैं। परन्तु कवि और शायर इतने चतुर होते हैं कि वे "नहीं" के माध्यम से "वही" कह देते हैं जो कहना चाहते है। डोली में बैठी दुल्हन के चारों तरफ पर्दे होते हैं पर शायर दुल्हन का श्रृंगार और "भावसंसार" ज्यों का त्यों वर्णन कर देता है। वास्तव में स्वप्नों के धरातल वास्तविकता से भी अधिक विलक्षण और अद्भुत होते है। वेद हिमांशु जी ने भी इस कृति में यह प्रयोग बड़ी चतुराई से किया है। उनका यह कमाल ही उनका कलाम है। कविता का नायक चिर परिचित चेहरे को नित नवल ही रखना चाहता है क्योंकि शायद वह उस प्रथम दर्शन की उन अलौकिक अनुभूतियों को विस्मृत नहीं करना चाहता। "नेह" शब्द संस्कृत के स्नेह का तद्भव है जो मृदुलता का आभास देता है इसीलिये प्रेम का स्नेह पर्याय है। नायक इन्ही संकेतों में नायिका की मृदुलता से स्पर्श कर गया और वर्जनाओं का परिपालन हो गया। कविता का शीर्षक है "फूल छूना मना है। बचपन में कहीं गाँधी जी का कोटेशन पढ़ा था - सुन्दरता निहारते हैं, छूते नहीं। शायद नायक ने इस थ्योरी को पढ़ लिया होगा लेकिन यह कथ्य उस व्यावहारिक कथन तक निभ नहीं पाया और नायक बड़ी सहजता में प्रश्न करता है - "ऐसा कहाँ लिखा है कि फूल छूना मना है।" वह जानता है कि इस प्रश्न का उत्तर उसके हक में है। कवि वर्जना की परिधी तो तय करता है पर वहाँ पहुँच जाता है जहाँ हवा भी नहीं पहुँचती।
 बहुत सरल है उपदेश लिखना पर सबसे कठिन है श्रृंगार लिखना। प्रेम अर्थात् प्रीति श्रृंगार का स्थाई भाव है। प्रेम गूँगे का गुड़ है। मीठा होना तो समझा दोगे पर मीठा कैसा होता है नही समझा सकोगे। फिर ऐसे श्रृंगार की प्रस्तुतियाँ स्तुत्य है जिसे हर उम्र के लोग वर्जनाओं की सीमाओं में रह कर पढ़ और समझ सके और अनुभूतियों के सागर में डूब सके। प्रेम के बिना मनुष्य का हृदय मरूस्थल है और जीवन जड़वत् है। प्रेम धरती पर जीव के पहले आया है। प्रेम का न कोई धर्म है न प्रणति। कोई इसे स्वीकारे या नकारे प्रेम के स्वरूपों में एक पावन स्वरूप वह है जो इस सृष्टि के क्रम को कायम करता है। प्रेम प्रकृति का अक्षुण्ण और शाश्वत विनियमन है। सहज आकर्षण इसका मूल स्वभाव है। शायद इसलिये भी वर्जनाएँ अत्यन्त अनिवार्य है। इस एक शब्द ने इस कविता को अग्रिम पंक्ति में खड़ा कर दिया है। मैं तो बच्चोँ से भी यही कहूँगा कि हिन्दी व्याकरण के अध्ययन में श्रृंगार के लिये इस प्रकार की कविताओं को उदाहरण के रूप में प्रयोग करें।

     रामनारायण सोनी
    २०-०१-२०२०

समीक्षा ३३

समीक्षा २९
एक कविता डॉ सीमा शाहजी की। वे मेघनगर महाविद्यालय में हिन्दी की प्राध्यापक हैं। राष्द्रीय स्तर की लेखिका, कवियित्री हैं।

"माँ तुम क्यों नही बोली"

निर्ममता से जीवन
खत्म करने के कंस भाव
मेरी गर्दन के आसपास डोले
चीखी-डरी-सहमी
नाल के इर्द गिर्द लिपट गई
सिसक सिसक कर टूट गया
नन्हा मासुम प्राणो का स्पंदन
ना दरकी माॅ तुम्हारी छाती

आॅखो से नही अश्रुदल बोले
रंगा खुन से हाथ देख
नही किया तुमने कोई क्र्रंदन
मै तुम्हारी ही छाया थी
खुद ने ही खुद को छला
अपनी ही अंश कृति को
फाँसी पर चढा
तुम्हारा मन
बचाने को क्यो नही डोला
माॅ !
तुम क्यो नही बोली
क्या तुमने भी ओढ लिया
एक अदद बेटे की चाह का चोला
डॉ सीमा शाहजी
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मेरी नजर में

नारी की विविधता को दो रूपों मे देखा जा सकता है 
१, भावनामयी, स्नेह-ममतायुक्त समर्पणमयी नारी यह नारी का आदिम स्वरूप है। यह गुण समस्त जीवधारियों में जन्मदात्री माँ के रूप में देखी जा सकती है।
२. बुद्धि-प्रधान तर्कमयी विचारशीला नारी कामायनी की श्रद्धा और इड़ा इन रूपों का प्रतिनिधित्व करती हैं। यह स्वरूप नारी का अर्पित और तापसमय स्वरूप है।
इन दोनो के समन्वय से ही जीवन को पूर्णता की उपलब्धि होती है। 'नारी तुम केवल श्रद्धा हो' कह कर प्रसाद ने उसे श्रद्धा अर्पित की है। 
कहते हैं- "यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।" लेकिन तन के अतिक्रमण से परे जा कर द्युतिमान मनोमय जीवन की संकल्पना ही नारी को सुरक्षा और सम्मान दिला सकती है। 
कविता एक प्रश्न से प्रारम्भ होती है। "माँ तुम क्यों नही बोली?" यह प्रश्न उस अजन्मी बालिका का है जो अभी गर्भनाल से जीवन का रस पी रही है। कविता की भावभूमि पर जाना है तो विचार करना होगा कि यह वह क्षण है जब यह ब्रह्ममय जीव एक असहाय निरीह, निराशी होते हुए मृत्यु के वीभत्स द्वार पर खड़ा है। मेरी नजर में यह प्रश्न केवल माँ से नहीं वरन् पिता और सम्पूर्ण मानवता से किया जाना चाहिये। पिता तुम क्यों बोले/नहीं बोले? समाज का कोई भी व्यक्ति क्यों नहीं बोला?
माँ के भीतर स्वयं एक द्वन्द्व युद्ध चल रहा है। अपने मातृत्व और बेटियों के संसार में वर्तमान स्थिति देख कर। बेटी जन्म लेगी तो क्या क्या समस्याएँ पैदा हो जाएँगी। 
देश भर में सबसे ज्यादा महिला उत्पीड़न, यौन- शोषण, दहेज प्रताड़ना, जैसी कई घटानाओं से समाचार पत्र अटे पड़े हैं। कानून की कमजोरियों और लगने वाली देरी से लड़की के अभिभावक भयभीत हैं। हमारे राष्ट्रपति ने इस बात पर अफसोस जताया था कि लड़कियाें को लडक़ाें के समान महत्व नहीं मिलता। लडक़ा-लडक़ी में भेदभाव हमारे जीवनमूल्याें में आई खामियाें को दर्शाता है। 
राष्ट्रकवि मैथिलीशरणजी की पंक्तियाँ गौतम बुद्ध पर सही बैठती हैं जो समाज के दोहरे मानदंडों की ओर भी इंगित करती हैं - 
'नर-कृत शास्त्रों के सब बंधन हैं नारी को ले कर।
अपने लिये सभी सुविधाएं पहले ही से कर बैठे नर।
और..
'दो-दो कौर अन्न पा लेंगी और धोतियाँ चार।
नारी तेरा मूल्य यही तो रखता है संसार।।
उसकी निरीह अवस्था का मार्मिक चित्रण गुप्त जी के काव्य में हुआ है। 
उपनिषद् कहता है प्राणी का प्रथम अवतरण आदमी के गर्भजल में होता है और वह पोषण के लिये स्त्री में स्थानन्तरित होता है। इसलिये पिता के आह्वान के बगैर यह संभव नहीं है। इसलिये बालिका का प्रश्न पिता को भी जाना चाहिये। 
क्या तुमने भी ओढ लिया
एक अदद बेटे की चाह का चोला ?
मातृत्व इतना हेय कभी हो नहीं सकता कि वह सन्तति का स्वयं गला घोंट दे। जहाँ कविता पूर्ण होती है वहाँ फिर एक प्रश्न है कि क्या माँ की इच्छा भी यही है कि उसे बेटी नहीं बेटा चाहिये। दबी जुबान प्रथम प्रश्न का यही उत्तर है। लेकिन एक "भी" शब्द आने से यह उत्तर स्पष्ट करता है कि माँ नहीं चाहती कि बेटी उसे अस्वीकार है। तात्पर्य यह कि या तो पिता, या परिवार अथवा समाज में दबाव पूर्ण बनी स्थिति इस गर्भस्थ बालिका का निर्मम अन्त कर देना चाहती है। कंस और रावण को पौराणिककाल से चरमश्रेणी के आततायी समझे जाते हैं। कंस तो बच्चे को जन्मने के बाद मारता था पर भ्रूण हत्या तो ब्रह्म-हत्या की श्रेणी में हो कर साधारण हत्या से भी जघन्य है। इस अपराध का जिम्मेदार किसे माना जाय? क्या केवल माँ? क्या पिता भी? या सम्पूर्ण विकासशील/पतनोन्मुखी मानव जाति? 
कविता ने ये प्रश्न केवल माँ के लिये नहीं छोड़े हैं बल्कि उन सभी से हैं जो बेटी नहीं बेटा चाहते हों चाहे वह पिता हो, परिवार हो, स्वयं मातृशक्ति हो या पारम्परिक रूढ़ीगत सामाजिक ढाँचा हो। एक विभषिका और मुह बाए खड़ी है कि गिरते स्त्री-पुरुष अनुपात प्रकृति से सीधी छेड़छाड़ है जो अराजकता फैला देगी। 

रामनारायण सोनी
२३.०२.२०२०

Wednesday, 19 February 2020

समीक्षा ३१

समीक्षा २८

श्रृंगार रस की एक छोटी सी बड़ी कविता ; एक लब्धप्रतिष्ठित मूर्धन्य, बहुमुखी साहित्यकार  "वेद हिमांशु" की।
शिक्षा : एम ए (हिंदी साहित्य) 
प्रकाशित कृतियां ; स्याह हाशिए, नवीन धारा, फैक्ट्स के विरुद्ध।
सम्मान : भारत गौरव, साहित्य मनीषी, आचार्य-रत्न आदि।
विशेष : अमेरिका से परिचय ग्रंथ "हूँ इज हूँ" में विश्व की प्रमुख 268 विशिष्ट विभूतियों में शामिल। 
अभिरुचि : कविता लेखन, लघुकथा, कहानी, व्यंग्य, समीक्षा रिपोर्ताज। 
प्रसारण : बीबीसी लंदन, दूरदर्शन, आकाशवाणी आदि से। 
प्रकाशन : धर्मयुग, हिंदुस्तान, कादंबिनी, वीणा, धर्मयुद्ध में। 
शिखर वार्ता : साहित्य गुंजन आदि

"फूल छूना मना है"

कभी-कभी 
कोई चिर परिचित चेहरा 
बहुत अजनबी लगता  
जैसे पहली बार देखा हो
निहायत भोला और मासूम 
मन करता है कि हथेलियों में 
लेकर, 
नेह से सहला दें,
और चन्द मधुर स्मृतियाँ 
अंकित कर दें, 
पलकों की चंचल तितलियों पर 
किन्तु वर्जनाओं की मौजूदगी 
वहां तक है 
जहां हवा भी नहीं जा सकती 
भला कहो तो- 
ऐसा कहां लिखा है कि 
फूल छूना मना है।

