हिन्दी कविता की समीक्षाएं

Thursday, 24 December 2020

काव्य की अन्तर्धाराएँ विषयक

काव्य की अन्तर्धाराएँ एक प्रयोग है। 
यह समालोचना के सम्पूर्ण परिक्षेत्र में नूतन प्रयोग है। क्योंकि अधिकतर समीक्षाएँ या तो एक कवि, या एक काव्य/कृति, या एक प्रकार की रचनाओं पर आधारित होती हैं।
लेकिन "काव्य की अन्तर्धारा में कुछ अलग प्रयोग है।
१. इसमें २२ रचनाकारों की ४२ रचनाएँ सम्मिलित हैं जिनकी समीक्षाएँ की गई हैं। वस्तुतः यह कविताओं की समीक्षाओं का संकलन है।
२. इसमें चार पुस्तकों की संक्षिप्त समीक्षाएँ भी सम्मिलित हैं।
३. कविताओं का चुनाव कविताओं की भावात्मक अभिव्यक्ति और उनकी गुणवत्ता के आधार पर स्वयं ही किया गया है, इस हेतु किसी रचनाकार का न तो कोई अनुरोध था न ही किसी की रिकमण्डेशन ही प्राप्त हुई थी। 
४. विभिन्न कविताएँ भिन्न-भिन्न विषयवस्तु और कथ्यों के आधार लिये हुए है इसलिये इसके क्रमवार पठन में भी नित्य नवीनता बनी रहती है।
५. समीक्षाएँ स्वतन्त्र रूप से लिखी गई है न ही उनकी सहमति/असहमति की आवश्यकता पड़ी।
६. अधिकतर समीक्षाओं को फेसबुक पर पाठकों का स्नेह और भरपूर समर्थन तथा प्रोत्साहन मिला।
  अपने प्रिय पाठकों को सादर सस्नेह समर्पित।

रामनारायण सोनी

Tuesday, 21 April 2020

समीक्षा ४५

समीक्षाएँ डॉ पहलवान

नए दिन का मतलब

खिड़की पर चिड़िया ने आकर
चीजें कहां
मैंने चादर अपने ऊपर खींच ली।
चिड़िया फिर चीं-चीं बोली,
अब मैंने कहा -
सुबह-सुबह क्यों सताती हो,
सोने दो ना।
चिड़िया बोली -
मैं तुम्हें उठाने आई हूँ
सवेरा हो गया
नया दिन शुरू हो गया,
नया दिन मतलब
तुम्हारे जीवन की किताब का
एक नया पन्ना।

बात की शुरुआत अन्तिम पद से करना होगी।
नया दिन मतलब तुम्हारे जीवन की किताब का
एक नया पन्ना। जीवन एक किताब है। किताब के पन्ने समय की कलम से लिखे गये या लिखे जाने वाले आलेख हैं। नये दिन का मतलब हमारे जीवन की किताब का एक नया पन्ना है। हर सक्ष को हर दिन अपने जीवन की किताब का एक नया पन्ना मिलता है। चाहो तो इस पर लिखो या कुछ न लिखो। जैसा भी हो यह पन्ना तो पलटेगा ही। यह स्वाँस के अंतिम छोर तक चलता रहेगा। समय अपनी धुरी पर अपनी निर्बाध गति से चलता है। जीना तो वर्तमान में ही है और न ही जीवन की वास्तविकता से दूर भागा जा सकता है। हर नए दिन का स्वागत होना चाहिये। बस आज सुबह उसी किरण को पकड़ कर उजालों की तलाशना शुरू कर देना चाहिये।
कठोपनिषद् का सूत्र सफल जीवन का मूलमंत्र  है।
"उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत।" कुछ लोग इसका अर्थ थोड़ा इस तरह करते हैं - उठो, जागो, और जानकार पुरुषों का श्रेष्ठ सान्निध्य प्राप्त करो। लेकिन 'उत्तिष्ठ' का शब्दार्थ है उठ कर खड़े होना। जाग्र का अर्थ जागना नही है वरन् जाग्रति को प्राप्त होना है, चेतना को जगाना है। उठ कर खड़े होना एक भाव है कि आलस्य, प्रमाद, अक्रियाशीलता आदि का त्याग करो। अपनी चेतना, जो तुम में सर्वत्र व्याप्त है, उसे जाग्रत करो। शेर जंगल का राजा होता है, अपरिमित बल का स्वामी भी है और शिकार वहाँ है भी परन्तु -
उद्योगिनं हि पुरुष सिंहमुपैति लक्ष्मी 
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः।।
सोते हए शेर के मुख में शिकार आ कर नही गिरेगा उठ कर शिकार करना पड़ेगा। इसलिये उपनिषद् का ऋषि संदेश करता है कि खड़े हो जाओ और सक्रिय हो जाओ।
कविता में चिड़िया ऋषि ही की तरह सोते हुए "मैं" को चीं - चीं कर जगा रही है। हमारा शरीर और मन बड़ा प्रमादी है। उसे आराम बहुत पसन्द है। चादर खींच कर वापस पड़े रहना प्रमाद और आलस्य ही तो है। चिड़िया की बार बार की चिचियाहट प्रमाद की लय को तोड़ कर एक नये उजाले का, नये उत्साह का, नये दिन का शुरू होना बता रही है। आज का का यह नया दिन नये प्रश्न, नई चुनौतियाँ, नये कर्मक्षेत्र, नये लक्ष्य ले कर आया है। तुम्हारे जीवन के कृतीत्व रूपी किताब के पिछले पन्नों के साथ इस पन्ने को भी जुड़ना है।
ऐसा लगता है कि हम अभी तक प्रमाद भरी एक प्रगाढ़ निद्रा में सो रहे थे और अभी अभी चिड़िया ने आकर हमें झकझोर कर खड़ा कर दिया है। अब सामने लक्ष्य होंगे, रास्ते होंगे, विकल्प तथा संकल्प होंगे और होंगी जीवन को जीने की अदम्य इच्छा। मानो तो यह चिड़िया हमें हम से परिचय कराने आयी है।

रामनारायण सोनी
२१.४.२०२०


Tuesday, 31 March 2020

समीक्षा ४२

समीक्षा ४२

एक प्रेम कथा बेंच पर

अरे! तुम?
इस तरह? यहाँ?
आज अचानक कैसे?
आओ, आओ बैठें 
जमाने गुजर गए 
कुछ अपनी कहें 
कुछ तुम्हारी सुनें

हाँ कुछ भी नहीं बदला है 
तुम्हारे जाने के बाद 
सब कुछ वैसा ही है यहाँ 
मेरे आस-पास 
वैसे तो बहुत कुछ 
हुआ है यहाँ
हुआ तो होगा 
वहाँ भी 

आओ... चाहो तो 
हल्का कर लें बोझ
अब तक के अनकहे का 
अब तक के सहे का 
हाँ ठीक वैसा ही हूँ
पहले की तरह 
रोज आता हूँ
यहां 
इस बेंच पर 
......
हाँ अकेला ही तो 

और क्या सुनाऊँ?
कहने को कुछ नया नहीं है 
बरस पर बरस बीते हैं 
अब तो गीत सुरों से रीते हैं 
रातें हारी दिन जीते हैं 
बस 
इसी तरह जीते हैं 
हाँ तुम भी तो 
अपनी कुछ कहो 
बताओ कब तक यहाँ हो?
..........
..........
अरे नहीं तो?
..........
..........
क्यों क्या हुआ ऐसा ?
...........
...........
चलो जाने भी दो सब 
हमारी तब और अब को 
अब मिल जाने दो 
तुम्हारे कल को हारने 
और आज को जीत जाने दो

अरविन्द व्यास

शब्दवट 
पृष्ठ ३४
सेवानिवृत्त प्राचार्य
🌷🌹🌷🌹🌷🌹

मेरी नजर में

प्रेम कथा बेंच पर
कविता में कोई कथा है, यह कथा प्रेम(?) कथा है। कथा बेंच पर बैठ कर सुनाई जा रही है।
यह चार प्रश्नों से प्रारंभ होती है-अरे! तुम?,
इस तरह?, यहाँ?, आज अचानक कैसे?
"तुम" किसे सम्बोधित है यह आगे पता चलेगा। "यहाँ" से लगता है परिदृष्य में कोई बगीचा है उसमें कहीं एक बेंच है और प्रेम कथा इसी रंगमंच पर कही जा रही है। प्रेम कथा प्रेम की कथा है या नहीं यह तो अन्त में ही पता चल पाएगा पर यह साफ-साफ समझ में जाता है कि-
आओ, आओ बैठें
जमाने गुजर गए
कुछ अपनी कहें
कुछ तुम्हारी सुनें

