हिन्दी कविता की समीक्षाएं
Thursday, 24 December 2020
काव्य की अन्तर्धाराएँ विषयक
Tuesday, 21 April 2020
समीक्षा ४५
समीक्षाएँ डॉ पहलवान
नए दिन का मतलब
खिड़की पर चिड़िया ने आकर
चीजें कहां
मैंने चादर अपने ऊपर खींच ली।
चिड़िया फिर चीं-चीं बोली,
अब मैंने कहा -
सुबह-सुबह क्यों सताती हो,
सोने दो ना।
चिड़िया बोली -
मैं तुम्हें उठाने आई हूँ
सवेरा हो गया
नया दिन शुरू हो गया,
नया दिन मतलब
तुम्हारे जीवन की किताब का
एक नया पन्ना।
बात की शुरुआत अन्तिम पद से करना होगी।
नया दिन मतलब तुम्हारे जीवन की किताब का
एक नया पन्ना। जीवन एक किताब है। किताब के पन्ने समय की कलम से लिखे गये या लिखे जाने वाले आलेख हैं। नये दिन का मतलब हमारे जीवन की किताब का एक नया पन्ना है। हर सक्ष को हर दिन अपने जीवन की किताब का एक नया पन्ना मिलता है। चाहो तो इस पर लिखो या कुछ न लिखो। जैसा भी हो यह पन्ना तो पलटेगा ही। यह स्वाँस के अंतिम छोर तक चलता रहेगा। समय अपनी धुरी पर अपनी निर्बाध गति से चलता है। जीना तो वर्तमान में ही है और न ही जीवन की वास्तविकता से दूर भागा जा सकता है। हर नए दिन का स्वागत होना चाहिये। बस आज सुबह उसी किरण को पकड़ कर उजालों की तलाशना शुरू कर देना चाहिये।
कठोपनिषद् का सूत्र सफल जीवन का मूलमंत्र है।
"उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत।" कुछ लोग इसका अर्थ थोड़ा इस तरह करते हैं - उठो, जागो, और जानकार पुरुषों का श्रेष्ठ सान्निध्य प्राप्त करो। लेकिन 'उत्तिष्ठ' का शब्दार्थ है उठ कर खड़े होना। जाग्र का अर्थ जागना नही है वरन् जाग्रति को प्राप्त होना है, चेतना को जगाना है। उठ कर खड़े होना एक भाव है कि आलस्य, प्रमाद, अक्रियाशीलता आदि का त्याग करो। अपनी चेतना, जो तुम में सर्वत्र व्याप्त है, उसे जाग्रत करो। शेर जंगल का राजा होता है, अपरिमित बल का स्वामी भी है और शिकार वहाँ है भी परन्तु -
उद्योगिनं हि पुरुष सिंहमुपैति लक्ष्मी
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः।।
सोते हए शेर के मुख में शिकार आ कर नही गिरेगा उठ कर शिकार करना पड़ेगा। इसलिये उपनिषद् का ऋषि संदेश करता है कि खड़े हो जाओ और सक्रिय हो जाओ।
कविता में चिड़िया ऋषि ही की तरह सोते हुए "मैं" को चीं - चीं कर जगा रही है। हमारा शरीर और मन बड़ा प्रमादी है। उसे आराम बहुत पसन्द है। चादर खींच कर वापस पड़े रहना प्रमाद और आलस्य ही तो है। चिड़िया की बार बार की चिचियाहट प्रमाद की लय को तोड़ कर एक नये उजाले का, नये उत्साह का, नये दिन का शुरू होना बता रही है। आज का का यह नया दिन नये प्रश्न, नई चुनौतियाँ, नये कर्मक्षेत्र, नये लक्ष्य ले कर आया है। तुम्हारे जीवन के कृतीत्व रूपी किताब के पिछले पन्नों के साथ इस पन्ने को भी जुड़ना है।
ऐसा लगता है कि हम अभी तक प्रमाद भरी एक प्रगाढ़ निद्रा में सो रहे थे और अभी अभी चिड़िया ने आकर हमें झकझोर कर खड़ा कर दिया है। अब सामने लक्ष्य होंगे, रास्ते होंगे, विकल्प तथा संकल्प होंगे और होंगी जीवन को जीने की अदम्य इच्छा। मानो तो यह चिड़िया हमें हम से परिचय कराने आयी है।
रामनारायण सोनी
२१.४.२०२०
Tuesday, 31 March 2020
समीक्षा ४२
प्रेम कथा बेंच पर
कविता में कोई कथा है, यह कथा प्रेम(?) कथा है। कथा बेंच पर बैठ कर सुनाई जा रही है।
यह चार प्रश्नों से प्रारंभ होती है-अरे! तुम?,
इस तरह?, यहाँ?, आज अचानक कैसे?