वेद हिमांशु
🌹🌷🌹🌷🌹🌷

मेरी नजर में

कोई कहे कि टोपी पहन का "बुर्ज खलीफ़ा" का वर्णन करो तो टोपी गिरना तय है। सारा साहस बटोर कर यह साहस कर रहा हूँ।
संस्कृत में कहा गया है कि "रसात्मकम् वाक्यम् काव्यम्" अर्थात् रसयुक्त वाक्य ही काव्य है।
रस अन्त:करण की वह शक्ति है, जिसके कारण इन्द्रियाँ अपना कार्य करती हैं, मन कल्पना करता है, सपनों की स्मृति रहती है रस आनंद रूप है और यही आनंद विराट का अनुभव भी है। यही आनन्द अन्य सभी अनुभवों का अतिक्रमण भी है। 
श्रृंगार रस का स्थायी भाव है रति अथवा प्रीति है। इसके अभाव में जीवन की कल्पना व्यर्थ है।
श्रृंगार रस को रसराज या रसपति कहा गया है। नायक और नायिका के मन में संस्कार रूप में स्थित रति या प्रेम जब रस की अवस्था को पहुँचकर आस्वादन के योग्य हो जाता है तो वह 'श्रृंगार रस' कहलाता है। यह परिभाषा हिन्दी साहित्य के व्याकरण में थ्योरी की तरह लिखी है पर इस छोटी सी कविता में प्रेक्टीकल के रूप में लिखी है। यह प्रेक्टीकल साक्षात् जीवन की प्रयोगशाला का है। चौंकियो मत। यहाँ संपूर्ण कविता "वर्जनाओं की मौजूदगी" में अपनी परिधियों में चलती है और वहाँ पहुचती है जहाँ खुले आकाश और स्वच्छन्दताओं में भी शायद नहीं पहुँच पाते। वर्जनाएँ ऐसी है कि वे प्रदर्शन पर तो प्रतिबन्ध लगाती है पर आनन्द और आह्लाद के विस्तीर्ण प्राङ्गण में अनुभूति के शिखर तक ले जाती है। इन वर्जनाओं के चलते मुझे समीक्षा में भी प्रतिबन्धों का परिपालन करना है वस्तुतः संकेतों और रूपकों का ही आश्रय लेना होगा। 
किसी जमाने में साहिर लुधियानवी का एक गीत बड़ा प्रसिद्ध हुआ था: 
"चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएँ हम दोनों।"
"न मेरे दिल की धड़कन लड़खड़ाये
मेरी बातों में
न ज़ाहिर हो तुम्हारी
कश्मकश का राज़ नज़रों से"
यहाँ भी वही वर्जनाएँ आ कर खड़ी हो गई। प्रदर्शन नहीं अनुभूति की ऊँचाइयाँ मौजूद हैं। परन्तु कवि और शायर इतने चतुर होते हैं कि वे "नहीं" के माध्यम से "वही" कह देते हैं जो कहना चाहते है। डोली में बैठी दुल्हन के चारों तरफ पर्दे होते हैं पर शायर दुल्हन का श्रृंगार और "भावसंसार" ज्यों का त्यों वर्णन कर देता है। वास्तव में स्वप्नों के धरातल वास्तविकता से भी अधिक विलक्षण और अद्भुत होते है। वेद हिमांशु जी ने भी इस कृति में यह प्रयोग बड़ी चतुराई से किया है। उनका यह कमाल ही उनका कलाम है। कविता का नायक चिर परिचित चेहरे को नित नवल ही रखना चाहता है क्योंकि शायद वह उस प्रथम दर्शन की उन अलौकिक अनुभूतियों को विस्मृत नहीं करना चाहता। "नेह" शब्द संस्कृत के स्नेह का तद्भव है जो मृदुलता का आभास देता है इसीलिये प्रेम का स्नेह पर्याय है। नायक इन्ही संकेतों में नायिका की मृदुलता से स्पर्श कर गया और वर्जनाओं का परिपालन हो गया। कविता का शीर्षक है "फूल छूना मना है। बचपन में कहीं गाँधी जी का कोटेशन पढ़ा था - सुन्दरता निहारते हैं, छूते नहीं। शायद नायक ने इस थ्योरी को पढ़ लिया होगा लेकिन यह कथ्य उस व्यावहारिक कथन तक निभ नहीं पाया और नायक बड़ी सहजता में प्रश्न करता है - "ऐसा कहाँ लिखा है कि फूल छूना मना है।" वह जानता है कि इस प्रश्न का उत्तर उसके हक में है। कवि वर्जना की परिधी तो तय करता है पर वहाँ पहुँच जाता है जहाँ हवा भी नहीं पहुँचती।
 बहुत सरल है उपदेश लिखना पर सबसे कठिन है श्रृंगार लिखना। प्रेम अर्थात् प्रीति श्रृंगार का स्थाई भाव है। प्रेम गूँगे का गुड़ है। मीठा होना तो समझा दोगे पर मीठा कैसा होता है नही समझा सकोगे। फिर ऐसे श्रृंगार की प्रस्तुतियाँ स्तुत्य है जिसे हर उम्र के लोग वर्जनाओं की सीमाओं में रह कर पढ़ और समझ सके और अनुभूतियों के सागर में डूब सके। प्रेम के बिना मनुष्य का हृदय मरूस्थल है और जीवन जड़वत् है। प्रेम धरती पर जीव के पहले आया है। प्रेम का न कोई धर्म है न प्रणति। कोई इसे स्वीकारे या नकारे प्रेम के स्वरूपों में एक पावन स्वरूप वह है जो इस सृष्टि के क्रम को कायम करता है। प्रेम प्रकृति का अक्षुण्ण और शाश्वत विनियमन है। सहज आकर्षण इसका मूल स्वभाव है। शायद इसलिये भी वर्जनाएँ अत्यन्त अनिवार्य है। इस एक शब्द ने इस कविता को अग्रिम पंक्ति में खड़ा कर दिया है। मैं तो बच्चोँ से भी यही कहूँगा कि हिन्दी व्याकरण के अध्ययन में श्रृंगार के लिये इस प्रकार की कविताओं को उदाहरण के रूप में प्रयोग करें।

रामनारायण सोनी


Monday, 17 February 2020

समीक्षा ३०

समीक्षा २७

एक कविता, रोटरी काव्यमंच द्वारा प्रकाशित "काव्य सुरभि" संपादक कृष्णलाल जी गुप्ता के साझा काव्य संकलन के पृष्ठ क्रमांक 94 से उद्धृत है। 

रचनाकार: मनीष त्रिवेदी जी। शिक्षा: एम.एस.सी. (गणित)। शौक: काव्य लेखन, सामाजिक सेवा आदि में रत। संप्रति: वर्तमान में भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक सी.ए.जी. में अधिकारी।

सच क्या है 
तुम्हारा सच तो सच है,  मेरा सच भी सच है
फिर दुनिया का सच... वो भी तो सच है। 
परंतु सच तो एकनिष्ठ, शाश्वत, अनन्य है, 
सच न तो कटु होता है ना ही दिशाहीन। 
सच अंधकार में भी प्रदीप्त मान है, 
सच तो सूर्य के समान है,
जो स्थिर, स्थाई, अडिग, अचल, अटल है, 
सूर्य कभी अपने स्थान, स्थिति को परिवर्तित नहीं करता, 
विद्यमान है ब्रह्मांड में सदियों से।
हम पृथ्वी पर खड़े निहारते हैं उसे,
सामना करने का प्रयास करते हैं, 
उसे परिभाषित करते हैं अपनी दृष्टि से।
कहीं यह सूर्योदय है, कहीं सुदूर से सूर्यास्त
जबकि सबसे बड़ा सच तो यह है 
कि सूर्य का उदय कभी होता ही नहीं, 
और सूर्य कदापि अस्त होता नहीं 
इस ब्रह्मांड का सच यही है, 
जिसका कोई प्रतिबिंब नहीं, कोई परछाई नहीं,
सच सिर्फ सच है उसे स्वीकार करो। 
तुम्हारा सच तो सच है, 
मेरा सच भी सच है 
फिर दुनिया का सच... वो भी तो सच है।
🌹🌷🌹🌷🌹🌷🌹🌷

मेरी नजर में

कवि का व्यक्तित्व निराला है। उनकी शिक्षा स्नातकोत्तर साइन्स (गणित) विषय में, सेवा अंकेक्षण (ऑडिट) विषय में और यह काव्य सृजन हिन्दी साहित्य में है। पतित पावनी गंगा का एक नाम है "त्रिपथगा"। गंगा तीन विभिन्न रास्तों से चल कर एक स्थल पर आकर मिलती है जहाँ से आगे वह गंगा कहलाती है। इसी तरह के सृजक हैं। यह सृजन तीनों विषयों के समन्वित ज्ञान का सुन्दर, ज्ञान-विज्ञान और अध्यात्म से परिपूर्ण सम्मिश्रण है। इसमें दर्शन शास्त्र के सत्य का उल्लेख है, विज्ञान के ब्रह्माण्डीय विज्ञान का विवेचन है और कविता अंकेक्षण अथात् सच का ऑडिट कर के उसमें से ब्रह्म स्वरूप "सत्य" के ऑडिट पेरा तक ले जाती है। बहुधा ऑडिटर कुछ प्रश्न ले कर निरीक्षण-परीक्षण करता है जो दधिमन्थन के जैसा होता है। सब जानते हैं कि परिणाम केवल "माखन" जैसा संक्षिप्त सा होता है। यहाँ वह परिणाम "सत्य" है।
विज्ञान में एक फेनोमेना होता है इल्यूजन। यह इल्यूजन जादूगर के इन्द्रजाल के जैसा होता है। यह सिद्ध कर देता है कि हर आँखों देखा हुआ सच वास्तव में सच नही होता है। एक और सिद्धान्त है जिसे सापेक्षता का सिद्धान्त कहते है। जैसे वाराणसी तो धरती पर अपनी जगह फिक्स है पर दिल्ली का आदमी उसे पूर्व दिशा में स्थित कहेगा और बंगाल वाला पश्चिम दिशा में स्थित बतायगा। इस सापेक्षता के इल्यूजन से बाहर आना है तो वाराणसी के अक्षांश-देशान्तर फिक्स करना होगे। दोनों फेनोमेना को मिलाकर कवि ने "सच" को एक प्रयोगशाला में रख दिया ताकि सत्य तक पहुँचा जा सके। दिल्ली और बंगाल के दोनों आदमी अपना अपना सच बयान कर रहे हैं परन्तु वह तो सच नहीं वरन् "यथार्थ" है। जैसा दिखे वैसा का वैसा बताना "यथार्थ" है परन्तु यथार्थ के माथे पर खड़ा हो कर सच को पहचानना आवश्यकीय और संभव भी है अन्यथा एक अजीब सा भटकाव और व्यर्थ का वितण्डावाद तैयार हो जाना तय है और फिर अनर्गल वाद-विवादों को जन्म देना है।

"सच क्या है ?"

यह प्रश्न है या शीर्षक लेकिन शायद यह दोनो ही है। यह पहले तो शीर्षक है जो कविता में सत्य के दर्शन तक ले जावेगी और दूसरा यह प्रश्न है जो स्वयं से है और उत्तर की खोज कविता के माध्यम से हो रही है। दोनों प्रशंसनीय है। देखें पंक्तियाँ...
"तुम्हारा सच तो सच है,  मेरा सच भी सच है
फिर दुनिया का सच... वो भी तो सच है।"

संदर्भित कविता में सच के भाव दो प्रकार से लिये गये हैं। पहला झूठ का विलोम "सच" और दूसरा वह "सत्य" जो ईश्वर है। लेकिन कवि ने बड़े सहज रूप में प्रथम भाव को दूसरे पुनीत भाव तक पहुँचाया है।
सत्य को जानना कठिन है। सत्य का लौकिक अर्थ : ईश्वर ही सत्य है, सत्य बोलना भी सत्य है, सत्य बातों का समर्थन करना भी सत्य है। सत्य समझना, सुनना और सत्य आचरण करना कठिन जरूर है लेकिन अभ्यास से यह सरल हो जाता है। जो भी दिखाई दे रहा है वह सत्य नहीं है, लेकिन उसे समझना सत्य है अर्थात जो-जो असत्य है उसे जान लेना ही सत्य है। असत्य को जानकर ही व्यक्ति सत्य की सच्ची राह पर आ जाता है। 
परंतु सच तो एकनिष्ठ, शाश्वत, अनन्य है, 
यहाँ से कविता उस भ्रमजाल और इन्द्रजाल से बाहर निकल कर सद्यस्नाता हो जाती है। वह विशुद्ध अध्यात्म और दर्शन के शाश्वत सिद्धान्तों का व्यावहारिक स्वरूप का चित्रण करती है। जो लोग "कटु सत्य" जैसे शब्दों का उपयोग करते हैं उन्हें कविता सावधान करती है कि सत्य कभी कटु हो नही सकता, वह दिशाहीन भी नहीं हो सकता क्योंकि वह (ईश्वर) सार्वदेशीय, सर्वव्यापक, परिपूर्ण ब्रह्म है। अज्ञान रूपी अंधकार में ज्ञान स्वरूप प्रकाश है।  
सच न तो कटु होता है ना ही दिशाहीन। 
आगे कविता कहती है....
"सच अंधकार में भी प्रदीप्त मान है, 
सच तो सूर्य के समान है,
जो स्थिर, स्थाई, अडिग, अचल, अटल है, 
सूर्य कभी अपने स्थान, स्थिति को परिवर्तित नहीं करता, 
विद्यमान है ब्रह्मांड में सदियों से।
हम पृथ्वी पर खड़े निहारते हैं उसे,
सामना करने का प्रयास करते हैं, 
उसे परिभाषित करते हैं अपनी दृष्टि से।
कहीं यह सूर्योदय है, कहीं सुदूर से सूर्यास्त
जबकि सबसे बड़ा सच तो यह है 
कि सूर्य का उदय कभी होता ही नहीं,"
ईश्वर सत्य है, नित्य है। सत्य ही ईश्वर है।
सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म।। तैत्तिरीय उपनिषद्, ब्रह्मानन्द वल्ली १/१।। ब्रह्म सत्य ज्ञान अनन्त स्वरूप है।
सत्य सृष्टि के सृजन के पूर्व भी था, वह वर्तमान भी है और सृष्टि के लय के पश्चात् भी रहेगा। हमें यह भ्रम होता है कि सूर्य डूबता-उगता है परन्तु हम इसे सापेक्ष भाव में देखते है। सूर्य इसलिये चलता हुआ दिखने वाला है पर वह अपने ब्रह्माण्ड के केन्द्र में स्थिर रूप से स्थित है। 
यह समस्त व्यष्टि और समष्टि अव्यक्त से व्यक्त और फिर व्यक्त से अव्यक्त हो जाती है। सब मौलिक है। गीता--
अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत।
अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना।।2.28।।

कविता आगे यही प्रतिपादित करती है।
"और सूर्य कदापि अस्त होता नहीं 
इस ब्रह्मांड का सच यही है, 
जिसका कोई प्रतिबिंब नहीं, कोई परछाई नहीं,
सच सिर्फ सच है उसे स्वीकार करो।"

"तुम्हारा सच तो सच है, मेरा सच भी सच है 
फिर दुनिया का सच... वो भी तो सच है।"
अन्त में बताये गये सारे सच जो आभासी है वे सत्य नहीं है। उपनिषदों के अनुसार न जाग्रत सत्य है न स्वप्न सत्य है। जो सच दिखाई दे रहा है वह मिथ्या अर्थात् अनित्य है। नित्य तो केवल वह "सत्य" ही है।
वस्तुतः कविता लौकिक व्यवहार के "सच" के विक्षेप और भ्रम के कोहरे से बाहर ला कर उस परम सत्ता की सहज अनुभूति कराती है। जब कविता गढ़ी गई होगी तो मूल भारतीय दार्शनिक मूल्यों का जाने अनजाने में अथवा प्रारब्ध में रचे बसे तत्वो का समावेश हो गया होगा। कविता सच के लौकिक व्यावहारिक स्वरूप से चल कर सत्य स्वरूप तक सहज रूप से पहुँचाने मे सफल हुई है। 
ऐसा मैं सोचता हूँ।

रामनारायण सोनी


Saturday, 15 February 2020

समीक्षा २९

समीक्षा २६

एक कविता शब्दवट से ली गई है जो सितारे की तरह पृष्ठ क्र. ५९ पर टँकी है। कवि का परिचय उपलब्ध न होने से कविता को उनका परिचय अंकित किया जावे।

मैं क्या हूँ?