कहानी जो कुछ भी हो वह अपनी जगह है पर वह कहानी अभिव्यक्ति चाहती है। उसमें पैदा हुई घुटन से ऐसा लगता है जैसे जमीन पर बारूदी सुरंगें बिछी जिसमें अचानक किसी दबाव के विस्फ़ोट हो जावेगा। "जमाने गुजर गए, कुछ अपनी कहें, कुछ तुम्हारी सुनें।" गुजरे जमाने का तात्पर्य उस गुजरे जीवन से है जो व्यस्त रहा, क्रियात्मकता से भरा रहा और जहाँ आस-पास रिश्ते ही रिश्ते थे परन्तु सबसे खास बात यह थी कि वे रिश्ते कुछ कहते भी थे और सुनते भी थे। 
पर आज के बदले परिवेश में अनकहे भाव, अनकहे जजबात ही वे बारूदी सुरंगें है जो कहीं सुनाए नहीं गए तो विप्लव खड़ा करेंगे। परन्तु आज इस तथा-कथा को सुनेगा कौन? सुनने वाले के पास समय नहीं है, समय है तो उसे पसन्द नहीं है। कभी गाँव में बड़े बूढ़े कहावत कहा करते थे कि तेरा दुखड़ा कोई नही सुने तो जंगल जाया कर और खेजड़ी को सुना आया कर। खेजड़ी एक ऐसा छोटा वृक्ष होता है जो लगभग आदमी के कद का होता है। उसे अपनी सुनाने वाले का जी हल्का हो जाता था। पर अब ये सब वृक्ष कट गए हैं। गाँव में एक चौपाल संस्कृति हुआ करती थी जहाँ कोई कुछ कहता था और बाकी सब उसकी सुनते थे। बाद में ये चौपाल पेड़ों की छाँव वाले ओटलों (चबूतरों) में बदल गए जो कुछ हद तक चौपालों का प्रतिनिधित्व करते रहे। ये वे सामुदायिक स्थल थे जहाँ कवि की ये पंक्तियाँ "कुछ अपनी कहें, कुछ तुम्हारी सुनें" चरितार्थ होती थी। इन जगहों पर कहने वाले भी थे और सुनने वाले भी थे। यों तो हर पुरानी पीढी नई नस्लों से शिकायतें करती चली आयी है कि भई जमाना कितना बदल गया है, वगैरह-वगैरह। परन्तु जो परिदृष्य पिछली आधी सदी में बदला है उसने जीवनशैली, सोच और आदमी की आचारसंहिता में आमूल चूल परिवर्तन कर दिया है। लोगों के पास आपस मे कहने सुनने का वक्त नहीं रह गया है। कविता में चल रही कथा के नेपथ्य में इन्हीं वृत्तियों की अनुगूँज स्पष्ट सुनाई पड़ रही है। चौपाल, ओटले जैसे सामुदायिक स्थल या जंगल की खेजड़ी की जगह पार्क में एक कोने में पड़ी इस बेंच ने ले ली है। हमारा नायक यहाँ रोज आता है। आज उसने कहने सुनने का अपना ढंग खोज लिया है।
"बताओ कब तक यहाँ हो?
..........
.........."
इसमें "बताओ कब तक यहाँ हो? एक एरियल गन से दागा गया पश्न है परन्तु यह प्रश्न नहीं है बस सुरंग का खाली होना है जो आगे दो पंक्तियाँ  के ........ अर्थात् इस अनलिखे शून्य से स्पष्ट है। यही कविता के प्रारंभिक चार प्रश्नों का तात्पर्य भी है।
और यह संवाद भी विचित्र संवाद है:-
"अरे नहीं तो?
..........
..........
क्यों क्या हुआ ऐसा ?
...........
..........."
कविता का अत्यन्त मार्मिक हृदयस्थल है जो पाठक को आंदोलित करता है। यहाँ खाली छोड़ी गई पंक्तियाँ सबसे ज्यादा बोल रही हैं। इस प्रेमकथा की ये पंक्तियाँ केवल नायक सुन रहा है उस सहनायक की आवाज जो अपनी कल्पना-शीलता से नायक ने गढ़ लिया है और बड़े स्नेह से इस बेंच पर बैठाल लिया है कुछ अनकहे वाकियात कहने को। कविता पहले ही कह चुकी है कि जो यहाँ मेरे साथ घटा है वह तुम्हारे साथ भी वहाँ वैसा हुआ होगा यानी तुम्हारा जीवन भी ऐसा ही चला होगा और तुम्हें भी कोई सुनने वाला नहीं मिला होगा।
नायक विक्रम बना इस अपने भीतर पैदा हुए इस शून्य के वैताल को कब तक पीठ पर लाद कर चलेगा? कविता में पूछे गये प्रश्न यक्ष प्रश्न से बहुत छोटे हैं और उस बगीचे की फिजाएँ युधिष्ठिर की तरह नही है जो कोई जवाब दे पायेगी।
आज समाज में संवादहीनता बढ़ती जा रही है। कविता प्रश्न नहीं एक खालीपन को उघाड़ती है। खालीपन आदमी से आदमी के बीच का, खालीपन पीढ़ियों के बीच का, खालीपन रिश्तों के बीच का, खालीपन परस्पर साहचर्य का। कविता चिन्ता नहीं चिन्तन प्रस्तुत कर रही है। इस रचना के सृजन के समय यही कवि की अन्तर्वृत्ति रही होगी। कविता स्वयं एक संवाद है जो पाठक को सरसता प्रदान करता है, तसल्ली देता है। यहाँ कहीं भी व्यथा, आक्रोश और पीड़ा का प्रदर्शन नहीं है इसलिये यह कथा प्रेम कथा ही है।

रामनारायण सोनी
३१/०३/२०२०


Thursday, 19 March 2020

कवि परिचय

Probable format
नाम- भगवानदास गुहा (बी.डी. गुहा)
पिता का नाम:- स्व. श्री मांगीलाल गुहा 
शिक्षा:- एम.ए. (समाज शास्त्र)
साहित्यिक गतिविधि: -कालेज के दिनों से पूर्व में "व्यंग -हास्य" लेख, समाचार-पत्रों में प्रकाशित
कविता के प्रधान विषय: दार्शनिक, प्रेरक, क्षणिकाये, लघु कविताएं एवम "चित्र-काव्य" 
प्रकाशन;- साझा काव्य संग्रह "काव्य सौरभ" एवं शब्दवट में
सम्मान:- नार्मदीय समाज रायपुर से "नार्मदीय रत्न" सम्मान, राष्ट्रीय कवि चौपाल से नार्मदीय लोक, नार्मदीय जगत, अभिरुचि नर्मदा प्रखर में 
विशेष:- अब तक लगभग 1000 कविताएं क्षणिकाएं लिख चुके हैं, सतत लेखन।
सम्प्रति:- कृषि विभाग छत्तीसगढ़ से 2019 में सेवा निवृत्त।
आवर्ती उपलब्धियाँ:- नारियल से भूमिगत जल स्रोतोंका सफल चयन अब तक 3000 सफल नलकूप जल स्त्रोत की खोज।

नाम - रशीद अहमद शेख
साहित्यिक उपनाम - ‘रशीद’
जन्मतिथि- ०१/०४/१९५१
भाषा ज्ञान - हिन्दी, अंग्रेज़ी, उर्दू, संस्कृत
शिक्षा - एम. ए. (हिन्दी और अंग्रेज़ी साहित्य), बी. एस.सी., बी. एड., एल.एल.बी., साहित्य रत्न, कोविद
कार्य - सेवानिवृत प्राचार्य
लेखन विधा - कविता,गीत, ग़ज़ल, मुक्तक, दोहे तथा लघुकथा, कहानी, आलेख आदि।
प्रकाशन - अब तक लगभग दो दर्जन साझा काव्य संकलनों में रचनाएँ प्रकाशित हो चुकी हैं। पांच काव्य संकलनों का संपादन किया है।
प्राप्त सम्मान-पुरस्कार - हिंदी रक्षक मंच इंदौर द्वारा हिन्दी रक्षक २०२० सम्मान एवं विभिन्न प्रतिष्ठित साहित्यिक संस्थानों द्वारा अनेकानेक अलंकरण प्राप्त।
विशेष उपलब्धि - हिन्दी और अंग्रेजी का राज्य प्रशिक्षक 
लेखनी का उद्देश्य ~ राष्ट्रीय एकता, सामाजिक समरसता