"तुम" किसे सम्बोधित है यह आगे पता चलेगा। "यहाँ" से लगता है परिदृष्य में कोई बगीचा है उसमें कहीं एक बेंच है और प्रेम कथा इसी रंगमंच पर कही जा रही है। प्रेम कथा प्रेम की कथा है या नहीं यह तो अन्त में ही पता चल पाएगा पर यह साफ-साफ समझ में जाता है कि-
आओ, आओ बैठें
जमाने गुजर गए
कुछ अपनी कहें
कुछ तुम्हारी सुनें
कहानी जो कुछ भी हो वह अपनी जगह है पर वह कहानी अभिव्यक्ति चाहती है। उसमें पैदा हुई घुटन से ऐसा लगता है जैसे जमीन पर बारूदी सुरंगें बिछी जिसमें अचानक किसी दबाव के विस्फ़ोट हो जावेगा। "जमाने गुजर गए, कुछ अपनी कहें, कुछ तुम्हारी सुनें।" गुजरे जमाने का तात्पर्य उस गुजरे जीवन से है जो व्यस्त रहा, क्रियात्मकता से भरा रहा और जहाँ आस-पास रिश्ते ही रिश्ते थे परन्तु सबसे खास बात यह थी कि वे रिश्ते कुछ कहते भी थे और सुनते भी थे।
पर आज के बदले परिवेश में अनकहे भाव, अनकहे जजबात ही वे बारूदी सुरंगें है जो कहीं सुनाए नहीं गए तो विप्लव खड़ा करेंगे। परन्तु आज इस तथा-कथा को सुनेगा कौन? सुनने वाले के पास समय नहीं है, समय है तो उसे पसन्द नहीं है। कभी गाँव में बड़े बूढ़े कहावत कहा करते थे कि तेरा दुखड़ा कोई नही सुने तो जंगल जाया कर और खेजड़ी को सुना आया कर। खेजड़ी एक ऐसा छोटा वृक्ष होता है जो लगभग आदमी के कद का होता है। उसे अपनी सुनाने वाले का जी हल्का हो जाता था। पर अब ये सब वृक्ष कट गए हैं। गाँव में एक चौपाल संस्कृति हुआ करती थी जहाँ कोई कुछ कहता था और बाकी सब उसकी सुनते थे। बाद में ये चौपाल पेड़ों की छाँव वाले ओटलों (चबूतरों) में बदल गए जो कुछ हद तक चौपालों का प्रतिनिधित्व करते रहे। ये वे सामुदायिक स्थल थे जहाँ कवि की ये पंक्तियाँ "कुछ अपनी कहें, कुछ तुम्हारी सुनें" चरितार्थ होती थी। इन जगहों पर कहने वाले भी थे और सुनने वाले भी थे। यों तो हर पुरानी पीढी नई नस्लों से शिकायतें करती चली आयी है कि भई जमाना कितना बदल गया है, वगैरह-वगैरह। परन्तु जो परिदृष्य पिछली आधी सदी में बदला है उसने जीवनशैली, सोच और आदमी की आचारसंहिता में आमूल चूल परिवर्तन कर दिया है। लोगों के पास आपस मे कहने सुनने का वक्त नहीं रह गया है। कविता में चल रही कथा के नेपथ्य में इन्हीं वृत्तियों की अनुगूँज स्पष्ट सुनाई पड़ रही है। चौपाल, ओटले जैसे सामुदायिक स्थल या जंगल की खेजड़ी की जगह पार्क में एक कोने में पड़ी इस बेंच ने ले ली है। हमारा नायक यहाँ रोज आता है। आज उसने कहने सुनने का अपना ढंग खोज लिया है।
"बताओ कब तक यहाँ हो?