कौंधता है 
जो बार-बार 
मेरे भीतर एक सवाल 
कि मैं क्या हूँ 
ईश्वर की मात्र एक कृति हूँ 
बहन हूँ, बेटी हूँ, प्रेयसी हूँ, पत्नी हूँ 
नहीं... नहीं... इतना ही नहीं 
मैं कुछ और भी हूँ। 
मैं हूँ उषा की लालिमा 
जो जगाती है धरा को हौले से 
मैं जल पर तैरती हुई 
पंकज की कली हूँ 
जो पाकर भास्कर का 
सुर्ख सुनहरा स्पर्श 
खोलती है पट घूँघट का 
और बढ़ा देती है 
अर्घ्य सूरज को। 
मैं नीर की उर्मियों को 
लहराती नचाती 
शीतल पवन हूँ 
जिसे भरकर पंख में अपने 
निकल पड़ता है पाखी 
नापने गगन की थाह। 
मैं क्या हूँ...? 
मैं मंदिर की गूँजती 
घंटी का नाद हूँ...
मैं मस्जिद की अर्जों का 
पहला और अंतिम स्वर हूँ।
मैं नन्ही सी ओस की बूँद हूँ जो झिलमिलाती है 
धरती के कण-कण में 
मैं क्या हूँ...? 
मैं ही सूर्य की पहली किरण हूँ 
जिसे समेट कर/ जाग उठता है 
उजियारा मन का 
मैं उपवन में इठलाती बलखाती 
गंध पराग समेटती
तितलियों की उड़ान हूँ 
मैं निशा के आंचल से 
झाँकती तरीका हूँ 
मैं धरती पर बिछी 
स्नेह की रस धार हूँ 
मैं आँगन में महकती 
कुलाचें भरती रुन-झुन दौड़ती 
किलकती 
एक नन्ही सी परी हूँ 
यह सर्वोत्कृष्ट कृति है 
ईश्वर की इस धरा पर 
जी हाँ/ "बच्ची"। और/
यह बच्ची मौजूद है/ मुझमें 
इसलिए तो मैं, "मैं" हूँ 
वरना मात्र एक देह हूँ

श्रीमति आयशा सैयद कुरैशी
झाबुआ

🌹🌷🌹🌷🌹🌷

मेरी नजर में...

"जथा सुअंजन अंजि दृग साधक सिद्ध सुजान।
कौतुक देखत सैल बन भूतल भूरि निधान॥"

भावार्थ:- जिस प्रकार आश्चर्यचकित तरीके से मनुष्य पर्वतों, बनों और पृथ्वी के अंदर छिपे रत्नों को पाकर समृद्धि को प्राप्त हो जाता है, उसी प्रकार उन मणियों के प्रकाश रुपी सुरमा को अपने दिव्य नेत्रों में लगाकर साधक परम-सिद्धि को प्राप्त कर जाता हैं।

साहित्यकार में एक विशेष गुण या कहिये अवगुण होता है, वह पहले अपने भीतर कौतुक करके आड़े तिरछे प्रश्न अथवा समस्याएँ खड़ी करता है, उलझनें पैदा करता है, तर्क वितर्क करता है लेकिन ये कौतुक उसके अपने क्षेत्र विशेष के होते हैं। कई बार तो वह कराहते दर्द को अपने भीतर आहूत करता है और उसकी अनुभूतिजन्य परिणामों से सृजन के आयाम खड़े करता है। यह ठीक उस तरह का छ्द्म प्रपञ्च होता है जैसे पुलिस डिपार्टमेन्ट मॉकड्रिल करता है। यह रिहर्सल नहीं प्रिहर्सल है। सेना भी इसी तरह का छद्म युद्धाभ्यास करती है। इसलिये जो जितनी महारत से अभिकल्पनाएँ करता है वह उतना श्रेष्ठ साहित्य सृजन करता है। लेकिन कल्पित घटनाएँ और परिदृष्य वास्तविकता और संभावनाओं के सन्निकट हों। भिखारी की आत्मकथा लिखता है तो अपने भीतर कौतुक से एक भिखारी को हू-ब-हू जीता है। रावण का चरित्र लिखते समय क्रूरता की छद्म आकृतियाँ उसके भीतर उत्पात मचाती है। एक अच्छे लेखक और रंगकर्मी का यह प्रथम गुण है। यदि आप इस तरह के कौतुक नहीं कर सकते तो अपनी कलम छुपा कर कहीं रख दीजिये। 
अब ये उठाये गये प्रश्न और समस्याएँ उनके उचित उत्तर अथवा हल सुझाए बगैर पाठकों/दर्शकों में फेंक दी तो यह फ्लॉप शो होगा। जितने अच्छे प्रश्नोत्तर होंगे सर्जना उतनी ही श्रेष्ठ होगी। अच्छी भावभूमि पर विभिन्न रसों का रसायन भी प्रभावशील होगा।

प्रस्तुत कविता का प्रारम्भ एक प्रश्न से है। "मैं क्या हूँ"? प्रश्न खुद का, खुद से, खुद के लिये और देखा जाय तो उत्तर के एकदम निकट ही खड़ा है। उत्तर भी कविता ही देती है-"बच्ची हूँ।" सीधे से प्रश्न का दो सहज से शब्दों का उत्तर। लेकिन कविता ने इस नि:सार सार के लिये जन्म नहीं लिया है। प्रश्न से उत्तर तक पहुँचने के लिये मॉकड्रिल की गई है। एक सौम्य सहजता के साथ काव्य के सृजन के मनोरम उद्देष्य तक बहुत सरलता से पहुँचा देती है। 
मेरी नजर में उत्तर तक पहुँचने के दो रास्ते हैं। एक लौकिक और दूसरा आध्यात्मिक। लौकिक अर्थों में भरपूर सौंदर्य है और आध्यात्मिक पथ में देहात्मभाव से ऊपर उठ कर आत्मा का निराला प्रकाश देदिप्यमान दिखाई देता है। 
लौकिक दृष्टिकोण से कविता कहती है मैं रिश्तों के बन्धनों से परे जो हूँ मैं उस ईश्वर की प्राकृत सृष्टि की तरह सहज, सौम्य, सरल, प्रवाहमय और कान्तिमान हूँ। याद आता है कालिदास का मेघदूतम् जिसकी नायिका का सौंदर्य प्रकृति के नैसर्गिक सौंदर्य के उपमानों से समृद्ध होता है। यहाँ बच्ची भी उसी तरह नायाब है। शायद अनजाने में ही कविता की बच्ची में प्रकृति स्वयं अवतरित हो गई है।
कविता की सुन्दरता यह है कि सम्पूर्ण यात्रा में कोई पूर्वाग्रह नही है न ही किसी बड़े सैद्धान्तिक पृष्ठभूमि की इसे जरूरत है। वह "एक बच्ची" मन्दिर में गूँजते नाद और मस्जिद में उभरते स्वरों में विलक्षण समरसता का अनुभव करती है। पक्के घड़े के रंग कुम्हार के होंगे पर कच्चे घड़े में मिट्टी का नैसर्गिक रंग है। यह विशुद्ध अध्यात्म है। दिया, घड़ा, सुराही आकृतियाँ से जानी जाती है पर सब की एक पहिचान मिट्टी है। कहती है---
एक नन्ही सी परी हूँ 
यह सर्वोत्कृष्ट कृति है 
ईश्वर की इस धरा पर 
जी हाँ/ "बच्ची"। और/
यह बच्ची मौजूद है/ मुझमें 
इसलिए तो मैं, "मैं" हूँ 
वरना मात्र एक देह हूँ
कविता "मैं" अर्थात् अस्मिता तक ले जाती है। काया से उस अक्षुण्ण रूह की कान्ति तक ले जाती है। समग्र कविता की सादगी मनहर है। उसकी लघुता में विलक्षण गुरुता है। 
रचना में माधुर्य और प्रासादिक गुण होने से पाठक को गुदगुदाती है।
महसूस करो!

रामनारायण सोनी
१५.०२.२०२०

Friday, 14 February 2020

समीक्षा २८

समीक्षा २५

एक कविता "शब्दवट" राष्ट्रीय-काव्य संग्रह से।
यह काव्य-संग्रह साहित्य एवं "संस्कृति परिषद् वनाञ्चल" के शब्द रूपी वट की घनेरी छाया तले राष्ट्रीय, आंचलिक और प्राचीन-अर्वाचीन हिन्दी साहित्य के रचनाकारों के सृजन से सुसज्जित हैं। शब्दवट के परिचयात्मक पृष्ठ में अंकित प्रबन्धक मण्डल में छ्ह, जी हाँ छह डॉक्टर्स और  दो ग्राउण्ड झीरो के उत्कृष्ट समाजसेवी हैं। फलतः शब्दवट की गुणवत्ता उच्चस्तरीय हो गई है। शब्दवट के आवरण पृष्ठ का चित्रांकन प्रबन्धक मण्डल की सदस्या भारती जी सोनी ने किया है। मुझे बचपन याद आता है। याद है गाँव के ओंकार कुण्ड के पास खड़े उस वट के तनों से लटकती उसकी वे जड़ें। इन जड़ों को पकड़कर झूला झूलते किलकते वे साथी बच्चे भी याद हैं। शाम सुबह जहाँ रक्तकंठी तोते चिटिर पिटिर की आवाज करते समवेत हो जाते थे। इस "शब्दवट" में उसकी सुखद प्रतिच्छाया दिखाई दे रही है। इसकी पुष्ट जड़े नये तनों का प्रतिमान हो चुकी हैं। सच मानें तो एक विशाल वटवृक्ष कई वटवृक्षों का समवेत स्वरूप होता है। मुझ जैसी अबल बेलें भी जिसका सहारा लेकर ऊपर चढ़ जाती हैं। हम कृतज्ञ हैं इस शब्दवट के।

पुस्तक के २५वें पृष्ठ पर टँकी एक कविता है "थावरिया! उस रोज मिले तुम"। डॉ मुरलीधर चाँदनीवाला इस सर्जना के शिल्पकार हैं। शब्दवट के वे परिपुष्ट स्तम्भ हैं। वे सफल शिक्षाविद् हैं। वेदों की ऋचाओं का काव्यानुवाद कर उन्हें जन-जन तक पहुँचाना उनके जीवन की आत्यन्तिक उपलब्धि है। वे हिन्दी साहित्य के सहृदय उपासक हैं। वेदों की ऋचाएँ उनसे बतियाती रहती हैं।
उनके सृजित कृतीत्व और उनके व्यक्तित्व पर कुछ लिखना मेरा दुस्साहस ही है पर इस धृष्टता के लिये मैं उनका क्षमा प्रार्थी हूँ। आशा करता हूँ कि वे इस आलेख को आशीष प्रदान करेंगे।

🔥एक कविता...
                                
             "थावरिया ! उस रोज मिले तुम"
              ______________________
                          थावरिया !
                     उस रोज मिले तुम
                         भगोरिया में 
                  तो तुमने अपना इतिहास 
                 खोलकर रख दिया सामने।
 
                       पहली बार जाना
           कि अथर्ववेद तुम्हारे भीतर से उगा
                   और सारे तीज-त्यौहार
                तुम्हारे घर से चलकर पहुँचे 
                          महानगरों में।

                     पहली बार जाना कि 
                 हरज्यो-धोंणी, फूलड़ो, छुड़ी
                          और टिपका 
                    समन्दर पार घूम आये,
               भिल्ल और किरातों की सेना  
                   रामायण-महाभारत में 
        खड़ी दिखाई दी अत्याचारों के विरुद्ध, 
               एकलव्य दिखाई दिया वहाँ, 
       निषाद के पदचिह्न अंकित दिखाई दिये।

        पहली बार सुने तुम्हारे मुँह से यातुगीत  
            और उनमें भरे पड़े दिखाई दिये
               तीर-कामठी और कुल्हाड़े,
           पहली बार देखा तुम्हारी आँखों में 
               गणेह मंडोळ का वह चेहरा
        जो सभ्यता का प्रथम पूज्य है अब भी,
                ढंढुकाळ के किस्से सुनकर
          मुझे नींद नहीं आई कई दिनों तक।

            पहली बार देखा भिलोड़ी गरबा
                'सुना रूपा नो से गरबो रे
                    सालों जोवा रे जायें '
          भीलांगनाओं की घुटी हुई आवाज 
                 नाचती हुई सी लगती,
                    और वह गवरी ?
          भोपा की ढब भुलाये नहीं भूलती,
                  मांदळी की थाप पर 
                 गोल-गोल घूम जाती 
              लाल लुगड़े में कोई लुगाई।

                         थावरिया !
                   वे टापरे याद आये ,
                   वे गोदने याद आये ,
                   आँखों में तैरते रहे 
               स्वर्गलोक गये परिजनों के
                      प्रस्तर-स्मारक
             जो गाँव में हमेशा जीवित हैं ,
                 वह रावळा याद आया ,
        भिलट बावा का ऊटळा याद आया,
                 याद आया टंट्या भील , 
         याद आया मौज-मस्ती का दिवासा
         और फिर तुम बार-बार याद आये।

               🍁डॉ मुरलीधर चाँदनी वाला
                     रतलाम, मध्यप्रदेश

मेरी नजर में

कविता व्हेनसांग अथवा फाह्यान की तरह आदिवासी के वनाञ्चल में यात्रा पर निकलती है। वहाँ उसे थावरिया मिल जाता है। थावरिया एक पात्र है जिससे यह कुछ पूछती है। प्रश्न जो भी रहे हों पर उत्तर बहुत रोचक हैं। हमें परिचय कराते हैं एक संस्कृति से, जन-जीवन से उनकी व्यथा कथा से। 
कविता की पंक्तियॉं परिचय कराती है कि--
अथर्ववेद की ऋचाओं का प्राकट्य भी वनस्थलियों में ही हुआ। त्यौहारों की पावन परंपराएँ वहीं जन्मीं और उनमें अधिक विकृति न होने से उनका मूल स्वरूप आज भी मौजूद है। भगोरिया उसका ज्वलन्त उदाहरण है।
पहली बार जाना कि 
हरज्यो-धोंणी, फुलड़ो, छुड़ी
और टिपका
समंदर पार घूम आए,
"भिल्ल और किरातों की सेना 
रामायण-महाभारत में 
खड़ी दिखाई दी अत्याचारों के विरुद्ध, 
एकलव्य दिखाई दिया वहाँ, 
निषाद के पद चिन्ह अंकित दिखाई दिये 
पहली बार सुने तुम्हारे से यातुगीत 
और उनमें भरे-पड़े दिखाई दिए 
तीर-कामठी और कुल्हाड़े'