डॉ. मुरलीधर चाँदनीवाला 

जन्म:- 12 अक्टूबर 1951 को धार, मध्यप्रदेश  स्कूली शिक्षा:- अम्बिकापुर, होशंगाबाद, सिवनी और उज्जैन में। 
उच्चशिक्षा:- एम.ए.(संस्कृत साहित्य), पी.एच.डी. 1976 में। 
सेवा:- 42 वर्षों तक  अध्यापन, शिक्षाधिकारी और प्राचार्य के पद पर। 
कार्यस्थल:- मंदसौर, भोपाल, उज्जैन आदि जगहों पर।
रचना संसार:- छात्र जीवन में ही साहित्य सृजन। 1970 में उपन्यास 'साकार स्वप्न' जो  उज्जैन के 'दैनिक प्रजादूत' में धारावाहिक प्रकाशित हुआ। तब से अनवरत कविताएँ, सम-सामयिक विषयों पर लेख, टिप्पणियाँ और विचार राष्ट्रीय स्तर की पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं।
पहली पुस्तक 'शब्द अपराजेय' वैदिक ऋचाओं की पुनर्रचना। दूसरी 'अक्षर व्योम'। कालिदास रचित 'ऋतुसंहार' का बालोपयोगी अनुवाद। वैदिक उपाख्यान पर आधारित नाटक 'शुनःशेप' और 'अभिज्ञानशाकुंतलम्' का लोकप्रिय संस्करण भी प्रकाशित हुआ। 
दो और महत्वपूर्ण पुस्तकें  'आओ, प्रार्थना करें' और 'वैदिक शांतिपाठ' प्रकाशित।
पश्चात् 'शब्द चिरंतन' और 'स्वर्ग के शिखाग्र पर' पुस्तकें प्रकाश में आईं। भास्कर समूह के 'रसरंग' में 'जीवन ऋचा' स्तम्भ के अंतर्गत कई सप्ताह वैदिक कविताएँ प्रकाशित होती रहीं।  कालान्तर में श्री अरविन्द रचित 'भवानी भारती' का काव्य रूपान्तर छप कर आया और 2016 में वैदिक कविताओं का 'स्वर्णपात्र'।
रामायण मेले से सम्बद्ध 'मानस मंदाकिनी' के सम्पादक मंडल में प्रमुख भूमिका। आकाशवाणी और दूरदर्शन से कविताएँ और भेंटवार्ताएँ प्रसारित।
विगत 40 वर्षों से विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ प्रकाशित होती रही हैं, साहित्यिक पत्रिका 'समावर्तन' के 'प्रथम पृष्ठ' और 'उपग्रह' के 'सम-सामयिक' स्तम्भ में नियमित लेखन।


नाम  डॉ सीमा शाहजी
शिक्षा एम ए हिंदी 
        एम ए अंग्रेजी
        पीएचडी हिंदी

रचना यात्रा 
   राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर की अनेक पत्र पत्रिकाओं में विगत 15 वर्षों से रचनाओं का प्रकाशन ,आकाशवाणी से नियमित प्रसारण ,शोध आलेखों का प्रकाशन, राज्य संसाधन केंद्र इन्दोर व भोपाल के लिए साहित्य सृजन ।

पुरस्कार 
   राष्ट्रीय स्तर पर अनेक सामाजिक व साहित्यिक संस्थाओं द्वारा सम्मानित 

उल्लेखनीय 
     आदिवासी संस्कृति व इस संस्कृति में महिलाओं की स्थिति पर व्यापक अध्ययन । भारत सरकार संस्क्रति  मंत्रालय की सीनियर फेलोशिप के लिए चयन 
विषय -- 21 वी सदी ओर आदिवासी महिलाओं के विकास की ओर बढ़ते कदम सन्दर्भ झाबुआ जिला मप्र

प्रसार भारती में लोकगीत समन्वयक के रूप में कार्य 
पूवोत्तर हिंदी अकादमी शिलांग की कार्यशाला हेतु चयन

अध्यापन अनुभव
 मप्र के विभिन्न महाविद्यालयों में अतिथि प्राध्यापक के रूप में हिंदी भाषा एवम साहित्य का प्राध्यापन वर्ष 2001 से अभी तक ।सम्प्रति 
शासकीय महाविद्यालय मेघनगर जिला झाबुआ में कार्यरत

सम्बद्धता 
आल इंडिया पोएट्स कॉन्फ्रेंस खुर्जा उ प्र
 इन्दोर लेखिका संघ इन्दोर
अखिल भारतीय साहित्य परिषद
इन्दोर 
संयोजक नगर विकास समिति थांदला 
हिंदी लेखनी डॉट कॉम ई पत्रिका के परामर्श मंडल में शामिल

सम्पर्क 
325  महात्मा गांधी मार्ग 
थांदला जिला झाबुआ मप्र
457777
मोबाइल 7987678511
ई मेल
Seemashahji07@gmail.com


परिचय
नाम:-डॉ. रवीन्द्र नारायण पहलवान
पिता:- पंडित राजेंद्र नारायण पहलवान
माता:- श्रीमती राजरानी पहलवान
जन्म:- 25 सितंबर 1947
निवासी:- कश्मीरी मूल के
साहित्य:- 
प्रकाशित पुस्तकें:--अभिव्यक्ति, तुम्हारी खिड़की, संस्मरण, हाँ मैंने पुकारा, कुछ बोलो तो सही, अनुभूति, सदी के अंत में, वन्दे मातरम्, अतिथि, पूर्वा, एकलव्य, शाश्वत भारती, पंचामृत, काव्य प्रवाह, सुमन काव्य, इंदौर के ग्यारह कवि, निमाड़ की माटी मालवा की छांव, नीलकमल, हर्षिता के स्वर, काव्यांजलि, विदुषी, अभिप्राय, हम अडतीस, दस्तक
फिलेटली:- अंतरराष्ट्रीय पदक विजेता,
अभिनव:- चलचित्र "आजादी के रंग" नई दुनिया के संग" में केंद्रीय भूमिका, निर्देशक श्री सुशील जौहरी




नाम :- राजेश रामनगीना
माता का नाम :- सीता तिवारी 
शिक्षा :- विधुतयांत्रिकी में पत्रोपाधि
साहित्यक गतिविधि :- विद्यार्थी जीवन मे नवभारत समाचार पत्र में संपादकीय कालम में कई लेख प्रकाशित मंच संचालन एवम कवितापाठ , वर्तमान में सृजन अहिसास एवम रोटरी काव्यमंच से सम्बद्ध 
कविता की विषयवस्तु :- आध्यत्मिक, सामाजिक चेतना के विषय एवम समसामयिक व्यंग्य लेखन, श्रृंगार 
विधा :- कविता छंद दोहा रुबाई गजल
प्रकाशन :- कविता संग्रह कविता के झरनों पर  दिल्ली ब्लूरोज प्रकाशन से प्रकाशित है।
विशेष::-  गजल संग्रह का प्रकाशन होना है ।
सम्प्रति: - विधुत वितरण कम्पनी, इंदौर, मध्यप्रदेश में सहायक यंत्री के पद पर कार्यरत
Email :- rajeshtiwari542@gmail. com




स्वपरिचय,,,
----------------
नाम-अरुण सातले
माँ-स्व. रूखमणी देवी
पिता-स्व. स्वरूपचंद सातले
शिक्षा-कला एवं विधि स्नातक
निवास-A-13 एल,आई, जी, कॉलोनी 
रामेश्वर रोड खण्डवा,,,,
0
मूल विधा,,,
कविता एवं गीत
लोक साहित्य एवं संगीत
संबधी विविध विषयों में लेखन
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मध्यप्रदेश साहित्य परिषद भोपाल द्वारा चयनित एवं प्रकाशित
कविता संग्रह-"अरुण सातले की कविताएं,,"
देश के सभी  साहित्यिक पत्र पत्रिकाओं में गीत कविताएँ प्रकाशित
एक कविता संग्रह"शब्द-गूंज" प्रकाशनाधीन,,
आकाशवाणी इंदौर एवं खण्डवा से कविताओं का निरंतर प्रसारण,
0
लोक साहित्य में चौमासा,कला समय ,तथा अक्षत पत्रिकाओं में लोक संस्कृति से सम्बंधित विविध विषयों पर लेखों का प्रकाशन।
आकाशवाणी खण्डवा से लोक संस्कृति पर केंद्रित वार्ताओं का
अनवरत प्रसारण,,,
लोक-संस्कृति पर केंद्रित लेखों की पुस्तक प्रकाशनाधीन,,,
0
विशेष--
निमाड़ की संस्कृति पर आधारित फ़िल्म
"इस देस में " के गीतकार
फ़िल्म में गीतों की रचना,,,
0
                               अरुण सातले



नाम-श्रीमती भारती योगेंद सोनी
माता-परमेश्वरी देवी सहदेव
पिता- श्री निरंजन सोनी कड़ेल
शिक्षा- एम.ए. संगीत, दर्शनशास्त्र, संगीताचार्य (गायन), संगीत भूषण(तबला)
प्रकाशन:- वनांचल साहित्य व संस्कृति संस्था के माध्यम से "आलापिनी" काव्य संग्रह।
संपादन:- शब्दवट व काल के कपाल पर, आवरण चित्रांकन भी।
साहित्यिक गतिविधियां- कॉलेज के दिनों से ही काव्य सृजन, लघु कथा, स्वतंत्र आलेख आदि का समाचार पत्रों व राष्ट्रीय प्रकाशनों में प्रकाशित।
विशेष- युववाणी में काव्य पाठ
सम्मान:- साहित्यविद् सम्मान, राष्ट्र गौरव सम्मान, महाराज अजमीढ़ जयंती पर काव्य, कला व संगीत के लिये सम्मान
विभिन्न संस्थाओं द्वारा:- साहित्य सृजन सम्मान, सेवा सम्मान,साहित्य सेवा सम्मान आदि।
अतिविशिष्ट:- बेटियो पर 1 जनवरी 2020  से प्रतिदिन वाट्सएप स्टेटस श्रृंखला में आलेख से 900 बेटियो पर सकारात्मक रचनाओं का संग्रह। अभी भी जारी है ।
सम्प्रति:- संगीत सहप्राध्यापक के पद से (वी.आर.एस.), संगीत व चित्रकला का 30 वर्षों से शिक्षण, प्रशिक्षण। 


