समीक्षा ३८
डॉक्टर सुषमा रावत की एक कविता: "मेरा जीवन"
डॉक्टर सुषमा रावत शिशु रोग विशेषज्ञ हैं और अपना निजी अस्पताल चाइल्ड केयर हॉस्पिटल के नाम से है जिसे स्वयं संचालित करती हैं। इनकी अभिरुचि शोध कार्य, विटामिन डी एवं दिनचर्या, संगीत, गायन, लेखन है। इनकी प्रकाशित कृति है "फ्रीडम फॉर एपिलेप्सी"।
"मेरा जीवन"
पता नहीं, कितनी कीमत है,
कितनी इज्जत है मेरी,
पर अहंकार को डिब्बी में बंद कर
सागर तले रख दिया है
हाँ, कठपुतली हूं मैं,
जिसकी एक डोर
स्वयं श्रीकृष्ण के हाथ में,
और दूसरी स्नेही जनों के,
मेरा जीवन-नृत्य उँगलियों से है,
इसी बीच ढूँढती हूँ जीवन का मकसद,
कैसे याद किया जाएगा मुझे मेरे बाद?
क्या एक वृक्ष की तरह?
जिसकी जड़ें ज्ञान अर्जन कर
परिवर्तित करती रही
ऐसे फल में जो अब सबका जीवन अमृत है,
उस समय, दूसरों का तो फिर भी पता नहीं,
पर मेरी नजरों में मेरी
कीमत और इज्जत जरूर होगी।
डॉ सुषमा रावत
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मेरी नजर में...
इस कविता के मूल में त्रिआयामी तत्व हैं। लोकायतन, रंगायतन और भावायतन।
"लोकायतन" में सांसारिक क्रियाएँ, प्रतिक्रियाएँ और लोकमंगल का विचार है। "रंगायतन" में जीवन का परम उद्देश्य, कर्म की महत्ता, जीने का आनन्द और उसकी प्राप्ति के महीन सूत्र हैं और "भावायतन" में कर्मनिष्ठा, लोककल्याण, भक्तिमय समर्पण, परमार्थ और आत्मबोध के भाव हैं। इन तीनों का यहाँ अद्भुत समन्वय है। यहाँ इसकी त्रिवेणी बहती है।
कर्म, अकर्म और विकर्म के निर्णय में बड़ा प्रचलित वाक्य है- "लोग क्या कहेंगे?" कविता का प्रारंभ भी इसी अदृष्य प्रश्न से होता है। क्या करूँ या क्या न करूँ? यह भ्रम है, यही अनिश्चयता है। श्रीमद्भगवद्गीता का प्रादुर्भाव अर्जुन के भ्रम में पड़ जाने के कारण होता है लेकिन उपसंहार उनके आत्मबोध से होता है। अर्जुन कहते हैं बीच में भक्ति, कर्म और ज्ञान की त्रिधाराएँ बहती हैं। कविता में गीता के ये तत्वदर्शन समाविष्ट हैं। अहंकार का लौकिक अर्थ घमण्ड है और आध्यात्मिक अर्थ वह तत्व जो भौतिक विषय-सुखों की चाह करने वाला है। कविता कृत संकल्प है कि यह अहंकार त्याग दिया गया है और अर्पिता प्रभु की राजी में अपनी रजा समझती हैं। कविता में कृष्ण की भक्ति है, वृक्ष की तरह का निष्काम कर्मयोग है और स्वयं को पहचानने का आत्मबोध है। जीवन की आस्था स्नेही जनों से बँधी है और विश्वास जगदीश्वर श्री कृष्ण से जुड़ा है। इस तरह आस्था और विश्वास का सुन्दर युग्म है।
"मेरा जीवन-नृत्य" है। नृत्य तो स्वयं एक उत्सव है। इस उत्सव के तार यदि श्री कृष्ण और अपने लोगों से जुड़े हों तो वह रास ही है। इस आनन्दोत्सव के मध्य यदि जीवन जीने का मकसद मिल जाता है तो जीव धन्य हो जाता है। मन का परितोष मिल जाना जीवन में अमृतत्व को उपलब्ध हो जाना है।
कविता आत्मबोध कराती है और भ्रमरहित करती है। "मेरी नजरों में मेरी / कीमत और इज्जत जरूर होगी।" कविता भक्ति, ज्ञान और कर्म का अद्भुत संगम है।
रामनारायण सोनी
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