आदिवासियों के आख्यान और मिथक, उनकी परम्पराएँ बीते युगों की कहानी तो कहती ही हैं, बल्कि उनकी संस्कृति और बौद्धिक प्रासंगिकता भी बयान करती है। उनकी कलात्मक अभिव्यक्तियाँ, नैसर्गिक चेष्टाएँ और अनुष्ठानिक क्रियायें मात्र मनोरंजन नहीं वरन् उनकी पूरी जिन्दगी का अटूट हिस्सा होती है। आदिवासी जन जीवन की आधारशिला उनकी परम्पराएं हैं। ये परम्पराएँ अलिखित संविधान है कबीलों का, वनजनों-गिरिजनों का। समाज-संस्कृति का नियमन भी वहीं से होता है। अनुशासन और मानवयी संबंध उस की छत्रछाया में पुष्पित-पल्लवित होते हैं|
यह विडम्बना ही है कि तथाकथित सभ्य समाज जनजातीय और गैरजनजातीय संस्कृतियों के पार्टीशन की बात करता है। चातुर्वर्ण्य सृष्टि में जनजातीय समाज का हमने स्थान तय नहीं किया और इस वर्ग विभेद के कारण हम से उनका तादात्म्य स्थापित नहीं हो पाया। जबकि रामायण और महाभारत कालीन संदर्भों में वे जनपदों के साथ खड़े दिखाई पड़ते हैं। परन्तु वहाँ भी वर्णव्यवस्था में स्पष्ट संकेत अनुपलब्ध है।
कहीं न कहीं एक विभाजन की लकीर सदैव दिखाई पड़ी। जैसे भीम ने हिडिम्बा से विवाह किया पर उसे राजप्रासादों में नही लाया गया। घटोत्क्च और बर्बरीक भी वनस्थली में ही रहे। गुरु द्रोण ने एकलव्य का अँगूठा दान में ले कर जनजातियों से अन्याय ही किया।

पहली बार देखा तुम्हारी आंखों में 
गणेह मंडोळ का वह चेहरा 
जो सभ्यता का प्रथम चेहरा 
जो सभ्यता का प्रथम पूज्य है अब भी,
ढंढुकाळ के किस्से सुनकर 
मुझे नींद नहीं आई कई दिनों तक।

एक संरिप्त
पहली बार देखा भिलोड़ी गरबा 
सुना रुपा नो से गरबो रे 
सालों जोवा रे जाए।
भीलांगनाओं की घुटी हुई आवाज 
नाचती हुई सी लगती,
और वह गवरी 
भोपा की ढब भुलाए नहीं भुलती,
मांदळी की थाप पर 
गोल-गोल घूम जाती 
लाल लुगड़े में कोई लुगाई।
थावरिया! 
वे टापरे याद आए,
वे गोदने याद आए, 
आंखों में तैरते रहे 
यमलोक गए परिजनों के 
प्रस्तर-स्मारक 
जो गाँव में हमेशा जीवित है,
वह रावळा याद आया 
भिलट बाबा का ऊँटला याद आया 
याद आया टंट्या भील, 
याद आया मौज-मस्ती का दिवासा 
और फिर तुम बार-बार याद आए
ध्यान से उन शब्दों को पढ़ कर देखें जैसे माँदल, लुगड़ी, टापरे, गोदना आदि उत्सव और जनजीवन में प्रयुक्त होने वाले साधन साध्य आदि हैं। भीलांगनाओं की घुटी आवाज की रसात्मकता तो मन को आन्दोलित कर देती है।
मैं ऐसा इसलिये कह पा रहा हूँ कि में झाबुआ जिले में ४वर्षों तक रहा हूँ और (दोनो जिलों) के देहाती क्षेत्रों को करीब से देखा है।

कविता की यात्रा भीली वनाञ्चल की ड्रोन यात्रा है। वह संवेदी केन्द्रों पर ठहरती है और संपूर्ण प्रान्तर की कॉमेन्ट्री जसदेव सिंह की तरह सुनाती/दिखाती है। वहाँ की संस्कृति की सुवास से वह भी सुगन्धा हो गई है। रचना अत्यन्त प्रभावी और मर्मस्पर्शी है। 
यदि शोधार्थी झाबुआ आलीराजपुर के अन्तप्रदेश में जावें तो यह कविता उन्हें शोध के वाइड-विजन प्रदान कर सकती है। 

रामनारायण सोनी

Wednesday, 12 February 2020

समीक्षा २७

समीक्षा २४

एक कविता, "मैं दर्पण हूँ,  भारती सोनी, झाबुआ की। उनकी एक अन्य कविता की इसी स्तम्भ के अन्तर्गत चर्चा की गई थी, में संक्षिप्त परिचय दिया जा चुका है।

मैं दर्पण हुँ

मैं दर्पण हूँ
केवल मुझमें मेंरा 
स्वरूप ही प्रतिबिम्बित नही होता
मेरे भाव...मेरा रुदन...मेरी खुशी
मेरा जीवंत होना
भी दिखता है मुझ जैसा।

फिर मैं उसी आवरण को 
और भी श्रृंगारित करती हूँ
ताकि वही दिखूँ जो चाहती हूँ

बहुत खूबसूरत है ज़िन्दगी
उम्र और चिंता ने 
कभी सोचा भी नही होगा
कि आज भी उस बचपन की झलक 
इस दर्पण में मुस्कुराती है....
जो ज़िद भी करती है प्यार से,
कभी कभी रोती है किसी आस से,

बेफिक्र सी दौड़ती हुई 
उन्नत खुले आकाश में..  
जहाँ विचारों का कोई ठौर नही
सबके सब स्वतंत्र है 
वहाँ बिना किसी स्वार्थ से
मैं दर्पण हुँ, मैं दर्पण हुँ

भारती सोनी


लोगों के गले टँगे आइने मिलते है वे कहते हैं इसमें देखो तुम कैसे लगते हो? इस आईने को घर जाने पर दीवार पर टाँगते हैं और निहारते हैं।
"तेरी ख़ुशी की जो वज़ह है 
ध्यान से देख! वो आइने में है।"
आइने मे खुद को देख कर खुश हो रहे हो पर जो तुम्हे दिख रहा है वह मात्र देह यष्टि और लिबास है। इससे भी बड़ा सच यह है कि कुछ चतरे लोग मुखौटा लगा कर आइने के सामने खड़े हो जाते है और आइने से रौब से कहते हैं "मेरी तारीफ़ कर"। लेकिन तुम्हारे अन्तःकरण को दिखाने वाला कोई बाहरी आइना नही तुम खुद ही हो। उसे देखने के लिये अन्तर्यात्रा करनी होगी।
मेरी पुस्तक "जीवन संजीवनी" का अंश...
टूटे हुए आईने में आप भी कई टुकड़ों टुकड़ों में दिखाई देते हो । जितने टुकड़े उतने टूटे मुखड़े, टूटे हाथ-पैर। आप समझने लगते हो कि आप टूट गए हो। अपने आप को संभाल-संभाल कर देखते हो कि कहीं वास्तव में मैं टूट तो नहीं गया हूँ। आईना जोड़ने में मत लग जाओ वरन एक साबुत आइना तलाशो। जहाँ आप पूरे दिखोगे। आईने की विकृति अपने ऊपर मत ओढ़ो। आईना ही आपको अपना चेहरा दिखाने में सक्षम है। इसी तरह जिन विचारों में आप स्वयं ही टूटे हुए दिख रहे हो उन्हें त्याग दो। नए आइने की तरह नए विचारों का आह्वान करो।
आपका समूचा व्यक्तित्व, आपके अपने विचारों का ही प्रतिफल है।
"मृग की नाभि मह कस्तूरी बन बन फिरत उदासी।"
मोहे सुन सुन आवै हाँसी।
कविता में रचनाकार को ऐसा मृग मिल गया है जिसे अपने भीतर कस्तूरी का पता चल गया है। दर्पण का आलंबन ले कर वह अपने महमहाते बाल जीवन की खुशबू लेती है। यह रेगिस्तान की चिलचिलाती गर्मी में जीवन की तृषा बुझाने के लिये दौड़ते हिरणों के लिये एक पावन संदेश है। अपने खुद के इस दर्पण में स्वरंजित भावनाएँ, सुख दु:ख के लटपट अनुभव, और खुशियों के खजाने आदि के इन्द्रधनुषी रंग भरे पड़े हैं। इस दर्पण में आभास करके देखो कि तकलीफों का बीत जाना भी आज एक अतिरिक्त सुखानुभूति जगाता है। 
खुली आँख से जो दिखता है वह तो देखते ही रहते हो थोड़ा सा आँख को बंद कर भी देख लो। हम सब के पास अपना खुद का एक एक दर्पण है। देख सकते हैं और उन पलों को जीवन्त बना कर वर्तमान में उन्हें जी भी सकते है। उनमें कल के वे "नौ रस" आज के "नव रस" हो सकते हैं। अकेले में, एकान्त में आप अकेले नही होंगे। हो सकता है कि अनचाही बेतुकी भीड़ आस पास होने पर ऐसे समय में भी आपका यह दर्पण आपकी आपसे मेलजोल बढ़ाता है। यह अद्भुत दर्पण आवरण भी दिखाता है और अन्तस के राजमन्दिर का इन्टीरियर भी दिखाता है। कविता समष्टि और अन्तःकरण को बखूबी साथ ले कर चलती है।
   दर्पण कहता रहता है, "मैं दर्पण हूँ, मैं दर्पण हूँ। आपका हमराज, आपका हमसफर, आपका राजदार। आप के लिये मैं आकाश की तरह खुला हूँ, धरती की तरह विश्राम दायक हूँ, जल की तरह स्निग्ध भी हूँ। यादों की तिजोरी हूँ मैं। ध्यान रहे! मैं कभी मैला न होऊँ अन्यथा वह सब नहीं दिखा सकूँगा जिसकी मुझसे अपेक्षा है। 
कविता अपने सफ़र में कामयाब है। थोड़े से शब्दों में भावों का विशाल वैभव समाहित है। कविता की सशक्तता इतनी है कि पढ़ते पढ़ते हमारे हाथ में हमारा दर्पण आ जाता है। कविता चलती रहती है नेपथ्य में और अपने रंगमंच के स्वसाक्षी हो गए। 
ऐसी रचनाएँ कालजयी होती है जो आत्मसाक्षात्कार कराती हैं और आत्म मन्थन के अवसर प्रदान करती है।
साधुवाद
रामनारायण सोनी


Tuesday, 11 February 2020

समीक्षा २३

समीक्षा २३

"ये पूरी शाख तेरी है घरोंदा क्यू बनाता है।"

जहाँ मर्ज़ी हो तेरी आशियाँ तू डाल तन डेरा 
खुला आकाश है फिर व्यर्थ में करता है क्यू फेरा 
कभी इस शाख पे झूमो कभी उस डाल पर नाचो 
सुनहरा पृष्ठ जीवन है इसे चाहे जहाँ बाचों 

परिधि तो जटिल इन बन्धनों का नाम दूजा है 
शिवाला तुम कहो या हम कहे की कोई पूजा है
घरोंदों की कहानी में अकेला पन छलकता है 
परिधि में मनुज की बंधना का छल झलकता है

अगर ओढा हुआ आकाश हो तो सोच बदलेंगी 
धरा भी रूप आंगन में कही तो दृश्य बदलेगी ।

अखिल आकाश तेरा हो तो फिर से सोच बदलेगी।
धरा हो धाम तेरा तो यही परिदृष्य बदलेगी।
तुझे एहसास होगा जब कभी उस सृष्टिकर्ता का
सुखों की ओर जीवन की तेरी यह धार बदलेगी।

कभी अन्हभूत कर कम्पन वो नीले छत्र धारी का
अभी तू छोड़ दे गुणगान करना विष कटारी का 
धरा पे गीली माटी का ये लौंदा क्यू बनाता है ।।
ये पूरी शाख तेरी है घरोंदा क्यू बनाता है ।

जय वैरागी 

🌺🥀🌹🌷🍂🍃🎋💃🏿🕺

मेरी नजर में

धरा पे गीली माटी का ये लौंदा क्यूँ बनाता है।
ये पूरी शाख तेरी है घरोंदा क्यूँ बनाता है।।

पंक्तियाँ सीमित से विराट की यात्रा है, स्वयं को एक पोखर से सागर की ओर चलने को कहती है, विचारों और हौसलों की उड़ान भरने को कहती है। कविता समस्त को आत्मानुभव में लाने का कहती है वहीं वह उस सृष्टिकर्ता की सर्वहारा अनुकम्पा का बोध कराती है। धरा को आंगन और आकाश को ओढ़नी बताने वाली कविता अपनी वसुधैव कुटुम्बकं की साध पूरी करती है। घरोंदो की कहानी में अकेलापन महसूस करने वाली कविता सशक्त संगठित समाज में सम्मिलित रहने को कहती है। 
कविता की विशेषता यह है कि वह जगत और जगदीश को साथ लेकर चलती है। यह वैरागी जी का अनोखा वैराग्य है। जीवन दर्शन के मर्म को रेखांकित करती पंक्ति "सुनहरा पृष्ठ जीवन है इसे चाहे जहाँ बाचों" जिजीविषा की ओर संकेत करती है। 
"परिधि तो जटिल इन बन्धनों का नाम दूजा है 
शिवाला तुम कहो या हम कहे की कोई पूजा है।"
परिधियाँ सीमा रेखाएँ हैं। परिधियाँ अपनी अपनी बनाई हुई हैं। आदमी का बस चले तो आकाश को बाँट ले, सागर को टुकड़े टुकड़े कर ले, हवा के आयतन सीमित कर रे। कबीर दास कहते हैं--
हद हद करते सब गये,
और बेहद गयो ना कोय
अनहद के मैदान में,
रहा कबीरा सोय।
हद में रहकर के सब लोग दुनिया से चले गये, कोई भी बेहद नहीं गया। हर किसी की हद अलग अलग है। हद जात-पाँत की, धर्म की, मंदिर-मस्जिद की, ऊँच-नीच की, भाषा-भेष की। कबीर साहब अनहद के मैदान में रहते है। वह जो असीम है, विराट है, अनन्त है वह ही पूर्ण है। 
कवि की पंक्तियाँ कबीर की तरह विराट के दर्शन कराती है। और यह पुनः पुनः स्मरण कराती है कि परमात्मा और उसकी सृष्टि का स्पन्दन महसूस करें और आनन्द में रहें।*

रामनारायण सोनी

Sunday, 9 February 2020

समीक्षा २२

समीक्षा 

एक कविता "उजाले ज़िन्दगी के"
उद्धृत है ... पुस्तक "भोर का उजास" से

प्रकाशक: अपर्णा त्रिवेदी, सृजक कवि: आशीष त्रिवेदी 'सरल'।

उजालों की दावेदारी
कौन कर सकता है 
अंधेरे में कौन आगे ,
कौन पीछे कह नहीं सकते। 
जिंदगी की जंग में 
बढ़ते हुए हम 
जीते या हारे 
कह नहीं सकते 

पर रखकर भरोसा 
सत्कार्य और निष्काम कर्म पर 
सतत सेवा पथ पर अग्रसर होना होगा 
और कदम आगे बढ़ाना होगा। 
यही विश्वास तो सदा बनाता है 
संबल हमारा, इस कठिन पथ पर।
भरता है उजास 
हर पल 
दिलाता विजय का आभास 
जीवन में हर अगले क्षण

आशीष त्रिवेदी 'सरल'

🙏🌷🙏🌷🙏🌷🙏
मेरी नजर में....