धैर्यशील येवले 
इंदौर 
शिक्षा एम कॉम 
सेवादसन महाविद्यालय बुरहानपुर से ।
पुलिस विभाग में सेवारत 
साहित्य एवं संस्कृति परिषद वनांचल झाबुआ द्वारा 
,,वनांचल साहित्य साधना सम्मान ,, व 
हिंदी रक्षक मंच इंदौर द्वारा 
,,साहित्य साधना पुरुस्कार ,,




जन्म - 1976 ,स्थान खातेगांव
सन 1998 में लगभग 15 दिनों तक ओंकारेश्वर स्थित आदि शंकराचार्य की गुफा में साधना करने के उपरांत , स्वप्रेरणा से इंदौर वापस आकर अपना अध्ययन पूर्ण किया व वैकल्पिक चिकित्सा में स्नातक डिग्री प्राप्त की । 
तत्पश्चात सन 2002 में मध्यप्रदेश शासन द्वारा अधिकृत एक वर्षीय आधुनिक चिकित्सा हेतु मान्य 
' बी. एम. पी.' कोर्स पूर्ण कर पीड़ित मरीजों की सेवा में जुट गए।
एक गृहस्थ सन्यासी की तरह विवाह-इत्यादि कर ,  गरीब तथा पीड़ित मरीजों के कल्याण हेतु चिकित्सा व्यवसाय में सन 2000 से सलग्न हुए।
साहित्य सेवा :- बचपन से डायरियाँ लिखने का शौक रहा । फिर कुछ कविताएं , गजलें भी लिखते रहे ।
प्रस्तुत किताब  - ' सांसो के साथ मेरे अनुप्रयोग ' पहली बार प्रकाशित ।
🙏🙏🙏
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नाम- मनीष त्रिवेदी
पिता का नाम:- डॉ.जयदेव त्रिवेदी
शिक्षा:- एम.एस.सी.(गणित)
साहित्यिक गतिविधि: - कविता लेखन,कविता पाठ
कविता के प्रधान विषय: दार्शनिक,श्रंगार
प्रकाशन:-“काव्य सुरभि”संकलन मे रचनायें प्रकाशित,”यादगाह”स्मारिका का सम्पादन
सम्प्रति:- भारत के नियन्त्रक एवं महालेखापरीक्षक सी.ए.जी.मे अधिकारी
आवर्ती उपलब्धियाँ:- नियमित मैराथन धावक एवं साईकिलिस्ट,लगभग 20 मैराथन मे भाग लिया।



नाम:- अरविन्द  व्यास
पिता का नाम:-  स्व. श्री भाऊशंकर व्यास
जन्म स्थान:-  झाबुआ (मध्य प्रदेश)
शिक्षा:- एम.एस.सी. केमिस्ट्री बी. एड.
साहित्यिक गतिविधि:- किशोरावस्था से ही लेखन
प्रकाशन:- लेख कविताएँ पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित
विशेष रुचि:- अध्यात्म, संगीत, पर्यटन, पठन और लेखन
सम्प्रति:- सेवानिवृत्त प्राचार्य, छत्तीसगढ़

समीक्षा ४१

 एक कविता डॉ मुरलीधर चाँदनीवाला की।

        ढोल बजाकर नहीं देखा भगवान् ने,
           बाँसुरी बजाई तो सुनाई नहीं दी,
                         शंख फूँका
             तो कान फट गये कौरवों के।

        ढोल तो कारुलाल की माँ ने बजाया
                या रावटी के छगन बा ने,
           रोटी के लिये बजाया गया बाजा
               निकल गया कितना आगे।

      आदमी मरते-खपते आगे निकल जाता है,
                मंदिरों में भगवान् देख-देख
                         खुश होते हैं।
      
         ढोल बजाकर क्यों नहीं देखा, भगवान् !
                        एक बार बजाते,
               तो फिर बजाते ही चले जाते।

              एक बार ढोल बजाकर तो देखो,
                         तुम दूर बैठे हो
                       तो बहुत अच्छा है,
            ढोल भी दूर के ही सुहावने होते हैं।

                   🍁मुरलीधर चाँदनीवाला

🌹🌷🌹🌷🌹🌷
मेरी नजर में:-

ढोल बजाकर नहीं देखा भगवान् ने,
           बाँसुरी बजाई तो सुनाई नहीं दी,
                         शंख फूँका
             तो कान फट गये कौरवों के।

ढोल, बाँसुरी और शंख यहाँ प्रतीकात्मक शब्द है। बाँसुरी माधुर्य, प्रेम और रास का संकेत करता है, शंख या तो मंदिरों में आरती के समय बजाया जाता है या पौराणिक काल के युद्ध के उद्घोष के समय बजाया जाता था। भगवान कृष्ण का प्रेम और रास अलौकिक था और शंखनाद महाभारत युद्ध का उद्घोष था। थोड़ा अटपटा तो लगता है कि भगवान कृष्ण ने ढोल क्यों बजा कर नहीं देखा? वास्तव में कृष्ण के बालपन में छह माह की उम्र से लगायत द्वारकाधीश श्री कृष्ण तक का जीवन काल संघर्षों और बाधाओं से भरा रहा शायद इसीलिये उनके जीवन में महारास और महानाश के मध्य लोकरंजन जैसे क्षण उपलब्ध न हो सके।
कविता अपने प्रतीकों के माध्यम से इसे बखूबी बयान करती है। हम सब इस ढोल को बचपन से सुनते आ रहे हैं पर गौर से नहीं जाना कि यह  कि यह "ढोल" आखिर है क्या?
भरत मुनि ने अपने नाट्य शास्त्र में वाद्यों का वर्गीकरण करते हुए लिखा है किः-
ओतोद्य विधिमिदानी व्याख्यास्यमः। तद्यथा-
ततं चैवावनद्धं च घने सुषिर मेव च।
चतुर्विधं तु विज्ञेयमातोद्यं लक्षणान्वितम्।।1।।
ततं तन्त्री गतं ज्ञेयनवनद्धं तु पौष्करम्।
घनं तालस्तु विज्ञेयः सुषिरो वंश उच्चते।।2।।
वाद्य यंत्रों के उपर्युक्त चार वर्ग निम्नांकित हैं-
1. घन वाद्य: बिणाई, काँसे की थाली, मजीरा, घाना/घानी, घुँघरू, कँसेरी, झाँझ आदि
2. चर्म वाद्य: हुड़का, डौंर, हुड़क, ढोलकी, "ढोल", दमाऊँ, नगाड़ा, धतिया नगाड़ा आदि
3. सुशिर वाद्य: मुरुली, जौंया मुरली, भौंकर/भंकोरा, तुरही, शंख आदि
4. ताँत वाद्य: (या उर्ध्वमूखी नाद) ताँत वाद्य/तार आदि।
शंख-घंट तथा उर्ध्वमुखी नाद ऐसे वाद्य हैं जिन्हें लोक वाद्य की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।
लोक वाद्य हमारे मन को संगीतमय बनाते आए हैं। लोक वाद्यों ने इस धारणा को पुष्ट किया है कि संपूर्ण प्रकृति संगीतमय है। यह संगीत सृष्टि के प्रारंभ से ही सम्पूर्ण जीव-जगत में व्याप्त है। प्रकृति के कण-कण से अविरल प्रवाहित होता है सुर और ताल की सीमाओं में बँधा उन्मुक्त संगीत, उसकी लय में परियों का छम-छम नर्तन। इसी ने लोक जीवन को बांध कर रखा है। कई वाद्ययंत्रों का जन-मानस द्वारा पूर्व काल से ही प्रयोग किया जा रहा है। ये वाद्य हमारे लोक-जीवन के अभिन्न अंग रहे हैं। इसीलिए इन्हें लोकवाद्य कहा जाता है। इन्हें बजाने वाले का संबोधन "लोक वादक" के नाम से किया जाता है। लोक संस्कृति की सीमा अनन्त है। इन लोक वाद्यों को सामाजिक धरोहर के रूप में संजोकर वर्तमान पीढ़ी तक सुरक्षित रखने का श्रेय इन्ही लोक वादकों को जाता है। आज जो भी लोक संस्कृति का ज्ञान संरक्षित है, यह धरोहर उन्हीं के द्वारा संजोई गयी है।
ढोल की यात्रा लोक रंजन से लोकमंगल तक आई और इस तरह यह अपना सांस्कृतिक मूल्य रखती है फिर यही ढोल रोजी-रुजगार के रूप में परिणित होने लगा लेकिन तारीफ की बात तो यह है कि ये तीनों परिक्षेत्र ढोल बजाने में अब भी बरकरार हैं।
कविता में "कारूलाल की माँ" और "छगन बा" ऐसे ही  लोक वादक हैं, ढोल उनका लोक वाद्य है। पहले तो पूरा गांव इनका संरक्षक होता था, और इन्हें काम के बदले अनाज दिया जाता है लेकिन सदियों से चली आ रही ये व्यवस्था अब तेज़ी से बिखरने लगी है। शादी, नामकरण, स्थानीय देवताओं की पूजा, जागर, जत्रा, बैसी, चौरासी आदि में हमारे ही लोक वाद्यों की आवश्यकता होती है। बिना इनके वादन के हमारे मंगल कार्य सम्पन्न नहीं होते हैं। अतः इन लोक वाद्यों को पौराणिक वाद्य के साथ-साथ सामाजिक वाद्य भी कहा जाय तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।
        ढोल तो कारुलाल की माँ ने बजाया
                या रावटी के छगन बा ने,
           रोटी के लिये बजाया गया बाजा
               निकल गया कितना आगे।
रावटी रतलाम जिले ३५ किलोमीटर दूर एक ऐतिहासिक आदिवासी बहुल कस्बा है। यह महाराजा रतनसिंहजी के राज्य की राजधानी रही है। यहाँ आज भी आदिम संस्कृति को जीवन्त देखा जा सकता है। विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर यहाँ आदिवासी जन सैलाब उमड़ता है तथा ढोलक, थाली और मांदल की थाप पर आनन्दोत्सव मनाया जाता है। लगता है कवि ने स्वयं इन दृष्यों को रूबरू देखा है जो कविता में कथ्य के रूप में साकार होता दिखाई देता है।
              एक बार ढोल बजाकर तो देखो,
                         तुम दूर बैठे हो
                       तो बहुत अच्छा है,
            ढोल भी दूर के ही सुहावने होते हैं।
"कान्हा आओ तो सरी।" कान्हा को खुला आमन्त्रण है कि वह हमारे बीच आवें और इस आनन्दोत्सव में सहभागी बने, सम्मिलित होवे। एक बार बजाओगे तो बजाते ही चले जाओगे।
कविता ढोल की प्रतीकात्मकता के माध्यम से उत्सव प्रियता, सांस्कृतिक सम्पन्नता, सामूहिकता और लोकमंगल की बात करती है। रावटी के छगन बा में प्रयुक्त 'बा' ग्रामीण अंचल में प्रौढ़ व्यक्ति के प्रति सम्मान प्रकट करता हुआ शब्द है। रावटी शब्द कपड़े का बना हुआ एक प्रकार का छोटा घर या डेरा होता है जिसके बीच में एक बँडेर होती है और जिसके दोनों ओर दो ढालुएँ परदे होते हैं। यह राजपूताना दौर का विशाल कैम्प हाउस है जो सामूहिक उत्सव मनाने का स्थल है। कविता प्रेम और संघर्ष रूपी दुकूलों के बीच बहने वाली सहज सुसंस्कृत जीवन सरिता से परिचय कराती है। अपने उदर पोषण के लिये किया गया उद्यम भी लोकरंजक और लोकमंगलकारी हो। कविता का निहित संदेश मांगलिक है।