..........
.........."
इसमें "बताओ कब तक यहाँ हो? एक एरियल गन से दागा गया पश्न है परन्तु यह प्रश्न नहीं है बस सुरंग का खाली होना है जो आगे दो पंक्तियाँ के ........ अर्थात् इस अनलिखे शून्य से स्पष्ट है। यही कविता के प्रारंभिक चार प्रश्नों का तात्पर्य भी है।
और यह संवाद भी विचित्र संवाद है:-
"अरे नहीं तो?
..........
..........
क्यों क्या हुआ ऐसा ?
...........
..........."
कविता का अत्यन्त मार्मिक हृदयस्थल है जो पाठक को आंदोलित करता है। यहाँ खाली छोड़ी गई पंक्तियाँ सबसे ज्यादा बोल रही हैं। इस प्रेमकथा की ये पंक्तियाँ केवल नायक सुन रहा है उस सहनायक की आवाज जो अपनी कल्पना-शीलता से नायक ने गढ़ लिया है और बड़े स्नेह से इस बेंच पर बैठाल लिया है कुछ अनकहे वाकियात कहने को। कविता पहले ही कह चुकी है कि जो यहाँ मेरे साथ घटा है वह तुम्हारे साथ भी वहाँ वैसा हुआ होगा यानी तुम्हारा जीवन भी ऐसा ही चला होगा और तुम्हें भी कोई सुनने वाला नहीं मिला होगा।
नायक विक्रम बना इस अपने भीतर पैदा हुए इस शून्य के वैताल को कब तक पीठ पर लाद कर चलेगा? कविता में पूछे गये प्रश्न यक्ष प्रश्न से बहुत छोटे हैं और उस बगीचे की फिजाएँ युधिष्ठिर की तरह नही है जो कोई जवाब दे पायेगी।
आज समाज में संवादहीनता बढ़ती जा रही है। कविता प्रश्न नहीं एक खालीपन को उघाड़ती है। खालीपन आदमी से आदमी के बीच का, खालीपन पीढ़ियों के बीच का, खालीपन रिश्तों के बीच का, खालीपन परस्पर साहचर्य का। कविता चिन्ता नहीं चिन्तन प्रस्तुत कर रही है। इस रचना के सृजन के समय यही कवि की अन्तर्वृत्ति रही होगी। कविता स्वयं एक संवाद है जो पाठक को सरसता प्रदान करता है, तसल्ली देता है। यहाँ कहीं भी व्यथा, आक्रोश और पीड़ा का प्रदर्शन नहीं है इसलिये यह कथा प्रेम कथा ही है।
Thursday, 19 March 2020
कवि परिचय
नाम:- अरविन्द व्यास
पिता का नाम:- स्व. श्री भाऊशंकर व्यास
जन्म स्थान:- झाबुआ (मध्य प्रदेश)
शिक्षा:- एम.एस.सी. केमिस्ट्री बी. एड.
साहित्यिक गतिविधि:- किशोरावस्था से ही लेखन
प्रकाशन:- लेख कविताएँ पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित
विशेष रुचि:- अध्यात्म, संगीत, पर्यटन, पठन और लेखन
सम्प्रति:- सेवानिवृत्त प्राचार्य, छत्तीसगढ़
समीक्षा ४१
एक कविता डॉ मुरलीधर चाँदनीवाला की।
ढोल बजाकर नहीं देखा भगवान् ने,
बाँसुरी बजाई तो सुनाई नहीं दी,
शंख फूँका
तो कान फट गये कौरवों के।
ढोल तो कारुलाल की माँ ने बजाया
या रावटी के छगन बा ने,
रोटी के लिये बजाया गया बाजा
निकल गया कितना आगे।
आदमी मरते-खपते आगे निकल जाता है,
मंदिरों में भगवान् देख-देख
खुश होते हैं।
ढोल बजाकर क्यों नहीं देखा, भगवान् !