साहित्य और सृजनशीलता परिवर्तन की आधारशिला है जो विगत, वर्तमान और भावी का समावेश करके तथ्यों की कलात्मक अभिव्यक्ति कर जन-मानस की रूचि, युग-प्रवृत्तियों से सम्पृक्त करवाती है। 
उक्त कविता के दो पक्ष हैं। पहला कृष्ण पक्ष दूसरा शुक्ल पक्ष। पहला पक्ष उजाले का क्रमिक क्षय है और दूसरा उजास का क्रमिक विकास। एक ही मास के दोनो पक्ष है। पुस्तक का  नाम भी इसी तर्ज का "भोर का उजास" है। ऐसा लगता है कि पुस्तक का अंकुरण इस कविता से ही प्रस्फुटित हुआ है। "भोर का उजास" के भी दोनों पक्ष हैं। इसमें समाहित कविताएँ निराशाओं और हताशाओं के ऋणात्मक वातावरण से निकाल कर सकारात्मकता का आह्वान करती हैं। वैदिक वाङ्मय में भोर को संध्याकाल ही कहते हैं अर्थात् रात्रि और दिन का संधिकाल। यह वह तटस्थ काल है जो रात्रि भी देखता है और दिनमान को भी। यहाँ कवि भी दोनों कालों को एक साथ देखता है। वैसे तो संधिकाल सांझ भी है परन्तु उसका संक्रमण रात्रि की ओर है तथा भोर का संक्रमण दिन अर्थात् उजास की ओर। वस्तुतः कविता और पुस्तक दोनों अंधकार के प्रथम पक्ष से प्रकाश के उज्जवल पक्ष की ओर जाने का इशारा करती है। 
एक और बेक टु बेक कविता है "प्रतीक्षा में" जो  कहती है:-
"हर एक रात को रहता 
इंतजार एक खुशनुमा सुबह का"
यही है भोर और इस भोर से मिलने वाले उजास की प्रत्याशा। ऐसी कोई रात नहीं जिसकी सुबह न हो और ऐसी कोई सुबह नहीं जो अंधकार से मुक्ति न दिला सके। भोर की संधि पर खड़े हो कर आश्वस्त हो जावें कि जो जीवन सोया पड़ा था उसे उर्मियाँ उपलब्ध होगी ही। वह चल पड़ेगा, कल की तरह आज भी वैसे ही चलेगा और जीवन के प्रति आस्था दृढ़ होती जावेगी। दृढ़ आस्था की परिणिति ही विश्वास है और विश्वास के बगैर प्रेम अकल्पनीय है। वस्तुतः "भोर का उजास" आत्मविश्वास और प्रेम पूर्ण जीवन का अप्रतिम संदेश देती है। वेद कहता है "तमसो मा ज्योतिर्गमय।" कविता और संपूर्ण कृति हमें तमस के कुहासे से निकाल कर हमारा हाथ थाम कर प्रेम से आपूरित जीवन की ओर ले कर चलती है।
"लाती हो संदेश आस्था का 
प्रेम का और विश्वास का 
देती दिलासा प्यार का।
कुछ जो मिला इस जिंदगी में 
अब उसको समेटो 
अब उसको सहेजो"
कविता सावधान भी करती है - ऐसा न हो कि जीवन में प्राप्त परिलब्धियाँ हाथ से रेत की तरह फिसल जाएँ। ऐसा न हो कि जीवन बस एक थकाऊ दौड़ बन कर रह जाए। इसलिये जो मिला वह भुक्ति के लिये है, उसका उपयोग भी सम्यक रूप से करो। सम्यक् दृष्टि से जिया जीवन सफल जीवन की ओर यात्रा है। 
ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत् ।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम् ।।ईशावस्योपनिषद् /१।।
जड़-चेतन प्राणियों वाली यह समस्त सृष्टि परमात्मा से व्याप्त है । मनुष्य इसके पदार्थों का आवश्यकतानुसार भोग करे, परंतु "यह सब मेरा नहीं है" के भाव के साथ उनका संग्रह न करे।
लेकिन "यह मेरा नहीं है" भाव निष्काम कर्म योग के आधार और व्यवहार पर ही आ सकता है। यही निष्काम कर्मयोग है। 
तत्र श्रीर्विजयोभूति ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम।।
जहाँ कर्मयोगी अर्जुन सा हो, उसका योगेश्वर जगत्सृष्टा में विश्वास संग हो वहाँ विजय सुनिश्चित है - 
दिलाता विजय का आभास 
जीवन में हर अगले क्षण।।
कविता की अन्तिम लाइन जिजीविषा को पुष्ट करती है। "विजय का आभास जीवन के हर अगले क्षण। 
कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेत् शतं समाः।
एवं त्वयि नरे इतः न अन्यथा अस्ति येन कर्म न लिप्यते ॥
इस संसार में कर्म करते हुए ही मनुष्य को सौ वर्ष जीने की इच्छा करनी चाहिये। हे मानव! तेरे लिए इस प्रकार का ही विधान है, इससे भिन्न किसी और प्रकार का नहीं है, इस प्रकार कर्म करते हुए ही जीने की इच्छा करने से मनुष्य में कर्म का लेप नहीं होता।
सुकृति है यह " कृति भोर का उजास" आखिर आखिर में बसन्त को निमन्त्रित करती है। कुल मिला कर संपूर्ण कृति धनात्मक ऊर्जा और जीवन्तता से सराबोर है। 

रामनारायण सोनी
०९.०२.२०२०

समीक्षा २१

एक कविता "मेहनत के फल" राजेश तिवारी "रामनगीना" की पुस्तक "कविता के झरनों पर" से।

रेत के मरुस्थल के सोए हुए ढेर में।
जोहना जल स्रोतों को मेहनत से मिलते हैं।।१

तलछटी चट्टानों को तोड़ने दो जोड़ से
मीठे पानी के झरने तो फोड़ कर निकलते हैं।।२

सूख कर कंकाल बने वृक्ष पर थी कोंपलें
फूटते अंकुर मिले बिना बात के भी खिलते हैं ।।३

अँधेरी सड़कों पर खड़ी पहाड़ हुई रातों को
मुसाफिर ने चीर दिए पथ लो दीप से पिघलते हैं।। ४ 

कहीं भी मिलती नहीं बयार ना आसान रास्ते पत्थरों में उगते फूल पगडंडियों पर मिलते है।।५

राजेश तिवारी "रामनगीना"

🌹🌷🌹🌷🌹🌷🌹🌷

मेरी नजर में:

"रेत के मरुस्थल के सोए हुए ढेर में।
जोहना जल स्रोतों को मेहनत से मिलते हैं।।१"

मरुस्थल का मूल अर्थ है वह स्थान जहाँ वर्षा बहुत कम होती है। दरअसल इसके अध्ययन वाले शोध पत्रों में इसे जल पात कहा जाता है। जरूरी नहीं कि वहाँ रेत के ढेर हों। परन्तु यह तय है कि वहाँ जल का अभाव है। जल कम है तो वनस्पतियाँ कम है, वनस्पतियाँ कम है तो मानव जीवन संधर्षों से भरा है। इन सोये हुए रेतों के टीलों के बीच कहीं कहीं ही जल के स्रोत हैं। ये टीले प्रायः समस्याओं की तरह यहाँ वहाँ चलते फिरते हैं। खिसकते हुए रेत के टीलों पर घास व झाड़िया भी नहीं उग पाती। कविता इस माध्यम से संकेत करती है कि मेहनत करके रेगिस्तान में भी जीवन के आधार के निर्मित किये जा सकते हैं।
"तलछटी चट्टानों को तोड़ने दो जोड़ से
मीठे पानी के झरने तो फोड़ कर निकलते हैं।।२"
यह सच है कि चट्टानें दरारों पर से आसानी से टूटती हैं। इसमें दो सम्भावनाएँ हैं एक तो सख्त चट्टानों को ठोस स्थान पर नही कमजोर जगहों पर प्रहार कर तोड़ा जाता है और दूसरा यह कि जल के स्रोत इन चट्टानों के पीछे छिपे पड़े हैं। श्रम का यही उपयुक्त तरीका है मेहनत कम और काम ज्यादा।
"कहीं भी मिलती नहीं बयार ना आसान रास्ते पत्थरों में उगते फूल पगडंडियों पर मिलते है।।"

इस बन्द में कविता एकदम खुला बोलती है। पत्थरों में खिले फूल देखना हो और शीतल मन्द सुगन्धित पवन चाहिये तो आसान सुगम रास्तों पर अर्थात् राजपथ पर मत ढूँढना उसके लिये मेहनत करके ऊबड़ खाबड़ और टेढ़े मेढ़े रास्तों से गुजरना पड़ेगा। सीधे सीधे हस्तिनापुर नहीं मिलते पर मेहनत करके खाण्डवप्रस्थ को इन्द्रप्रस्थ बनाया जा सकता है। 
पुस्तक का नाम इसी नेपथ्य से आया लगता है। झरने को झरना बनना है तो उसे अपनी ताकत और मेहनत से चट्टान के बीच से अपने स्वातन्त्र्य और जीवन के लिये रास्ते स्वयं बनाने होंगे अन्यथा वहाँ घुटन और सड़ाँध के अतिरिक्त कुछ और आशाएँ रखना व्यर्थ है। पेड़ों पर लगे फल तो वास्तव में मेहनत के फल हैं। जिन खेतों में मेहनत कर फसल नहीं उगाई जाती वहाँ केवल खरपतवार ही पैदा होते हैं। कविता श्रम के स्वेद कणों से मरूस्थल में जल और जीवन की तलाश करती है। राजपथ के सेंतमेंत में मिलने वाले सुखों को दरकिनार कर कर्मठता से जीवन को समृद्धशाली बनाना चाहती है। वेदों ने दूसरे के द्वारा कमाई सम्पत्ति को हथियाने वाले व्यक्ति को "दस्यु" कहा है। वस्तुतः इनकी कृति का नाम "कविता के झरनों पर"  सार्थक लगता है। फिर इस कविता के इस बहते झरने से कवि भगीरथ बन कर श्रमसाध्य सफलता की स्रोतस्विनी गंगा लाना चाहता है। 

रामनारायण सोनी
१०*०२=२०

समीक्षा २०


उजाले ज़िन्दगी के

उजालों की दावेदारी
कौन कर सकता है 
अंधेरे में कौन आगे ,
कौन पीछे कह नहीं सकते। 
जिंदगी की जंग में 
बढ़ते हुए हम 
जीते या हारे 
कह नहीं सकते 

पर रखकर भरोसा 
सत्कार्य और निष्काम कर्म पर 
सतत सेवा पथ पर अग्रसर होना होगा 
और कदम आगे बढ़ाना होगा। 
यही विश्वास तो सदा बनाता है 
संबल हमारा, इस कठिन पथ पर।
भरता है उजास 
हर पल 
दिलाता विजय का आभास 
जीवन में हर अगले क्षण

आशीष त्रिवेदी 'सरल'

🙏🌷🙏🌷🙏🌷🙏
मेरी नजर में....