रामनारायण सोनी

१९.०३.२०२०



Sunday, 15 March 2020

समीक्षा ४०

समीक्षा ४०

एक कविता श्री भगवान दास गुहा जी की " वो पिता ही होता है"।

वो पिता ही होता है"

जो दुख दर्द को हरदम पीता है 
ग़म खाता, ग़मज़दा नहीं होता
वो पिता ही होता है!!

उसके दु:ख दर्द का 
पता किसे होता है? 
लेकिन कौन करता है महसूस?
हाँ! वह अकेले में रोता है 
आसुओं को पीकर भी 
बाहर से खारा और अंदर से
अन्दर से "मीठा"ही होता है।
वो पिता ही होता है !!

सब कुछ! हाँ सब कुछ, 
"सब" को देने की चाहत में
"मैं", "मेरा", "अपना", 
सब कुछ दे चुका होता है
वो! पिता ही होता है!!
लेकिन, कभी वह
सुनकर वे शब्द, 
बेहद दु:खी, विचलित होता है
"क्या किया आपने हमारे लिए"?
क्या यही "सुनने" के लिए...  
उम्र भर, मर-मर के जीता है 
जीते जी मर कर भी जीता है,
वो विष पीकर भी जीता रहा है
वो! पिता ही होता है!
वो पिता ही होता है!!

     भगवान दास गुहा 
🌹🌷🌹🌷🌹🌷

मेरी नजर में

पिता - "पा" रक्षणे धातु से पिता शब्द निष्पन होता है, य: पाति स पिता अर्थात् 'जो रक्षा करता है वह पिता कहलाता है। 
निरूक्त कहता है -- 'पिता पाता वा पालयिता वा।' पालक, पोषक और रक्षक को पिता कहते हैं। वेद, पुराणों, स्मृतियों इत्यादि में पिता की महिमा का पर विशेष उल्लेख है। 
मनु कहते हैं --
उपाध्यान्दशाचार्य आचार्यणां शतं पिता।
अर्थात् दस उपाध्यायों से बढ़कर एक आचार्य, सौ आचार्यों से भी बढ़ कर पिता का स्थान ऊंचा है।
आगे कहा है --
"
पिता मूर्ति प्रजापते" अर्थात् पिता पालन करने से प्रजापति का मूर्तिरूप है।
महाभारत के वन पर्व में यक्ष युधिष्ठिर संवाद में प्रसंग आया है।     
यक्ष उवाच --
का स्विद गुयतरा भूमे:कि स्विदुच्चतरं च खात।
किं स्विच्छीघ्रतरं वायो: किं स्विदवहुतरं तृणात् ।।
अर्थात्-- पृथ्वी से भारी क्या है? आकाश से ऊंचा क्या है ? वायु से भी तीव्र चलने वाला क्या है? और तृण से भी असंख्य क्या है ? 
युधिष्टर उवाच --
माता गुरूतरा भूमे: पिता चोच्चतरं च खात।
मन: शिघ्रतरं वात चिन्ता तृणात्।
युधिष्टर ने कहा ---
माता पृथ्वी से भारी है, पिता आकाश से ऊंचा है, अर्थात्  पिता के हृदय रूपी आकाश में अपने पुत्र के लिए असीम प्रेम होता है।
और--
पिता धर्म: पिता स्वर्ग: पिता ही परम तप:।
पितरि प्रीतिमापन्ने  सर्वा: प्रीयन्ति देवता ।।
पिता ही धर्म है, पिता ही स्वर्ग है और पिता ही सर्व श्रेष्ठ तपस्या है, पिता के प्रसन्न हो जाने पर सारे देवता प्रसन्न हो जाते हैं।
'अथर्ववेद' में कहा गया है कि 'अनुव्रत: पितु: पुत्रो मात्रा भवतु संमना:' यानी पुत्र पिता के अनुकूल कर्म करने वाला और माता के साथ उत्तम मन से व्यवहार करने वाला हो।' 
सन्तान की प्रथम पाठशाला माँ है तो द्वितीय पिता है।  पिता उसको  उंगली पकड़कर चलना सिखाने के साथ जीवन जीने के समस्त पाठ पढ़ाता है। भोजन , वस्त्र, घर व अन्य सुविधाएँ उपलब्ध कराने के लिए वह दिन रात काम करता है उसे न रात दिखाई देती है न दिन दिखाई देते है पिता को बस परिवार के हालात भर दिखाई देते हैं।
समाज में कतिपय सन्तानों की बढ़ रही पिता के प्रति उपेक्षा से कातर है पिता। सन्तानों के कुछ शूल से चुभते प्रश्नों ने माता-पिता के जीवन को दुर्दान्त कर दिया है। जब वह अपने अतीत में झाँक कर देखता है तो बस एक आहत सिंह की तरह अपने व्रणों को स्वयं चाटता रहता है। हमारी संस्कृति के शब्दकोष में "वृद्धाश्रम" कहीं नही था। ये वृद्धाश्रम व्यवस्था नहीं विकल्प हैं जो परिवार और संस्कृति को छिन्न-भिन्न कर रहे हैं। वे पुत्र शायद भविष्य की उस अपनी सुलगाई आँच को नहीं महसूस कर रहे हैं जो एक दिन उन्हें भी जलाएगी। समाज में घुल रहे इस विष को कौन हटाएगा। 
इस दैन्य को उघाड़ती कविता, मर्म को भेदती कविता, पर पीड़ा को अनुभूत कराती कविता, कवि के व्यथित मन को उद्घाटित करती कविता है यह।
कहते हैं कि कविता कवि के हृदय की अनुकृति है, फोटो कॉपी है। जैसे मूर्ति तो मूर्तिकार के हृदय में पहले जन्म लेती है पत्थर में से वही प्रकट होती है, उसी तरह पीड़ा का आघात पहले कवि के हृदय में होता है बाद में उसे वह पृष्ठों पर उतारता है। काव्य के मनु कहे गए वाल्मीकि का हृदय भी क्रोंच की पीड़ा का आत्मानुभूत कर गया था और तब से सृजन का यह संसार चल पड़ा। कवि, लेखक व साहित्यकार सृजन धर्मा हैं।
कविता पिता का माहात्म्य, उसका तप तो बताती ही है पर सन्तति में कृतघ्नता से उपजे भावों के प्रति समाज के आज के युवाओं को सचेत भी करती है।