एक बार बजाते,
तो फिर बजाते ही चले जाते।
एक बार ढोल बजाकर तो देखो,
तुम दूर बैठे हो
तो बहुत अच्छा है,
ढोल भी दूर के ही सुहावने होते हैं।
🍁मुरलीधर चाँदनीवाला
🌹🌷🌹🌷🌹🌷
मेरी नजर में:-
ढोल बजाकर नहीं देखा भगवान् ने,
बाँसुरी बजाई तो सुनाई नहीं दी,
शंख फूँका
तो कान फट गये कौरवों के।
ढोल, बाँसुरी और शंख यहाँ प्रतीकात्मक शब्द है। बाँसुरी माधुर्य, प्रेम और रास का संकेत करता है, शंख या तो मंदिरों में आरती के समय बजाया जाता है या पौराणिक काल के युद्ध के उद्घोष के समय बजाया जाता था। भगवान कृष्ण का प्रेम और रास अलौकिक था और शंखनाद महाभारत युद्ध का उद्घोष था। थोड़ा अटपटा तो लगता है कि भगवान कृष्ण ने ढोल क्यों बजा कर नहीं देखा? वास्तव में कृष्ण के बालपन में छह माह की उम्र से लगायत द्वारकाधीश श्री कृष्ण तक का जीवन काल संघर्षों और बाधाओं से भरा रहा शायद इसीलिये उनके जीवन में महारास और महानाश के मध्य लोकरंजन जैसे क्षण उपलब्ध न हो सके।
कविता अपने प्रतीकों के माध्यम से इसे बखूबी बयान करती है। हम सब इस ढोल को बचपन से सुनते आ रहे हैं पर गौर से नहीं जाना कि यह कि यह "ढोल" आखिर है क्या?
भरत मुनि ने अपने नाट्य शास्त्र में वाद्यों का वर्गीकरण करते हुए लिखा है किः-
ओतोद्य विधिमिदानी व्याख्यास्यमः। तद्यथा-
ततं चैवावनद्धं च घने सुषिर मेव च।
चतुर्विधं तु विज्ञेयमातोद्यं लक्षणान्वितम्।।1।।
ततं तन्त्री गतं ज्ञेयनवनद्धं तु पौष्करम्।
घनं तालस्तु विज्ञेयः सुषिरो वंश उच्चते।।2।।
वाद्य यंत्रों के उपर्युक्त चार वर्ग निम्नांकित हैं-
1. घन वाद्य: बिणाई, काँसे की थाली, मजीरा, घाना/घानी, घुँघरू, कँसेरी, झाँझ आदि
2. चर्म वाद्य: हुड़का, डौंर, हुड़क, ढोलकी, "ढोल", दमाऊँ, नगाड़ा, धतिया नगाड़ा आदि
3. सुशिर वाद्य: मुरुली, जौंया मुरली, भौंकर/भंकोरा, तुरही, शंख आदि
4. ताँत वाद्य: (या उर्ध्वमूखी नाद) ताँत वाद्य/तार आदि।
शंख-घंट तथा उर्ध्वमुखी नाद ऐसे वाद्य हैं जिन्हें लोक वाद्य की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।
लोक वाद्य हमारे मन को संगीतमय बनाते आए हैं। लोक वाद्यों ने इस धारणा को पुष्ट किया है कि संपूर्ण प्रकृति संगीतमय है। यह संगीत सृष्टि के प्रारंभ से ही सम्पूर्ण जीव-जगत में व्याप्त है। प्रकृति के कण-कण से अविरल प्रवाहित होता है सुर और ताल की सीमाओं में बँधा उन्मुक्त संगीत, उसकी लय में परियों का छम-छम नर्तन। इसी ने लोक जीवन को बांध कर रखा है। कई वाद्ययंत्रों का जन-मानस द्वारा पूर्व काल से ही प्रयोग किया जा रहा है। ये वाद्य हमारे लोक-जीवन के अभिन्न अंग रहे हैं। इसीलिए इन्हें लोकवाद्य कहा जाता है। इन्हें बजाने वाले का संबोधन "लोक वादक" के नाम से किया जाता है। लोक संस्कृति की सीमा अनन्त है। इन लोक वाद्यों को सामाजिक धरोहर के रूप में संजोकर वर्तमान पीढ़ी तक सुरक्षित रखने का श्रेय इन्ही लोक वादकों को जाता है। आज जो भी लोक संस्कृति का ज्ञान संरक्षित है, यह धरोहर उन्हीं के द्वारा संजोई गयी है।
