उजाले ज़िन्दगी के
उजालों की दावेदारी
कौन कर सकता है
अंधेरे में कौन आगे ,
कौन पीछे कह नहीं सकते।
जिंदगी की जंग में
बढ़ते हुए हम
जीते या हारे
कह नहीं सकते
पर रखकर भरोसा
सत्कार्य और निष्काम कर्म पर
सतत सेवा पथ पर अग्रसर होना होगा
और कदम आगे बढ़ाना होगा।
यही विश्वास तो सदा बनाता है
संबल हमारा, इस कठिन पथ पर।
भरता है उजास
हर पल
दिलाता विजय का आभास
जीवन में हर अगले क्षण
आशीष त्रिवेदी 'सरल'
🙏🌷🙏🌷🙏🌷🙏
मेरी नजर में....
साहित्य और सृजनशीलता परिवर्तन की आधारशिला है जो विगत, वर्तमान और भावी का समावेश करके तथ्यों की कलात्मक अभिव्यक्ति कर जन-मानस की रूचि, युग-प्रवृत्तियों से सम्पृक्त करवाती है।
उक्त कविता के दो पक्ष हैं। पहला कृष्ण पक्ष दूसरा शुक्ल पक्ष। पहला पक्ष उजाले का क्रमिक क्षय है और दूसरा उजास का क्रमिक विकास। एक ही मास के दोनो पक्ष है। पुस्तक का नाम भी इसी तर्ज का "भोर का उजास" है। ऐसा लगता है कि पुस्तक का अंकुरण इस कविता से ही प्रस्फुटित हुआ है। "भोर का उजास" के भी दोनों पक्ष हैं। वैदिक वाङ्मय में भोर को संधिकाल ही कहते हैं। रात्रि और दिन का संधिकाल। यह वह तटस्थ काल है जो रात्रि भी देखता है और दिनमान को भी। यहाँ कवि भी दोनों कालों को एक साथ देखता है। वैसे तो संधिकाल सांझ भी है परन्तु उसका संक्रमण रात्रि की ओर है तथा भोर का संक्रमण दिन अर्थात् उजास की ओर। वस्तुतः कविता और पुस्तक दोनों अंधकार के प्रथम पक्ष से प्रकाश के उज्जवल पक्ष की ओर जाने का इशारा करती है।
एक और कविता "प्रतीक्षा में" यह कहती है:-
"हर एक रात को रहता
इंतजार एक खुशनुमा सुबह का"
यही है भोर और इस भोर से मिलने वाले उजास की प्रत्याशा। ऐसी कोई रात नहीं जिसकी सुबह न हो और ऐसी कोई सुबह नहीं जो अंधकार से मुक्ति न दिला सके। भोर की संधि पर खड़े हो कर आश्वस्त हो जावें कि जो जीवन सोया पड़ा था उसे उर्मियाँ उपलब्ध होगी ही। वह चल पड़ेगा, कल की तरह आज भी वैसे ही चलेगा और जीवन के प्रति आस्था दृढ़ हो जावेगी। दृढ़ आस्था की परिणिति ही विश्वास है और विश्वास के बगैर प्रेम अकल्पनीय है। वस्तुतः "भोर का उजास" प्रेम पूर्ण जीवन का अप्रतिम संदेश है। वेद कहता है "तमसो मा ज्योतिर्गमय।" कविता और संपूर्ण कृति हमें तमस के कुहासे से निकाल कर हमारा हाथ थाम कर प्रेम से आपूरित जीवन की ओर ले कर चलती है।
"लाती हो संदेश आस्था का
प्रेम का और विश्वास का
देती दिलासा प्यार का।
कुछ जो मिला इस जिंदगी में
अब उसको समेटो
अब उसको सहेजो"
कविता सावधान भी करती है - ऐसा न हो कि जीवन में प्राप्त परिलब्धियाँ हाथ से रेत की तरह फिसल जाएँ। ऐसा न हो कि जीवन बस एक थकाऊ दौड़ बन कर रह जाए। इसलिये जो मिला वह भुक्ति के लिये है, उसका उपयोग भी सम्यक रूप से करो। सम्यक् दृष्टि से जिया जीवन सफल जीवन की ओर यात्रा है।
ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत् ।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम् ।।ईशावस्योपनिषद् /१।।
जड़-चेतन प्राणियों वाली यह समस्त सृष्टि परमात्मा से व्याप्त है । मनुष्य इसके पदार्थों का आवश्यकतानुसार भोग करे, परंतु "यह सब मेरा नहीं है" के भाव के साथ’ उनका संग्रह न करे।
लेकिन "यह मेरा नहीं है" भाव निष्काम कर्म योग के आधार और व्यवहार पर ही आ सकता है। यही निष्काम कर्मयोग है।
तत्र श्रीर्विजयोभूति ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम।।
जहाँ कर्मयोगी अर्जुन सा हो, उसका योगेश्वर जगत्सृष्टा में विश्वास संग हो वहाँ विजय सुनिश्चित है -
दिलाता विजय का आभास
जीवन में हर अगले क्षण।।
कविता की अन्तिम लाइन जिजीविषा को पुष्ट करती है। "विजय का आभास जीवन के हर अगले क्षण।
कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेत् शतं समाः।
एवं त्वयि नरे इतः न अन्यथा अस्ति येन कर्म न लिप्यते ॥
इस संसार में कर्म करते हुए ही मनुष्य को सौ वर्ष जीने की इच्छा करनी चाहिये। हे मानव! तेरे लिए इस प्रकार का ही विधान है, इससे भिन्न किसी और प्रकार का नहीं है, इस प्रकार कर्म करते हुए ही जीने की इच्छा करने से मनुष्य में कर्म का लेप नहीं होता।
सुकृति यह " कृति भोर का उजास" आखिर आखिर में बसन्त को निमन्त्रित करती है। कुल मिला कर संपूर्ण कृति धनात्मक ऊर्जा और जीवन्तता से परिपूर्ण है।
रामनारायण सोनी
०९.०२.२०२०
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