रामनारायण सोनी
१६.०३.२०२०

Saturday, 14 March 2020

कविता की अन्तर्धाराएँ


काव्य वह वाक्य रचना है जिससे चित्त किसी रस या मनोवेग से पूर्ण हो अर्थात् वह जिसमें चुने हुए शब्दों के द्वारा कल्पना और मनोवेगों का प्रभाव डाला जाता है। कविता का शाब्दिक अर्थ है काव्यात्मक रचना या कवि की कृति, जो छन्दों की शृंखलाओं में विधिवत बाँधी जाती है। कविता के गुणधर्म विभिन्न समीक्षाओं में कहीं कहीं उन संदर्भों में भी लिखने का प्रयास किया गया है।
आदमी के व्यक्तित्व के तीन तल हैं पहला उसका शरीर, दूसरा मानस और तीसरा उसका अंतरतम। इन तीनों तलों पर प्रकृति, पर्यावरण, व्यवहार और संवाद का प्रभाव होता है। इन के संयुक्त प्रभावों का समावेश साहित्य में होता है जिसकी गुणवत्ताएं अलग अलग होती हैं। साहित्यकार इन भावों और प्रभावों से पहले स्वयं प्रभावित होता है फिर उनकी अनुभूतियों, संकल्पनाओं के जरिये कथन को किसी संदेश तक ले जाने का प्रयास करता है। कृतियों का सृजन करते समय ये तत्व उसके भीतर सक्रिय रहते हैं तो कृति लेखनी से साकार हो उठती है।
किसी के लिखे पर लिखना बड़ा दुस्कर कार्य है। अपनी अनुभूतियाँ लिखना तो सरल है। रचना लिखते समय किसी कवि ने किस अन्तर्वृत्ति में लिखा होगा यह जानना बड़ा मुश्किल काम है। इसमें चूक होना स्वाभाविक है क्योंकि कविता में प्रयुक्त शब्द-शक्तियों और भावप्रणवता को पढ़ा जाना एक अनुमान की तरह ही होता है। वास्तव में तो सारा लेखन पाठक के लिये ही होता है। पाठक द्वारा कविता के पढ़ने पर जो प्रभाव होता है वह सबसे महत्व पूर्ण है। आलोचना का आधार भी यही प्रभाव है। आलोचना इस भाव-सेतु का विवेचन भी है। किसी को देखना एक कृत्य है पर उस देखने वाले को उसके भीतर ही देखना कौतुक है। किसी भी दृश्य को, घटना को अथवा क्रिया- कलाप को देखने पर किसी संवेदनशील व्यक्ति के मानसपटल पर गहरा प्रभाव होता है। कभी कभी यह क्षणिक होता है पर कभी कभी यह प्रभाव उसके अन्तस्तल में पैठ जाता है। ऐसे कई प्रभाव मिलकर व्यक्ति में "अन्तर्वृत्ति" का निर्माण करते हैं। कवि, कथाकार, साहित्यकार में यह गुण पूर्ण रूप से विकसित होता है। उसके अपने स्वभाव और गुणधर्म से मिल कर एक अद्भुत संयोजन तैयार होता है जिसका प्रतिफल सृजन के रूप में सामने आता है। एक रचना का सृजन करते समय रचनाकार की अन्तर्वृत्ति जैसी रही होती है रचना का स्वरूप उसके अनुरूप ही होता है। 
आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी ने आलोचना में सात प्रतिमानों को वरीयता क्रम दिया, जिसमें कवि की अन्तर्वृत्ति को सर्वोपरि माना, तथा अंत में कवि के निहित सामाजिक संदेश को रखा। उनके अनुसार काव्‍य में मूलत: सौन्‍दर्यानुसन्‍धान को जीवन-चेतना से जोड़ा जाना अनिवार्य है। यहाँ हर कृति में...
"कवि की अन्तर्वृत्ति का सूक्ष्म व्यवच्छेद, हृदय की मुक्तावस्था, ‘आनंद की साधनावस्था’, ‘आनंद की सिद्धावस्था’, ‘लोक-सामान्य’, ‘साधारणीकरण’, ‘लोकमंगल’ आदि प्रतिमानों पर आधारित समीक्षा करने का प्रयास किया है। जिस भाव-भंगिमा, मुद्रा और तन्मयता के साथ कवि ने अपने काव्य की रचना की है, उसमें उतनी ही संवेदनशीलता और सहानुभूति के साथ मैंने कविता में प्रवेश करने की ईमानदारी से पूरी पूरी चेष्टा की है। मैं नहीं जानता कि ऐसा मैं कितना कर पाया हूँ।
मैने माना है कि किसी भी रचना की तरह समीक्षा भी उसकी पुनर्रचना होती है। मेरा प्रयास रहा है कि समीक्षा में मूल मानव वृत्तियों के साथ सहजात सम्बन्ध स्थापित हो और उस कविता में से उघाड़ कर उसे पाठकों के समक्ष रखा जाना चाहिये।
इस पुस्तक में शब्दवट, रिश्तों के बीज, भोर का उजास, साँसों के साथ मेरे अनुप्रयोग और कविता के झरनों पर नामक पुस्तकों की संक्षिप्त समीक्षा भी की गई है। इसमें इक्कीस कवियों/साहित्यकारों की ४० कृतियों की समीक्षा है जिनमें विभिन्न प्रकार रसों, वर्णिकछन्दों, मात्रिक छन्दों, मुक्त छन्दों आलेखों का समावेश है। "मेरी नजर में" ये कृतियाँ जैसी लगी वही समझ कर लिखी गई है इसलिये ये समीक्षाएँ मेरे अपने विचारों से अछूती नहीं है। इस समझ में हुई त्रुटियों के लिये संबन्धित साहित्यकार का मैं क्षमा प्रार्थी हूँ। 
समीक्षाएँ पाठकों को समर्पित हैं। आशा है ये उन्हें रुचेंगी।

रामनारायण सोनी

समीक्षा ३९

डॉक्टर सुषमा रावत की कविता "लहरों के बीच" साझा काव्य-संकलन "काव्य सुरभि" से।

"लहरों के बीच"

समन्दर की शोर मचाती लहरों के बीच, 
एक सीप, शांत गहराई में, 
पनपाती है अनमोल मोती।
रोजमर्रा की आपाधापी मैं 
मन शान्त रखकर 
चन्द लोग 
ऐसे ही कुछ काम कर जाते हैं। 
कैक्टस के पौधे की तरह 
विपरीत परिस्थितियों में पुष्पित हो सकना 
शौर्य है।

जो सीपियाँ विप्लवी लहरों के संग उछलकूद करके प्रमुदित हो लेती हैं उन्हे समन्दर अपनी लहरों द्वारा बलात् तट पर फेंक देता हैं। यदि सीपियाँ अपनी उपादेयता छोड़ दे तो नियति क्या होगी? वे लहरों पर मौज कर लेगी पर जल्द ही अपना जीवन खो देगी। यह लहरों की निर्ममता नहीं सीपियों की अपनी अदूरदर्शिता और अकर्मण्यता है। लहरें अपना स्वभाव नहीं छोड़ती, वे अपनी नैसर्गिक गर्जन भी नहीं त्यागती। उनकी यात्रा समन्दर के बीच से किनारे की है। जो रास्ते में आवेगा उसे किनारे वे किनारे पर फेंक देंगी। वहाँ टिकना संघर्ष है। उसके नीचे उतरना तप है और समन्दर की तलहटी में पैठ कर साधना में लीन होना समाधि है। जब सीपी समाधिस्थ होगी लहरों के उत्पात वही के वही होंगें। इस उत्पात के रहते सहते उसे अपनी साधना पूर्ण करनी होगी। साधना नहीं तो सिद्धि नही, धैर्य नहीं तो तप नहीं और संघर्ष नहीं तो अस्तित्व नहीं। स्वाँति की बूँद समन्दर की भेंट हो जाती तो खारा पानी बन जाती पर सीपी की साधना उसे अनमोल मोती बना देती है। अस्तित्व और सिद्धि के बीच धैर्य, तप और साधना मिल कर इस क्रिया को सकारात्मक कर्मफल में रूपान्तरित कर देता है। सिद्धों का जीवन ऐसा ही होता है।
कैक्टस की पहचान काँटो से है लेकिन इन काँटों की जमावट में अनोखा सौंदर्य है, बसन्त सिर्फ अमलतास और वन-उपवन पर ही नहीं केक्टस पर भी आती है। कोमल शाखों का पुष्पित और पल्लवित हो जाना सहज सरल है पर कैक्टस का पुष्पित होना निश्चित रूप से शौर्य है। यह विषम परिस्थिति में भी सकारात्मकता का संदेश है। मानव का क्रमिक विकास प्रकृति में उपस्थित अवरोधों पर विजय की कहानी है। विश्व की महानतम विभूतियों के जीवन चरित्रों का अध्ययन करने पर पता चलता है कि जो जितनी विषम परिस्थिति से जूझ कर आया वह उतना महान हुआ। बुद्ध ने तो राजमहल छोड़ कर निर्वासित जीवन चुना। यह भी हो सकता था कि कई अन्य राजाओं की तरह बुद्ध भी राज्यसुख भोग कर अपना जीवन जी सकते थे। बोधिसत्व सरल और कठिन में से कठिन का चुनाव करने पर उपलब्ध हुआ है। 
कवि ने विषम परिस्थितिमें सकारात्मक संघर्ष को ही शौर्य कहा है। बुद्ध का तप, गाँधी का विमर्ष, तेनसिंह का आरोहण, लक्ष्मीबाई का संग्राम इसी तरह के शौर्य के साक्षात् बिम्ब हैं। सम्पूर्ण मानव जाति के इतिहास का अक्षर-अक्षर इस शौर्य की विजयगाथा है।
कविता संसार की ऋणात्मकता और अवरोधों को नकारने की बात बिल्कुल नही करती पर इनके रहते हुए भी संघर्ष और कर्म का पाठ पढ़ाती है। साधना का महात्म्य बताती है, धैर्य का आलम्बन लेना सिखाती है। कविता आश्वस्त करती है कि मूल्यहीन बूँद से अनमोल मोती बनाना साध्य है। "चन्द लोग" से तात्पर्य वे लोग हैं जो विषमताओं के होते हुए भी कामयाबी का शिखर चूमते हैं। 
शब्द बहुत थोड़े हैं 
पर अर्थ बहुत चौड़े हैं।