ढोल की यात्रा लोक रंजन से लोकमंगल तक आई और इस तरह यह अपना सांस्कृतिक मूल्य रखती है फिर यही ढोल रोजी-रुजगार के रूप में परिणित होने लगा लेकिन तारीफ की बात तो यह है कि ये तीनों परिक्षेत्र ढोल बजाने में अब भी बरकरार हैं।
कविता में "कारूलाल की माँ" और "छगन बा" ऐसे ही लोक वादक हैं, ढोल उनका लोक वाद्य है। पहले तो पूरा गांव इनका संरक्षक होता था, और इन्हें काम के बदले अनाज दिया जाता है लेकिन सदियों से चली आ रही ये व्यवस्था अब तेज़ी से बिखरने लगी है। शादी, नामकरण, स्थानीय देवताओं की पूजा, जागर, जत्रा, बैसी, चौरासी आदि में हमारे ही लोक वाद्यों की आवश्यकता होती है। बिना इनके वादन के हमारे मंगल कार्य सम्पन्न नहीं होते हैं। अतः इन लोक वाद्यों को पौराणिक वाद्य के साथ-साथ सामाजिक वाद्य भी कहा जाय तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।
ढोल तो कारुलाल की माँ ने बजाया
या रावटी के छगन बा ने,
रोटी के लिये बजाया गया बाजा
निकल गया कितना आगे।
रावटी रतलाम जिले ३५ किलोमीटर दूर एक ऐतिहासिक आदिवासी बहुल कस्बा है। यह महाराजा रतनसिंहजी के राज्य की राजधानी रही है। यहाँ आज भी आदिम संस्कृति को जीवन्त देखा जा सकता है। विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर यहाँ आदिवासी जन सैलाब उमड़ता है तथा ढोलक, थाली और मांदल की थाप पर आनन्दोत्सव मनाया जाता है। लगता है कवि ने स्वयं इन दृष्यों को रूबरू देखा है जो कविता में कथ्य के रूप में साकार होता दिखाई देता है।
एक बार ढोल बजाकर तो देखो,
तुम दूर बैठे हो
तो बहुत अच्छा है,
ढोल भी दूर के ही सुहावने होते हैं।
"कान्हा आओ तो सरी।" कान्हा को खुला आमन्त्रण है कि वह हमारे बीच आवें और इस आनन्दोत्सव में सहभागी बने, सम्मिलित होवे। एक बार बजाओगे तो बजाते ही चले जाओगे।
कविता ढोल की प्रतीकात्मकता के माध्यम से उत्सव प्रियता, सांस्कृतिक सम्पन्नता, सामूहिकता और लोकमंगल की बात करती है। रावटी के छगन बा में प्रयुक्त 'बा' ग्रामीण अंचल में प्रौढ़ व्यक्ति के प्रति सम्मान प्रकट करता हुआ शब्द है। रावटी शब्द कपड़े का बना हुआ एक प्रकार का छोटा घर या डेरा होता है जिसके बीच में एक बँडेर होती है और जिसके दोनों ओर दो ढालुएँ परदे होते हैं। यह राजपूताना दौर का विशाल कैम्प हाउस है जो सामूहिक उत्सव मनाने का स्थल है। कविता प्रेम और संघर्ष रूपी दुकूलों के बीच बहने वाली सहज सुसंस्कृत जीवन सरिता से परिचय कराती है। अपने उदर पोषण के लिये किया गया उद्यम भी लोकरंजक और लोकमंगलकारी हो। कविता का निहित संदेश मांगलिक है।
रामनारायण सोनी
१९.०३.२०२०
Sunday, 15 March 2020
समीक्षा ४०
Saturday, 14 March 2020
कविता की अन्तर्धाराएँ
समीक्षा ३९
Friday, 13 March 2020
समीक्षा ३६
समीक्षा ३८
समीक्षा ३७
काव्य की अन्तर्धाराएँ विषयक
काव्य की अन्तर्धाराएँ एक प्रयोग है। यह समालोचना के सम्पूर्ण परिक्षेत्र में नूतन प्रयोग है। क्योंकि अधिकतर समीक्षाएँ या तो एक कवि, या एक काव...
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