साहित्य और सृजनशीलता परिवर्तन की आधारशिला है जो विगत, वर्तमान और भावी का समावेश करके तथ्यों की कलात्मक अभिव्यक्ति कर जन-मानस की रूचि, युग-प्रवृत्तियों से सम्पृक्त करवाती है। 
उक्त कविता के दो पक्ष हैं। पहला कृष्ण पक्ष दूसरा शुक्ल पक्ष। पहला पक्ष उजाले का क्रमिक क्षय है और दूसरा उजास का क्रमिक विकास। एक ही मास के दोनो पक्ष है। पुस्तक का  नाम भी इसी तर्ज का "भोर का उजास" है। ऐसा लगता है कि पुस्तक का अंकुरण इस कविता से ही प्रस्फुटित हुआ है। "भोर का उजास" के भी दोनों पक्ष हैं। वैदिक वाङ्मय में भोर को संधिकाल ही कहते हैं। रात्रि और दिन का संधिकाल। यह वह तटस्थ काल है जो रात्रि भी देखता है और दिनमान को भी। यहाँ कवि भी दोनों कालों को एक साथ देखता है। वैसे तो संधिकाल सांझ भी है परन्तु उसका संक्रमण रात्रि की ओर है तथा भोर का संक्रमण दिन अर्थात् उजास की ओर। वस्तुतः कविता और पुस्तक दोनों अंधकार के प्रथम पक्ष से प्रकाश के उज्जवल पक्ष की ओर जाने का इशारा करती है। 
एक और कविता "प्रतीक्षा में" यह कहती है:-

"हर एक रात को रहता 
इंतजार एक खुशनुमा सुबह का"
यही है भोर और इस भोर से मिलने वाले उजास की प्रत्याशा। ऐसी कोई रात नहीं जिसकी सुबह न हो और ऐसी कोई सुबह नहीं जो अंधकार से मुक्ति न दिला सके। भोर की संधि पर खड़े हो कर आश्वस्त हो जावें कि जो जीवन सोया पड़ा था उसे उर्मियाँ उपलब्ध होगी ही। वह चल पड़ेगा, कल की तरह आज भी वैसे ही चलेगा और जीवन के प्रति आस्था दृढ़ हो जावेगी। दृढ़ आस्था की परिणिति ही विश्वास है और विश्वास के बगैर प्रेम अकल्पनीय है। वस्तुतः "भोर का उजास" प्रेम पूर्ण जीवन का अप्रतिम संदेश है। वेद कहता है "तमसो मा ज्योतिर्गमय।" कविता और संपूर्ण कृति हमें तमस के कुहासे से निकाल कर हमारा हाथ थाम कर प्रेम से आपूरित जीवन की ओर ले कर चलती है।
"लाती हो संदेश आस्था का 
प्रेम का और विश्वास का 
देती दिलासा प्यार का।
कुछ जो मिला इस जिंदगी में 
अब उसको समेटो 
अब उसको सहेजो"
कविता सावधान भी करती है - ऐसा न हो कि जीवन में प्राप्त परिलब्धियाँ हाथ से रेत की तरह फिसल जाएँ। ऐसा न हो कि जीवन बस एक थकाऊ दौड़ बन कर रह जाए। इसलिये जो मिला वह भुक्ति के लिये है, उसका उपयोग भी सम्यक रूप से करो। सम्यक् दृष्टि से जिया जीवन सफल जीवन की ओर यात्रा है। 
ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत् ।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम् ।।ईशावस्योपनिषद् /१।।
जड़-चेतन प्राणियों वाली यह समस्त सृष्टि परमात्मा से व्याप्त है । मनुष्य इसके पदार्थों का आवश्यकतानुसार भोग करे, परंतु "यह सब मेरा नहीं है" के भाव के साथ’ उनका संग्रह न करे।
लेकिन "यह मेरा नहीं है" भाव निष्काम कर्म योग के आधार और व्यवहार पर ही आ सकता है। यही निष्काम कर्मयोग है। 
तत्र श्रीर्विजयोभूति ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम।।
जहाँ कर्मयोगी अर्जुन सा हो, उसका योगेश्वर जगत्सृष्टा में विश्वास संग हो वहाँ विजय सुनिश्चित है - 
दिलाता विजय का आभास 
जीवन में हर अगले क्षण।।
कविता की अन्तिम लाइन जिजीविषा को पुष्ट करती है। "विजय का आभास जीवन के हर अगले क्षण। 
कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेत् शतं समाः।
एवं त्वयि नरे इतः न अन्यथा अस्ति येन कर्म न लिप्यते ॥
इस संसार में कर्म करते हुए ही मनुष्य को सौ वर्ष जीने की इच्छा करनी चाहिये। हे मानव! तेरे लिए इस प्रकार का ही विधान है, इससे भिन्न किसी और प्रकार का नहीं है, इस प्रकार कर्म करते हुए ही जीने की इच्छा करने से मनुष्य में कर्म का लेप नहीं होता।
सुकृति यह " कृति भोर का उजास" आखिर आखिर में बसन्त को निमन्त्रित करती है। कुल मिला कर संपूर्ण कृति धनात्मक ऊर्जा और जीवन्तता से परिपूर्ण है। 

रामनारायण सोनी
०९.०२.२०२०

Saturday, 8 February 2020

समीक्षा १९

समीक्षा १७

एक पुस्तक .......
"कविता के झरनों पर" विविध भावों का इंद्रधनुष।

"कविता की झरनों पर" के कृतिकार श्री राजेश तिवारी पेशे से इंजीनियर हैं और विद्युत वितरण कंपनी में अपनी विशिष्ट सेवाओं के लिए चिर परिचित हैं। वे अपने प्रारंभिक जीवन काल से ही सुसंस्कृत परिवार और सुरम्य प्राकृतिक परिवेश में पले बढ़े हैं। कहते हैं "होनहार बिरवान के होत चिकने पात", अपनी किशोरवय मे ही इनमें भावों और संवेदनाओं के बीज पड़े और वातावरण पाकर वे प्रस्फुटित हो गए। फलत: कलमकार की कलम से पुष्पित पल्लवित कृति "कविता के झरनों पर" आपके हाथों में है।
कृति के चार सर्ग हैं जिन्हें १ प्रेम, प्रकृति, स्पर्श २ बिरहाञ्चल पर्वत पर ३ कविता के झरनों पर तथा ४ मन की व्यथा नामित किया गया है। कृति के माध्यम से राजेश तिवारी जी ने काव्य जगत में अपनी धमाकेदार उपस्थिति दर्ज करवाई है। अधिकांश कविताओं में उनके जीवन के स्वानुभव और देखे गए साक्षात् परिदृश्यों का परिपक्व समावेश दिखाई देता है। किंचित रचनाओं में कृतिकार ने समाज में व्याप्त विसंगतियों और पीड़ा के प्रति व्याकुलता दिखाई देती है जिसमें उनकी सामाजिक चिंता और चिंतन स्पष्ट दिखाई पड़ता है। इसे बड़ी बेबाकी से उन्होंने निभाया है। अधिकांश कविताओं में रचयिता ने भाषा, छंद विन्यास, अलंकारिकता के अधिक झमेले में न पड़ कर भावनाओं, विचारों का काव्य चित्र प्रस्तुत किया है। कृतिकार की प्रकृति प्रेम को रेखांकित करती कविताएं "कविता के झरनों पर" है। कुनैन की तरह अमृत कलश में "विषपायी विषदंश लिए होठों पर" करारा व्यंग्य करती है। सूखा हुआ पेड़ वातावरण में आ रही विकृति की चिंता स्पष्ट करती है। "प्रेम प्रकृति स्पर्श" और "बिरहाञ्चल पर्वत पर" कोमल श्रृंगार की संकल्पना से हृदय को छू जाती है  "मेरे गांव से" रचना में कृतिकार का सपनों का गांव दिखाई देता है। "तृष्णा की प्यास" और "दुनिया की माया" में अध्यात्म झलकता है। सास बहू संबंध और बेटे की चाह में संबंधों का कटु सत्य उजागर होता है। कुल मिलाकर बहु आयामी कृति पाठकों के लिए एक सकारात्मक संग्रह प्रस्तुत करने का प्रयास है। 
हृदय से अभिनंदन करते हुए श्री राजेश तिवारी को शुभकामना है कि वे शतायु होवें और हिंदी साहित्य की निरंतर सेवा करते रहें।
 
शुभेच्छु 
रामनारायण सोनी

(कल की कड़ी इनकी इसी पुस्तक से ली गई एक कविता की समीक्षा प्रसारित होगी)

https://www.facebook.com/100012307698430/posts/896450027441912/

समीक्षा १८

समीक्षा १६

एक दोहे में प्रच्छन्न औपनिषदेय चिन्तन।

"टूटी सब मदहोशियाँ स्वप्नों की झंकार।
हम जो जागे नींद से जागी अन्तर्धार।।"

                डॉ जय वैरागी

🐖🌹🐖🌹🐖🌹🌹🐖
मेरी नजर में

जागा कौन है और कौन है सोया?
क्या जागे हुए व्यक्ति का अर्थ है कि वह जो सोया नहीं है अथवा जिसे नींद नहीं आई हो? या कि जिसके स्वप्न टूट गये हों? 
क्या सोए हुए व्यक्ति का अर्थ है कि वह जो जाग नहीं रहा है? या जिसे नीद आ गई है? या कि जो जिसको किसी प्रकार का कोई स्वप्न नजर नहीं आ रहा है?
एक तीसरी स्तिथि भी है सोने और जागने की संधि पर जो खड़ा है अर्थात् जो अभी जागने और सोने को बराबर अनुभव कर रहा है। यह अवेयरनेस है।
असल में "जागना" ही वर्तमान में रहना है। जागा हुआ केवल वह है जो केवल वर्तमान में चल रहे समग्र घटना क्रम का दृष्टा है, सजग है। जागा वह है जो व्यर्थ की उलझनों की भूल भुलैया से बाहर है। वह जो भविष्य के अंधेरे कुएँ में सुई जैसी को चीज़ ढूँढने में व्यस्त नही है। वह भी जागा हुआ नही है जो अतीत के महासागर की किसी अतल गहराई में बिन मोतियों की सीपयाँ ढूँढने में लगा हुआ है। 
जो जागा हुआ है वह मूर्छा से बाहर है। जो जागा है वह भीतर से बाहर देखता है, अपनी अन्तर्दृष्टि से देखता है। जो अन्दर भी होश में है और बाहर भी होश में है, जिसकी मूर्छा पूरी तरह टूट गई है वही जागा है। यह टोटल अवेयरनेस है।
नींद से बाहर होना और मूर्च्छा से बाहर होना अलग अलग बात है। जागते हुए वर्तमान में न होना मूर्छा ही है लेकिन सोते हुए को मूर्छा नहीं हो सकती। मूर्छा का टूटना स्वप्नों का अभाव ही है। स्वप्न वह है जो सत्य नही हैं, जो नित्य नही है। जो नित्य है केवल वही "सत्य" है। हमारी जाग्रति अपनी अन्तर्धारा की जाग्रति है।
वस्तुतः वास्तविक जागरण तो अपनी चेतना की अन्तर्धारा का स्फूर्त होना है। अन्तर्धारा के मूल में अन्तश्चेतना का वैभव सन्निहित है।
दो पंक्तियों मे औपनिषदेय चिन्तन की झलक मिलती है।
एक राजा रात्रि में सुखपूर्वक राजमहल में सो गया। उस ने स्वप्न में देखा कि दूसरे राजा ने उस पर आक्रमण कर दिया और उसे जीतकर देश निकाला दे दिया। वह जंगल-जंगल मारा फिर रहा है। भूख-प्यास, सर्दी-गर्मी से बदहाल है। परन्तु जैसे उसकी निद्रा भंग हुई उसके अपार दुःख का अंत हो गया। निद्रा खुलते ही वह अपने को राजमहल में सोने के पलंग पर देखकर प्रसन्न होता है। 
मूर्छा में व्यक्ति स्वस्वरूप को ही भूल जाता है। किन्तु बोध होते ही क्या होता है ?
अनादि मायया सुप्तो यदाजीव: प्रवुध्यते।
अजमनिद्रमस्वप्नमद्वैतंवुध्यते तदा।। माण्डूक्य कारिका।।
अनादि अविद्या में सोया हुआ जीव जब जागता है, तब निद्रा तथा स्वप्न से रहित एवं तीनों गुणों से रहित अपने स्वरूप का साक्षात्कार करता है। यह अन्तर्धारा की जाग्रति है। गीता इस जाग्रति को ज्ञान कहती है।
"ज्ञानं लब्ध्वा परां शांतिमचिरेणाधिगच्छति"
---- श्रीमद्भगवद्गीता

डॉ जय वैरागी के इस एकल छ्न्द (दोहे) में प्रच्छन्न है उपनिषद् के संदेश की आहट प्रतीत होती है। 
साधुवाद

रामनारायण सोनी


Friday, 7 February 2020

समीक्षा १७

समीक्षा १५

एक पुस्तक। "साँसों के साथ मेरे अनुप्रयोग"

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मेरी नजर में

रचना प्रकाशन से प्रकाशित, लेखक डॉ शब्बीर दुबे। प्रकाशन वर्ष २०१९, संस्करण प्रथम। एक ही जिल्द में, सीधी पढ़िये हिन्दी में और १८० डिग्री वर्टीकल घुमाइये तो अंग्रेजी में। दोनो भाषा में स्वयं दुबेजी ने लिखी। पृष्ठ संख्या ३२+ 32. विमोचन दिनांक ४/११/२०१९
पुस्तक में उनकी स्वासों से संबंधित स्वानुभूत अभिक्रियाओं का और उनके प्रायोगिक परिणामों की समन्वित सारगर्भित प्रस्तुति है। 
इसकी प्रस्तावना लिखने का मुझे सौभाग्य प्राप्त हुआ। यथा....