रामनारायण सोनी

Friday, 13 March 2020

समीक्षा ३६

समीक्षा ३६

डॉ रवीन्द्र नारायण पहलवान की कृतियाँ व एक कविता,
"अब क्या किया जाए"

अब क्या किया जाए?
साधु खड़ा द्वार पर 
भिक्षा की गुहार लगाए 
घर में नहीं है एक मुट्ठी सीधा, 
अब क्या किया जाए? 

विचारों की बादल 
घुमड़-घुमड़ कर छाए 
लिखने को कुछ उपलब्ध नहीं है, 
अब क्या किया जाए? 

असामाजिक तत्वों की टुल्लर 
चंदे की आवाज लगाए 
आज जेब में केवल हजार के नोट, 
अब क्या किया जाए? 

नव युवकों की टोली 
होली के चंदे की पुकार लगाए, 
याद करूं मोहल्ले की हुड़दंग, 
अब क्या किया जाए?

एक अपाहिज 
दुहाई दे, दरकार लगाए 
पास में एक सिक्का नहीं है 
अब क्या किया जाए?

एक अपंग 
भूखा हूं, ऐसी गुहार करे 
मैं स्वयं कल से भूखा हूं, 
अब क्या किया जाए?

एक संत 
गूढ़ रहस्य की बात बताएं 
मन मेरा स्थिर नहीं है 
अब क्या किया जाए? 

एक दड़बे में 
पक्षी तड़पे 
दानों को मोहताज हुआ है 
अब क्या किया जाए? 

मन मंदिर में 
बसती एक मोहक सूरत 
पूजा की दरकार नहीं है 
अब क्या किया जाए?

      डॉ रवीन्द्र नारायण पहलवान
🌷🌹🌷🌹🌷🌹

मेरी नजर में

गन्ने से गन्ने का रस, रस से शकर फिर शकर से चाशनी। यह  क्रिया है। यह क्रिया- प्रक्रिया विज्ञान में 'एक्स्ट्रेक्शन', केमिस्ट्री में 'आसवन' आयुर्विज्ञान में 'अर्क' और बोलचाल की भाषा में 'निचोड़' है। इनकी कविताएँ इसी तरह व्यापक विचारों और भावों का संघनन है। कविता कम शब्दों में कहा गया बड़ा वक्तव्य है। यही कविता पाठक तक पहुँचने पर इसके थोड़े शब्द अपने मूल स्रोत भावों और विचारों के व्यापक स्वरूप और भावों की अभिव्यक्ति को पुनर्स्थापित करने में सफल होनी चाहिये: कविता तभी सार्थक होती ही। बहुत थोड़े शब्दों में कही गई उनकी कविता में यह शब्दों की कंजूसी नही बल्कि वह संतृप्त विलयन है जैसे उजाला नील की चार बूँद बाल्टी भर सफेद कपड़ों को और झकास सफेद कर देती है। जैसे पेड़ के फल से बीज उत्पन्न होता है यह संघनन है और फिर इस बीज से पुनः पेड़ प्राप्त हो जाना व्यापक विस्तार है ठीक वैसे ही भावों-विचारों के शाब्दिक संघनन से उनकी कविता का भावनात्मक विस्तार होना संभव है। डॉ रवीन्द्र नारायण पहलवान की कविताएँ भावों-विचारों का संघनन है लेकिन शब्द इतने व्यावहारिक और सहज है कि वे मूल विचारों और भावों को सहज रूप से पुनर्स्थापित करने में सक्षम है। यह संक्षेपिका उनकी चार कृतियाँ "कल शाम", "मैंने पुकारा", "अब क्या किया जाय" और "बस, एक बार" के संदर्भ में है।
यह प्रश्न कवि का किसी और से नहीं वरन् स्वयं से है। प्रश्न केवल प्रश्न नहीं है वह एक ऐसे मनोभाव को दर्शाता है जो सापेक्ष है लेकिन साथ ही वह सार्थक है।
दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे।
देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम्‌।।
श्रीमद्भगवद्गीता।।17/20।।
भावार्थ : दान देना ही कर्तव्य है - ऐसे मनोभाव से उपयुक्त दान किसी देश-काल में जिस वस्तु का अभाव हो उस वस्तु द्वारा पात्र प्राणियों की सेवा करने के लिए योग्य दिया जाता है। जैसे भूखे, अनाथ, दुःखी और असमर्थ अथवा भिक्षुक आदि को अन्न, वस्त्र आदि वस्तु द्वारा सेवा करने के लिए योग्य पात्र व्यक्ति को दिया जाय। जो दान  प्रत्युपकार न करने वाले के प्रति दिया जाता है वह दान सात्त्विक कहा गया है। तात्पर्य यह है कि मनोभाव इन्सान में होना चाहिये "मैं किसी जरूरतमन्द की मदद करूँ।"
कविता इसी मनोभाव से प्रारंभ होती है। कवि के पास इतने साधन संसाधन का अभाव है पर हर जरूरतमन्द की जरूरत पूरी करना चाहता है। 
"सीधा" एक बोलचाल का शब्द है जिसका तात्पर्य रसोई के कच्चे सामान से है जो किसी को दिया जाय तो उससे पूरा भोजन तैयार हो सके। कवि का सामर्थ्य नही है पर मन्तव्य दान देने का है जो परम सात्विक भाव है।
कबीर ने यही बात अपने तरीके से कही है--
साईं एतना दीजिये जा में कुटुम समाय।
मैं भी भूखा ना रहूँ साधु न भूखा जाय।।
जेब में एक हजार के नोट से संकेत है कि वह धन जो अब मेरे अथवा किसी ओर के काम का नही है। अन्तिम पद में उस प्रतिमा और प्रतिमान का उल्लेख है जो मोहिनी स्वरूप है जिसकी पूजा की आवश्यकता नहीं है। दबी जुबान यह संकेत है कि उससे बस प्रेम किया जाए।

रामनारायण सोनी
०९.०३.२०२०

समीक्षा ३८

समीक्षा ३८
डॉक्टर सुषमा रावत की एक कविता: "मेरा जीवन"

डॉक्टर सुषमा रावत शिशु रोग विशेषज्ञ हैं और अपना निजी अस्पताल चाइल्ड केयर हॉस्पिटल के नाम से है जिसे स्वयं संचालित करती हैं। इनकी अभिरुचि शोध कार्य, विटामिन डी एवं दिनचर्या, संगीत, गायन, लेखन है। इनकी प्रकाशित कृति है "फ्रीडम फॉर एपिलेप्सी"।

"मेरा जीवन"

पता नहीं, कितनी कीमत है, 
कितनी इज्जत है मेरी, 
पर अहंकार को डिब्बी में बंद कर 
सागर तले रख दिया है 
हाँ, कठपुतली हूं मैं, 
जिसकी एक डोर 
स्वयं श्रीकृष्ण के हाथ में,
और दूसरी स्नेही जनों के, 
मेरा जीवन-नृत्य उँगलियों से है, 
इसी बीच ढूँढती हूँ जीवन का मकसद, 
कैसे याद किया जाएगा मुझे मेरे बाद? 
क्या एक वृक्ष की तरह? 
जिसकी जड़ें ज्ञान अर्जन कर 
परिवर्तित करती रही 
ऐसे फल में जो अब सबका जीवन अमृत है,
उस समय, दूसरों का तो फिर भी पता नहीं, 
पर मेरी नजरों में मेरी 
कीमत और इज्जत जरूर होगी।

डॉ सुषमा रावत

🌷🌹🌷🌹🌷🌹

मेरी नजर में...

इस कविता के मूल में त्रिआयामी तत्व हैं। लोकायतन, रंगायतन और भावायतन। 
"लोकायतन" में सांसारिक क्रियाएँ, प्रतिक्रियाएँ और लोकमंगल का विचार है। "रंगायतन" में जीवन का परम उद्देश्य, कर्म की महत्ता, जीने का आनन्द और उसकी प्राप्ति के महीन सूत्र हैं और "भावायतन" में कर्मनिष्ठा, लोककल्याण, भक्तिमय समर्पण, परमार्थ और आत्मबोध के भाव हैं। इन तीनों का यहाँ अद्भुत समन्वय है। यहाँ इसकी त्रिवेणी बहती है। 
कर्म, अकर्म और विकर्म के निर्णय में बड़ा प्रचलित वाक्य है- "लोग क्या कहेंगे?" कविता का प्रारंभ भी इसी अदृष्य प्रश्न से होता है। क्या करूँ या क्या न करूँ? यह भ्रम है, यही अनिश्चयता है। श्रीमद्भगवद्गीता का प्रादुर्भाव अर्जुन के भ्रम में पड़ जाने के कारण होता है लेकिन उपसंहार उनके आत्मबोध से होता है। अर्जुन कहते हैं  बीच में भक्ति, कर्म और ज्ञान की त्रिधाराएँ बहती हैं। कविता में गीता के ये तत्वदर्शन समाविष्ट हैं। अहंकार का लौकिक अर्थ घमण्ड है और आध्यात्मिक अर्थ वह तत्व जो भौतिक विषय-सुखों की चाह करने वाला है। कविता कृत संकल्प है कि यह अहंकार त्याग दिया गया है और अर्पिता प्रभु की राजी में अपनी रजा समझती हैं। कविता में कृष्ण की भक्ति है, वृक्ष की तरह का निष्काम कर्मयोग है और स्वयं को पहचानने का आत्मबोध है। जीवन की आस्था स्नेही जनों से बँधी है और विश्वास जगदीश्वर श्री कृष्ण से जुड़ा है। इस तरह आस्था और विश्वास का सुन्दर युग्म है।
"मेरा जीवन-नृत्य" है। नृत्य तो स्वयं एक उत्सव है। इस उत्सव के तार यदि श्री कृष्ण और अपने लोगों से जुड़े हों तो वह रास ही है। इस आनन्दोत्सव के मध्य यदि जीवन जीने का मकसद मिल जाता है तो जीव धन्य हो जाता है। मन का परितोष मिल जाना जीवन में अमृतत्व को उपलब्ध हो जाना है।
कविता आत्मबोध कराती है और भ्रमरहित करती है। "मेरी नजरों में मेरी / कीमत और इज्जत जरूर होगी।" कविता भक्ति, ज्ञान और कर्म का अद्भुत संगम है।

रामनारायण सोनी

समीक्षा ३७

समीक्षा ३७

एक कविता एक सरल रेखा सी, श्री रमेशदास वैरागी जी की। उपनाम "उधार"।
संक्षिप्त परिचय:-
नाम                   रमेश दास वैरागी
पिता                 श्री तुलसीदास वैरागी
माता                 गीताबाई वैरागी
जन्म स्थान         ग्राम कल्याणपुरा जिला   
                      . झाबुआ (म.प्र.)
मूल स्थान           ग्राम खवासा,तहसील थांदला
                         जिला झाबुआ(म.प्र.)
शासकीय सेवक    सेवा निवृत्त कनिष्ठ 
                         लेखाअधिकारी
विभाग                 आदिवासी विकास विभाग
उद्देश्य/ध्येय           साहित्य व समाज सेवा

उधार जी की नगद कविता।

'वह मासूम लड़की"

एक नन्ही गुड़िया सी
घर के आंगन में
वह खेल रही थी
बारिश की कुछ बूंदें
झेल रही थी
कल्पनाओं के भँवर में
कुछ सपने, बुन रही थी
कुछ अपने-सपने
चुन रही थी
कुछ गीली,
कुछ सूखी मिट्टी
घूँध रही थीं

बचपन से यौवन तक
वर्तमान से भविष्य के
आकाश में 
कुछ ढूँढ रही थी
गीली-सूखी मिट्टी से
कुछ छोटे-बडे़ बनाए
कुछ बिगड़े, कुछ बने घरौंदे
देख रही थीं
क्या होंगे सपने-अपने पूरे वो?
तौल रही थी
वो बचपन का खेल
खेल-खेल में ही
बस यूँही खेल रही थी
असली जीवन से
बिलकुल अनभिज्ञ
वह क्या जान रही थी?
शायद कुछ पता नहीं...

वह मासूम लड़की
बिना बोले ही कुछ भी
सब कुछ अपनी आँखों से
बोल रही थी

   आर. डी. वैरागी "उधार"
🌹🌷🌹🌷🌹🌷

मेरी नजर में

कविवर रविन्द्रनाथ टैगोर की प्रसिद्ध कहानी काबुलीवाला में एक लड़की है जिसका नाम "मिनी" है। काबुलीवाले का असली नाम रहमत है। काबुलीवाला अफगान से व्यापार करते करते कलकत्ता आ जाता है। चलते चलते उसे एक परिवार की इस मिनी से मुलाकात हो जाती है। कहानी अपनी जगह चलती है पर काबुलीवाले को उस लड़की में अपनी लड़की दिखाई देती है। उसका जुड़ाव इतना प्रगाढ़ हो जाता है कि मिनी उसके जीवन का हिस्सा बन जाती है। यह निर्मल-कोमल रिश्ता एक अलौकिक अनुभूति है। मिनी को वह "लल्ली" कह कर बुलाता है।
इस कविता में भी कवि "उधार" को एक "लल्ली" मिल जाती है जिसे वह एक मासूम लड़की कहता है। अनजाने में उसका रिश्ता कवि से लल्ली की तरह का जुड़ जाता है। इस महीन रिश्ते में वह उस भोली-भाली के मर्म को गहराई से पढ़ता है जैसा वहाँ लिखा वैसे का वैसा ही। "बारिश की कुछ बूँदे झेल रही थी" एक बालसुलभ क्रिया है जो उसको एक आह्लाद का अनुभव कराता है। इस बीच उसे खिलौने बनाने की याद आती है। यह लड़की प्रकृति में बनावटी नहीं प्राकृतिक संसाधनों से ही खेलती है। "घूँधना" शब्द आंचलिक भाषा का शब्द है जो "सानना" का समानार्थी शब्द है। इस शब्द ने लड़की को हमारे ग्रामीण परिवेश का अंग बना दिया है जिससे यह शब्दचित्र हमें ठेठ गाँव में सौंधियाती गीली-सूखी मिट्टी का अनुभव कराता है। कांक्रीट के शुष्क जंगल में गीली मिट्टी कहाँ उपलब्ध है। घूँधी हुई इस मिट्टी से उसे वह बनाना है जिसकी वह विचारणा करती है, संकल्पना करती है। कवि ने इसे आगे "अपने-सपने" कहा है। ये सपने वास्तव में उस लड़की के निजी है। ये सपने नहीं बल्कि वे बीज हैं जो उसने अपने मन की धरती पर बो दिये हैं। कवि टटोलता है कि ये कौनसे बीज हैं जो मासूम लड़की के जीवन में प्रस्फुटित होंगे। सपने जो भी हों पर घरौंदे को बनाने की कशिश और उसके बनने बिगड़ने के उतार चढ़ाव को खुली आँखों से देखना जीवन की सच्चाई से रूबरू होना है। इस लड़कपन में भविष्य को आँक लेना, वह भी अत्यन्त सहजता से, एक विहंगम दृष्टि का परिचायक है। 
वह मासूम लड़की
बिना बोले ही कुछ भी
सब कुछ अपनी आँखों से
बोल रही थी
अन्तिम चार लाइने कविता का क्लाइमेक्स है। उस लड़की का मौन उसकी वैचारिक गम्भीरता का द्योतक है पर सब कुछ आँखों से बोल जाना उसका भावनात्मक कौशल है। असल में यह कौशल कवि का है जो कथन को सादगी से इस चरम बिन्दु तक लाता है। इस मासूम लड़की की सादगीपूर्ण क्रिया कलापों में घट रहे वर्तमान की गोद में पल रहे भविष्य को उकेरता है। लल्ली और इस मासूम लड़की में कितना साम्य है। कविता बेटियों की श्रेष्ठ विचारशीलता और सृजनधर्मिता को रेखांकित करती है। संपूर्ण कविता में गत्यात्मकता है। रचना सोद्देश्य है।

रामनारायण सोनी
१२.०३.२०२०

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