प्रस्तावना
सांस आती है सांस जाती है यह क्रम आजीवन चलता रहता है सिर्फ एक बार जाकर लौटती नहीं है और जीवन समाप्त हो जाता है। हम इस बात से बेखबर हैं कि जीवन और सांस के बीच एक शाश्वत अनुबंध है।
इस महत्व को जिसने जाना उसने जीवन को जाना। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं की सांसो के विषय में चिंतन स्वयमेव जीवन के विषय में चिंतन है। हमारे रोजमर्रा के जीवन में घट रही छोटी-बड़ी घटनाएं हमारे भीतर बाहर को प्रभावित करती है और से प्रभाव सांसों पर भी तुरंत पड़ते हैं। आश्चर्य की बात है कि प्रतिक्षण चल रही सांसो को जागृत होकर हमने कभी देखा ही नहीं।
डॉक्टर शब्बीर दुबे ने सांस के जुड़े तमाम पहलुओं पर चिंतन किया और इस परिप्रेक्ष्य में तथ्यों के आधार पर अध्ययन और मनन किया।  स्वयं अपने जीवन में विभिन्न परीक्षण तथा सफल प्रयोग किए हैं जिनका विवरण इस कृति में उल्लिखित है। इसलिए यह कृति अनूठी हो गई है।
सांस हमारे प्राण को पुष्ट करती है। इससे संबंधित सिद्धांतों के आधार पर अपनी अंतर्यात्रा में श्री दुबे जी ने अपने अनुप्रयोगों में साक्षात अनुभव किया है, जिसे उन्होंने "सांसो से सांसों की ओर" सकारात्मक संज्ञा दी है।
हमारे मन, विचार, भावनाओं को तथा मानसिकता को सांसे कितना प्रभावित करती है तथा उन्हें कैसे नियंत्रित किया जाता है इसका उल्लेख आप इस कृति के माध्यम से जान पाएंगे। महात्मा बुद्ध, ओशो इत्यादि प्रबुद्ध पुरुषों ने जो बातें सांसों की बारे में कही है उनका अनुप्रयोग श्री दुबे जी की साधना का अहम हिस्सा रही है और इसी कारण यह कृति लोकोपयोगी सिद्ध होगी।
उनके अनुप्रयोग "शोध" प्रतीत होते हैं क्योंकि उन्होंने इसे शारीरिक, मानसिक, वैचारिक और आध्यात्मिक स्तर पर जांच परख कर परिणाम जन्य ने बनाया है।
अनुप्रयोगों में प्राणायाम, योगनिद्रा, नेति विपष्यना आदि विधाओं का सरलीकरण प्रयोग शामिल है। डॉक्टर शब्बीर दुबे जी पेशे से चिकित्सक होते हुए भी एक सफल साधक हैं। निश्चित रूप से इनकी कृति आपके लिए बहुत उपयोगी सिद्ध होगी। ईश्वर से विनती है कि वे जीवन में उत्तरोत्तर लोकोपयोगी सृजन करते रहें।

रामनारायण सोनी
१५/१०/२०१९

Wednesday, 5 February 2020

समीक्षा १६

समीक्षा १४

नव गीत
तुम्हारी अनछुई सम्वेदनाओ के कथानक  में ।
मेरी सम्वेदनाओं के सभी प्रतिमान ठहरे है ।।

छुई जब भावनाए उस तपन में नित्य  झुलसा हूँ
गुँथे जब व्यूह शब्दों के उन्ही में नित्य उलझा हूँ 

मुखर जब शब्द जागे है वे सब नव राह बुनते हैं
अगर जागी पराई वेदना नव थाह गुनते है।

कभी सींचा द्रुमों को आज उपवन छंद लगते है।
कथानक के समर्पण में  मधुमय गन्ध लगते है।।

ध्वनि गर कण्ठ से निकली समाहित रागिनी सारी।
वहीं पृष्ठों पर उतरी है पराजित यह व्यथा भारी।।

नयन की कोर पर आकर कोई अहसास सोता हो।
पराई पीर कर धारण कहीं मन जब यह रोता हो।। 

दीया जब थाल में सज कर उतारें आरती तेरी
बजाए दुंदुभी वेला उषा की शंख भर भेरी 

लगे जब छँट गया अंधियार तन का और इस मन का।
कोई नव मन्त्र पूरित अंगुलियों में देख कर मन का।।
अधूरा जाप पूरा हो निगत आवृत्ति यह फैले।
लगे फिर दृश्य के अवलम्ब नयनो के रचे मेले।।

बुझे निस्पंद प्राणों के जगे झंकार अनहद में। 
जगा ब्रम्हांड का चेतन उतर आया है किस हद में।।
अगर गीली समिध मन की है तो बस धुआँ ही है।
अगर संकीर्णता की धार है प्यासा कुआँ ही है।।

तपन की आँच से कुंदन की पीली भित्तियाँ जागे।
तनिक सी अर्चियों के भास से फिर क्यो कोई भागे।।

न खोदो  इस तरह माटी  सभी दिनमान गहरे है

              डॉ जय वैरागी
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मेरी नजर में.....

*तपन की आँच से कुंदन की पीली भित्तियां जागे।*
*तनिक सी अर्चियों के भास से ही क्यो कोई भागे।*
यह नव गीत नव सृजन का गीत है, संस्कार का गीत है, जीत की आधार का गीत है, अस्तित्व की स्वीकारोक्ति का गीत है, निष्प्राणों में प्राणों के संचार का गीत है और तमस से उजास की ओर ले जाता हुआ गीत है।
यह रचना कविता से अधिक सर्जना है। डर के आगे जीत है। डर की कोई हद है। अंग्रेजी में एक टेक्नीकल शब्द है "थ्रेशोल्ड" जिसका अर्थ है कि तमाम कायदे इस लिमिट तक है इसके बाद ये नियम निष्प्रभावी हो जाएँगे। 
जैसे पर्वत शिखर तक पहुँचने के लिए चढ़ाई है फिर मैदान ही मैदान या उतार होता है। कुन्दन तपने से डरेगा तो निखार नही मिल सकेगा। संपूर्ण जीवन संघर्षों से भरा है। लोग संघर्ष को लड़ाई समझने की भूल कर लेते हैं। वस्तुतः वह अपने अस्तित्व को कायम रखने की जद्दोजहद है। दाना पानी की तलाश से डरने वाला पंछी नीड़ में बैठे बैठे मर जाता है। सुन्दर पंखों का स्वामी मुर्गा जीवन भर मैला खाता रहता है तो दूसरा साइबेरिया से जीवन और आनन्द की साहसी उड़ान भर यहाँ कर सफल हो कर लौट जाता है। जो डर गया समझो मर गया। जो आँच से डर गया वह साँच से डर गया। वस्तुतः तपन भी संस्कार है। संस्कार सज्जा तो है ही वह शोधन का सोपान भी है। सोने का पुराना आभूषण तपा कर गलाया जाता है तब लगता है यह प्रक्रिया विध्वंस है परन्तु वास्तव में यह एक नये स्वरूप, नये आकार, नई सज्जा की तैयारी है। और इसलिये तपन के अलावा कोई और रास्ता नही। यही संस्कार है। सोना सोना ही रहेगा संस्कारित हो कर निखर जावेगा। 
चलो आग की तपन से मत डरो तपन को साधना बना लो। सृजन करो। 
सृजन का तात्पर्य है संयोजन, संयोजन का आशय है चीजों को जोड़ना, जोड़ना एक कालबद्ध क्रिया। माली सींचे सौ घड़ा ऋतु आए फल होत। "इधर पौधे को पानी दिया और उधर फल तैयार" ऐसा कभी नही हो सकता। यही यह कविता की कहती है कि..
"कभी सींचा द्रुमों को आज उपवन छंद लगते है।
सिंचन सृजन की एक अभिक्रिया है आदमी के हाथ में बस यही है। काल स्वयं उसका सृष्टि उपक्रम करता है फिर तो बगीचे में जो घटित होगा वह छन्द की तरह गति, लय और ताल निबद्ध होगा। कथानक तो रंगमंच पर चल रहा घटनाक्रम है उसे सृषिकर्ता को समर्पित कर देना चाहिये क्योंकि वह उसका ही है। जो फल अर्थात् पारिणाम होगा वह मधुर होगा। 
कथानक के समर्पण में  मधुमय गन्ध लगते है।।"

"तस्मात्सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भवार्जुन।।गीता।।8/27।।"
कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन।।6.46।।
कर्म करने वालों से भी योगी श्रेष्ठ है, इसलिए हे अर्जुन तुम योगी बनो।।
इसलिए हे पार्थ! तू नित्य योगयुक्त हो जा। समय की गणना और सृजन की कालबद्ध क्रिया मुझ पर छोड़ दे। क्योंकि काल तो मैं स्वयं मैं ही हूँ। कालः कलयतामहम्।10.30।।
गणना करने वालों में काल हूँ।
कविता संवेदनाओं, भावनाओं और कर्मनिष्टा के माध्यम से प्राप्त की जाने वाली एक समग्र अभिक्रिया का संकेत करती है। इन तत्वों का संयोजन योग ही है। यह श्रेष्ठ मार्ग है।
नवगीत तो आज का है पर तत्वतः संस्कृति और संस्कार की प्रचुरता इसमें है।

रामनारायण सोनी
०५/०१/२०२०

समीक्षा १५

समीक्षा १३

एक कविता कृष्णलाल गुप्ता जी की। वे संस्कृत और हिन्दी विषयों में स्नातकोत्तर हैं। श्रेष्ठ अध्यापक रहे हैं, श्रेष्ठ साहित्य सृजक और समाज सेवी हैं। प्रस्तुत कविता 31 मनीषी कवियों के साझा प्रकाशन "काव्य सुरभि" में पृष्ठ क्रमांक 34 पर प्रकाशित हुई है। इस कृति के संपादक भी स्वयं कृष्णलाल जी गुप्ता ही हैं।

*"ईश्वर की अनुभूति"*

       १
कली का खिलना 
उसका फूल के रूप में उभरना 
और सुगंध बिखेरना 
ये सब 
फूल के अस्तित्व का बोध ही नहीं 
परमात्मा की उपस्थिति का संकेत भी है 
हम उसे तलाश सकते हैं 
फूलों की बगिया में, 
पेड़ों पत्तों में भी 
तो आओ 
उसे तलाशें 
       २
जुगनुओं की चमक 
इंद्रधनुष की सतरंगी शोभा 
परिंदों की चहचहाट 
पेड़ों पौधों की हलचल 
इन सब में छिपा है 
वह विराट रूप 
ईश्वर/अल्लाह/परवर दिगार 
कई नाम है उसके 
देखने के लिए वैसी निगाह चाहिए।

कृष्णलाल गुप्ता
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मेरी नजर में

कभी वट वृक्ष के बीज को काट कर देखना और  खुर्दबीन से ढूँढने की कोशीश करना कि उसमें वट वृक्ष के पत्ते, फूल, फल दिख जाएँ। परन्तु निश्चित रूप से वह नही दिखेगा। इसी बीज को बोया जाय, उसे हवा पानी और प्रकाश मिले तो उसमें अंकुरण होता है। बीज वृक्ष के रूप में परिणित हो जाता है। इस समस्त प्रक्रिया में तुम माली हो सकते हो पर तुम अपनी संपूर्ण शक्ति लगा कर भी इस बीज को वृक्ष नही बना सकोगे। हमने ऐसा ही सब कुछ रोज देखा है पर यह कभी जानने का शायद प्रयत्न नहीं किया कि वह कौन है जो अदृष्य रूप से लगा हुआ है इस बीज से वृक्ष बनाने में। कोई क्षण ऐसा नही है जब उसमें विकास नही हुआ है। तुम बो कर सो गए हो पर कोई है जो निरन्तर जाग रहा है और इस सम्पूर्ण रूपान्तरण को अंजाम देने में लगा हुआ है। किसने देखा है उसे और हाँ, देख भी नही सकेगा। बीज जो वृक्ष बन गया, विकास उसका ही हुआ है, अंकुर फूटा, पत्ते आए, शाखाएँ फूल और फल आए। उसने भी नही देखा कि कौन है जो उसे जड़ वस्तु से उसे चेतन की सत्ता में ले आया। न माली समझ पाया न बीज। याने उसे इतना तो याद है कि वह कभी बीज था और अब एक सम्पूर्ण वृक्ष। परन्तु वृक्ष होते ही बीज का अस्तित्व बोध भी जाता रहा। इस समस्त घटना में केवल संकेत मिलता है कि वह शक्ति सदैव यहीं उपलब्ध है जो उसे इस स्थिति तक ले आई। हर क्षण में हर घटना के मूल कारण में उसकी सत्ता का संकेत विद्यमान है। हमे इस तथ्य को और संकेतों की तलाश करनी चाहिये। 
यह तय है कि कारण के बगैर कोई कार्य नही होता। नदी में बाढ़ आयी है तो कहीं पानी बरसा ही है या किसी बाँध की कोई नहर खुली ही है, लोहा गर्म है तो किसीने तपाया ही है, जीवन है तो जन्म हुआ ही है। तुमने खा तो लिया है पर उसे आग में पका कर पोषक तत्व जुदा करने वाला कोई तो है। कौन है वह?
अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः।
प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम्।।भगवद्गीता। 15/14।।
 मैं ही समस्त प्राणियों के देह में स्थित वैश्वानर अग्निरूप होकर प्राण और अपान से युक्त चार प्रकार के अन्न को पचाता हूँ।।

गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा।
पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः ।।15.13।।
मैं ही पृथ्वीमें प्रविष्ट होकर अपनी शक्तिसे समस्त प्राणियोंको धारण करता हूँ; और मैं ही रसमय चन्द्रमाके रूप में समस्त ओषधियों-(वनस्पतियों-) को पुष्ट करता हूँ।

सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च।
वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो
वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम्।।15.15।।
यह अनुभूति परोक्ष है परन्तु हमें जरूरत है उस की ही अपरोक्ष अनुभूति की। चारों ओर संकेत बिखरे पड़े हैं जो उस परम सत्ता को अनुभूत करने का। तलाश होना चाहिये हमें हर दम उसकी अपरोक्ष अनुभूति की। गुलाब को गुलाब कहो या रोज़ या कोई अन्य नाम से पहचानो उसके न गुण बदलेंगे न सुगन्ध। उस सत्ता के गुण वे ही हैं और प्रभाव भी वैसे ही हैं। 
प्रस्तुत कविता सहज शब्दों और सरल रूपकों के माध्यम से जीवन दर्शन के मूल्यों की समझाइश देती है और उस विराट की परम सत्ता की परोक्ष अनुभूति के माध्यम से इस तरह परिचय कराती है कि जैसे प्रत्यक्ष अनुभूति हो रही हो। एक प्रज्ञापूर्ण विहंगम दृष्टि चाहिए जो समस्त व्यष्टि और समष्टि में उस विराट का दर्शन करा सके। 

रामनारायण सोनी
०३.०२.२०२०

समीक्षा १४

समीक्षा १२

क्या कानून और कानून के जानकार केवल साक्ष्य ही के नेत्रों से देखते है? ऐसा हो न हो लेकिन लॉ ग्रेज्युएट, खण्डवा निवासी कवि अरुण सातले जी ने अपनी रचना के माध्यम से पीड़ित मानवता में मौजूद विद्रूप विषमताओं और संवेदनाओं को बहुत मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया है।
एक कविता
"सब दिन अच्छे बीते हैं"
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किसे कहें, कैसे जीते हैं
कुर्ता नहीं, ज़ख़्म सीते हैं

घर, टीन कनस्तर बजते
बाहर सब घट रीते हैं

अमृत देवों के हिस्से,
हम ज़हर छान पीते हैं

मौसम की क्या बात करें
दिन सब अच्छे बीते हैं

चल कबीर बजार चलें
घर में हिंसक चीते हैं 
        ०००       अरुण सातले

(उनकी गरिमामय फेसबुक वॉल से साभार)
(https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=955678644788096&id=100010379071458)
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मेरी नजर में..

कवि की एक अन्य प्रसिद्ध रचना की कुछ पंक्तियाँ हैं....

जब हवाएँ तेज चलती है
तो दीवार पर टँगे
केलेंडर के बारह महीने की 
सभी तारीखें एक साथ
फड़फड़ाने लगती है 
लगता है पूरा साल
ऐसे ही जायगा....
           .. असमय"

यह समय उड़ता रहेगा श्वेत काले पंख ले कर।
ऐसा कोई पिंजरा बना ही नहीं जो इस पंछी को अपने भीतर रोकने का सोच भी ले। यह काल है। इसने सबको देखा है। कविता का सृजक भी इस आलंबन को ले कर सब को देखता है। उसे मानव पर बड़ा वैषम्य और दैन्य दिखाई देता हैं। अभावों में पलता जीवन खाली खाली सा लगता है। इन अभावों को भरते भरते उम्र रीत गई पर वह ऐसे ही बीत गई। कविता इस संधि पर एक पल असमंजस में खड़ी हो जाती है। दिन अच्छी तरह बीत कर अच्छे हो गये या फिर अच्छा हुआ कि आज का यह दिन बीत गया परन्तु अगले ही पग पर उसे अपने दर्द की तुरपाई करता आदमी दिखाई देता है। समय आदमी को काट गया या कि आदमी समय काट रहा है। परन्तु थोड़ा आगे चलते हैं तो कुहासा छँटता है। इसलिये यह कहा जाना कि अच्छा हुआ यह दिन जैसे तैसे गुजर ही गया, सच लगता है। घर में खाली खाली बरतनों का शोर है। असल में बरतन तो खाली ही बजते है। इनका खालीपन जीवन के खालीपन को उजागर करता है।
एक हतभागी मानव का श्रम और कर्मफल कोई और ही उड़ा रहा है। मन्थन तो अनवरत चल रहा है पर अमृत कहीं और ही बँट रहा है। यहाँ तक तो ठीक था पर विडम्बना यह है कि जहर इस निरीह को पीना पड़ रहा है। 
प्रत्यक्ष-दर्शी के रूप में कवि भी यह सब देख रहा है। यहाँ भितर-घात लगाए दिखते हैं लोग। जहाँ उसका दम घुटता है। यहाँ जहर घट-घट में घुला है। जाए तो जाए कहाँ।
अगली पक्तियाँ क्रान्त दर्शी कवि की है। वह पराये दर्द को अपने भीतर जीने लगता है फिर तो उसकी बात  एक यथार्थ को उघाड़ती देती है। यह कविता पीड़ित मानवता की टीस को महसूस कराती है। यह वैषम्य केवल आज ही नही है, आज से भी नहीं है परन्तु कोई तो हो जो इस सत्य का समाज में रखने का साहस करे। सातले जी की लेखनी ने यह जोखिम उठाई है।
सादर

रामनारायण सोनी
28.01.2020

समीक्षा १३

समीक्षा ११

श्री धैर्यशील येवले जी पुलिस विभाग में निरीक्षक हैं। इनकी काव्य साधना उत्तम कोटि की है तथा जीवन के यथार्थ और भारतीय जीवन-दर्शन से ओतप्रोत होती है।

 येवले जी की एक कविता .....

*मंगलमय*
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"तू क्षणभंगुर होते हुए भी
अनंत का हिस्सा है ,
आकाश, वायु, जल 
पृथ्वी, अग्नि 
ने सुनाया वो किस्सा है ।

मोल तेरा कुछ भी नही 
परन्तु तू है अनमोल 
बिखरा दे हवा में 
अपनी सुगंध 
तेरी आत्मा 
परमात्मा का ही हिस्सा है ।

आदित्य रश्मियों का
कर स्वागत 
अंतस के तमस को
बाहर कर 
तू अखंड ज्योति का 
ही हिस्सा है ।

ज्ञान के भवसागर से
हो कर जाते है  मार्ग 
उन्नति के ,
नव वर्ष की शुभघड़ी
लिख रही तेरा ही 
मंगलमय किस्सा है।"

            धैर्यशील येवले, इंदौर

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*मेरी नजर में*.......

"पुलिस" शब्द के नाम से ही हमें एक सख्त व्यक्तित्व और कृतित्व स्मरण हो आता है लेकिन.... 

कौन कहता है कि 
सख्त चट्टानों में फूल नहीं खिलते,
खारे समन्दर के किनारों पर भी
नारियल में मीठा पानी है
काँटों भरी साखों पर भी
गुलाब को कोई हानी है?
सख्त पसलियों के बीचों बीच
नर्म दिल की कोई सानी है?

उनकी इस कविता के विभिन्न पदों में गीता और औपनिषदेय चिन्तन झलकता है:-

"तू क्षणभंगुर होते हुए भी
अनन्त का हिस्सा है,
आकाश, वायु, जल 
पृथ्वी, अग्नि 
ने सुनाया वो किस्सा है।"
पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ।
जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु।। गीता।।7.9।।
क्योंकि इन सब में पस्मात्मा का निवास है।
 
"तेरी आत्मा 
परमात्मा का ही हिस्सा है ।"
ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः।
मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति।। गीता।।15.7।।
इस संसारमें जीव बना हुआ आत्मा मेरा ही सनातन अंश है परन्तु वह प्रकृति में स्थित मन और पाँचों इन्द्रियोंको आकर्षित करता है (अपना मान लेता है)।
"आदित्य रश्मियों 
कर स्वागत 
अंतस के तमस को
बाहर कर"
असुर्याः नाम ते लोकाः अन्धेन तमसा आवृताः  सन्ति । ये के च जनाः आत्महनः सन्ति ते प्रेत्य तान् अभिगच्छति ।।3/ईशावास्योपनिषद्।।
वे लोक सूर्य से रहित हैं और गाढ़े अन्धकार से आच्छादित हैं। उन लोकों को वे सभी लोग यहां से प्रयाण करने पर पहुंचते हैं जो कोई भी अपनी आत्मा का हनन करते हैं।
इसलिये तमसो मा ज्योतिर्गमय।।
"तू अखंड ज्योति का 
ही हिस्सा है।"
ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते।
ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि  सर्वस्य विष्ठितम्।।गीता 15/18।।
समस्त ज्योतियों में स्थित स्थूल ज्योति में उसी ज्योति को श्रेष्ठ कहा गया है, जो सबके हृदय में ज्ञान, ज्ञेय और ज्ञानगम्य तीनों रूपों में प्रविष्ट है।
"तू क्षणभंगुर होते हुए भी
अनंत का हिस्सा है।"
ॐ इत्येतदक्षरमिदꣳ सर्वं तस्योपव्याख्यानंभूतं भवद् भविष्यदिति सर्वमोङ्कार एवयच्चान्यत् त्रिकालातीतं तदप्योङ्कार एव।।माण्डूक्योपनिषद्।।1।।
'ॐ' अक्षर अविनाशी 'ब्रह्म' का प्रतीक है। उसकी महिमा प्रकट ब्रह्माण्ड से होती है। भूत, भविष्य और वर्तमान, तीनों कालों वाला यह संसार 'ॐकार' ही है। यह सम्पूर्ण जगत् 'ब्रह्म-रूप' है। 'आत्मा' भी ब्रह्म का ही स्वरूप है। 'ब्रह्म' और 'आत्मा' चार चरण वाला स्थूल या प्रत्यक्ष, सूक्ष्म, कारण तथा अव्यक्त रूपों में प्रभाव डालने वाला है। 
"आकाश, वायु, जल 
पृथ्वी, अग्नि 
ने सुनाया वो किस्सा है।"
भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च।
अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा।।गीता।।7/4।।
पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश तथा मन, बुद्धि और अहंकार - यह आठ प्रकार से विभक्त हुई मेरी प्रकृति है।।
धैर्यशील येवले जी ने आज जो अपनी कविता में सहज रूप में जो जो लिख डाला वह मुझे गीतात्मक और औपनिषदेय चिन्तन लगा।
समस्त व्यष्टि और समष्टि में ब्रह्म को समझना श्रेष्ठ चिन्तन है।

रामनारायण सोनी

समीक्षा १२

एक कविता भारती सोनी की उनकी पुस्तक "आलापिनी"   से। श्रीमति भारती सोनी झाबुआ वनाञ्चल की प्रसिद्ध समाज सेविका, कवियित्री और शास्त्रीय संगीत की प्रशिक्षक हैं। उनके सेवा कार्य संस्कृति साहित्य और शिक्षा को जोड़ते हैं।

प्रस्तुत है कविता "बचपन"

"मेरा बचपन जिया है मैने
आजादी को पिया है मैने"
  अन्नी-चन्नी साल-सतोली
  पव्वा-पाँचे गुड़िया मेरी
माँ की डाँट पिता की झिड़की
बहन हठीली भाई झक्की
  चुपके-चुपके चोरी-चोरी
  चाराने की बरफ की चुस्की
पकड़म-पाटी लंगड़ी-ताली
दिन भर खेल की खीचा तानी
  संजा की वो शाम सुहानी
  गोबर के हाथों से क्यारी
फूल पत्तियाँ कला कोट में
हाथी घोड़ा और पालकी
  भाई के संग जिद क्रिकेट की
  गुल्ली डंडा, दड़ी कबड्डी
पर पिंजरे से पिंजरा प्यारा
रूप था न्यारा परिसर न्यारा
  लुप्त हो गए वे सजीव पल
  अब तो जीवन, हाँ बस जीवन

                      भारती सोनी
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मेरी नजर में

"मेरा बचपन जिया है मैने
आजादी को पिया है मैने"
पंक्तियाँ अतीत की उन वादियों में शब्द-मञ्च के जरिये खड़ी कर देती है जो हर सक्ष के जीवन का स्वर्णिम काल होता है। जो लौट कर तो नहीं आता है पर वे स्मृतियाँ इतनी प्रगाढ़ हो उठती हैं कि भीतर ही एक उच्छृंखल बच्चा जीवन्त हो उठता है। तो चलो चलें, जरा कवि की इस कृति के साथ थोड़ा बच्चा हो लें। जहाँ न पाने की चिन्ता है न खोने का डर है/सारा गाँव अपना घर है। शहर के खेलों में और गाँव के खेलों में थोड़ा अन्तर रहा है। यहाँ संकेत गाँव कस्बों के खेलों का है। जो भाषा और शब्द उपयोग किये गये हैं वह ग्रामीण अंचल में प्रयुक्त होते रहे हैं। इसलिये यह कविता "बचपन की मस्ती", "उस काल के "खेलों के प्रकार" और विशेष संबोधनों" की जानकारी की त्रिवेणी बहाती है। आप अच्छी तरह समझ सकते है कि साहित्य से ऐसे शब्दों का विलोप हो जाना एक युगीन-संस्कृति का विलुप्त हो जाना ही है। 
स्कूल में पढ़ा था साहित्य समाज का दर्पण है। जिस साहित्य रूपी दर्पण में समाज दिखाई दे वह कालजयी हो जाता है। साहित्य संस्कृति और संस्कार का संवाहक है। लोकसंस्कृति, लोकमंगल और लोकरंजन का संरक्षण केवल साहित्य ही से संभव है चाहे वह पुस्तकीय हो, चाहे दृष्य हो जा वह चाहे श्रव्य हो। जिन रचनाकारों ने यह काम किया है वे धन्यवाद के पात्र हैं। उन्होंने संस्कृति को करीने से सहेजा है। भारती जी ने अपनी रचना के माध्यम से ऐसे ही कुछ दृष्यों को जीवन्त कर दिया है।
लोकसंस्कृति जिस जमीन पर पनपती है वह अभी भी कायम हैं। उसके कार्य में परिवर्तन जरूर हुआ है। गाँव अब कितने बदल गए हैं। जीवन शैली ही बदल गई है लेकिन शुक्र है कि मूल संवेदना अभी भी जस की तस मौजूद है। हमारी जिम्मेदारी है इन संवेदना का अनुरक्षण करने और उन्हें तरज़ीह देने की।
स्त्रियों ने अधिकतर लोकगीतों की रचना की है, उन्हें गाया ही नहीं उनको जिया भी है। उनके पारम्परिक स्वरूप का निर्वाह भी वे बखूबी करती हैं। लोकगीतों की लय इतनी स्वाभाविक हो जाती है कि वे शास्त्रीय रूप ले लेती है और पीढ़ी दर पीढ़ी चलती रहती है। लेकिन लोकगीतों की भाषाएं और बोलीयाँ क्षतिग्रस्त हो रही हैं जिसे बचाने की लिए काम करने की जरूरत है। यहाँ कवियित्री ने लोकगीतों और लोकरंजन में प्रयुक्त मूल शब्दों को, जैसे सितोली, पव्वा-पाँचे, चाराने, पकड़म-पाटी, लंगड़ी-ताली, संजा, कला-कोट, दड़ी-कबड्डी आदि यथावत रख कर उन्हें जीवन्त रखा है। इसके लिए उनकी प्रशंसा की जानी चाहिये। इस कविता में बोलचाल के प्रवाहवान शब्द हैं जैसे चाराने, दड़ी, पकड़म-पाटी आदि। ये अगली पीढ़ियों के लिये सनद होगी।
लोकगीत अध्ययन करने का विषय नहीं है इसलिये कवियित्री ने उस बचपन को जिया है
और आजादी को पिया है। उन्होंने लोक को पाश्चात्य फोक से अलग कर विवेचन करने की जरूरत पर बल दिया। हमें लोकगीतों की प्रासंगिकता पर आ रहे खतरों को पहचानने और उसका मुकाबला करने की जरूरत है। 
गांव में रहने वाले लोगों की सांस्कृतिक और सामुदायिक जीवन का ह्रास हो रहा है उसमें सामुदायिकता से उपजे गीत शायद ही बचें। परन्तु इस कविता में प्रयास किया गया है। इन प्रतिनिधि शब्दों में संस्कृति की छाप है। इनका उल्लेख हमारे विगत जीवन के मूल में रहे यथार्थ से उपजी अभिव्यक्ति हैं। ईश्वर करे इनके ऊपर बाजारवाद, फूहड़ता, सांस्कृतिक दरिद्रता का खतरों से बची रहे।

रामनारायण सोनी
26.01.2020

काव्य की अन्तर्धाराएँ विषयक

काव्य की अन्तर्धाराएँ एक प्रयोग है।  यह समालोचना के सम्पूर्ण परिक्षेत्र में नूतन प्रयोग है। क्योंकि अधिकतर समीक्षाएँ या तो एक कवि, या एक काव...