हिन्दी कविता की समीक्षाएं

Thursday, 19 March 2020

समीक्षा ४१

 एक कविता डॉ मुरलीधर चाँदनीवाला की।

        ढोल बजाकर नहीं देखा भगवान् ने,
           बाँसुरी बजाई तो सुनाई नहीं दी,
                         शंख फूँका
             तो कान फट गये कौरवों के।

        ढोल तो कारुलाल की माँ ने बजाया
                या रावटी के छगन बा ने,
           रोटी के लिये बजाया गया बाजा
               निकल गया कितना आगे।

      आदमी मरते-खपते आगे निकल जाता है,
                मंदिरों में भगवान् देख-देख
                         खुश होते हैं।
      
         ढोल बजाकर क्यों नहीं देखा, भगवान् !
                        एक बार बजाते,
               तो फिर बजाते ही चले जाते।

              एक बार ढोल बजाकर तो देखो,
                         तुम दूर बैठे हो
                       तो बहुत अच्छा है,
            ढोल भी दूर के ही सुहावने होते हैं।

                   🍁मुरलीधर चाँदनीवाला

🌹🌷🌹🌷🌹🌷
मेरी नजर में:-

ढोल बजाकर नहीं देखा भगवान् ने,
           बाँसुरी बजाई तो सुनाई नहीं दी,
                         शंख फूँका
             तो कान फट गये कौरवों के।

ढोल, बाँसुरी और शंख यहाँ प्रतीकात्मक शब्द है। बाँसुरी माधुर्य, प्रेम और रास का संकेत करता है, शंख या तो मंदिरों में आरती के समय बजाया जाता है या पौराणिक काल के युद्ध के उद्घोष के समय बजाया जाता था। भगवान कृष्ण का प्रेम और रास अलौकिक था और शंखनाद महाभारत युद्ध का उद्घोष था। थोड़ा अटपटा तो लगता है कि भगवान कृष्ण ने ढोल क्यों बजा कर नहीं देखा? वास्तव में कृष्ण के बालपन में छह माह की उम्र से लगायत द्वारकाधीश श्री कृष्ण तक का जीवन काल संघर्षों और बाधाओं से भरा रहा शायद इसीलिये उनके जीवन में महारास और महानाश के मध्य लोकरंजन जैसे क्षण उपलब्ध न हो सके।
कविता अपने प्रतीकों के माध्यम से इसे बखूबी बयान करती है। हम सब इस ढोल को बचपन से सुनते आ रहे हैं पर गौर से नहीं जाना कि यह  कि यह "ढोल" आखिर है क्या?
भरत मुनि ने अपने नाट्य शास्त्र में वाद्यों का वर्गीकरण करते हुए लिखा है किः-
ओतोद्य विधिमिदानी व्याख्यास्यमः। तद्यथा-
ततं चैवावनद्धं च घने सुषिर मेव च।
चतुर्विधं तु विज्ञेयमातोद्यं लक्षणान्वितम्।।1।।
ततं तन्त्री गतं ज्ञेयनवनद्धं तु पौष्करम्।
घनं तालस्तु विज्ञेयः सुषिरो वंश उच्चते।।2।।
वाद्य यंत्रों के उपर्युक्त चार वर्ग निम्नांकित हैं-
1. घन वाद्य: बिणाई, काँसे की थाली, मजीरा, घाना/घानी, घुँघरू, कँसेरी, झाँझ आदि
2. चर्म वाद्य: हुड़का, डौंर, हुड़क, ढोलकी, "ढोल", दमाऊँ, नगाड़ा, धतिया नगाड़ा आदि
3. सुशिर वाद्य: मुरुली, जौंया मुरली, भौंकर/भंकोरा, तुरही, शंख आदि
4. ताँत वाद्य: (या उर्ध्वमूखी नाद) ताँत वाद्य/तार आदि।
शंख-घंट तथा उर्ध्वमुखी नाद ऐसे वाद्य हैं जिन्हें लोक वाद्य की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।
लोक वाद्य हमारे मन को संगीतमय बनाते आए हैं। लोक वाद्यों ने इस धारणा को पुष्ट किया है कि संपूर्ण प्रकृति संगीतमय है। यह संगीत सृष्टि के प्रारंभ से ही सम्पूर्ण जीव-जगत में व्याप्त है। प्रकृति के कण-कण से अविरल प्रवाहित होता है सुर और ताल की सीमाओं में बँधा उन्मुक्त संगीत, उसकी लय में परियों का छम-छम नर्तन। इसी ने लोक जीवन को बांध कर रखा है। कई वाद्ययंत्रों का जन-मानस द्वारा पूर्व काल से ही प्रयोग किया जा रहा है। ये वाद्य हमारे लोक-जीवन के अभिन्न अंग रहे हैं। इसीलिए इन्हें लोकवाद्य कहा जाता है। इन्हें बजाने वाले का संबोधन "लोक वादक" के नाम से किया जाता है। लोक संस्कृति की सीमा अनन्त है। इन लोक वाद्यों को सामाजिक धरोहर के रूप में संजोकर वर्तमान पीढ़ी तक सुरक्षित रखने का श्रेय इन्ही लोक वादकों को जाता है। आज जो भी लोक संस्कृति का ज्ञान संरक्षित है, यह धरोहर उन्हीं के द्वारा संजोई गयी है।
ढोल की यात्रा लोक रंजन से लोकमंगल तक आई और इस तरह यह अपना सांस्कृतिक मूल्य रखती है फिर यही ढोल रोजी-रुजगार के रूप में परिणित होने लगा लेकिन तारीफ की बात तो यह है कि ये तीनों परिक्षेत्र ढोल बजाने में अब भी बरकरार हैं।
कविता में "कारूलाल की माँ" और "छगन बा" ऐसे ही  लोक वादक हैं, ढोल उनका लोक वाद्य है। पहले तो पूरा गांव इनका संरक्षक होता था, और इन्हें काम के बदले अनाज दिया जाता है लेकिन सदियों से चली आ रही ये व्यवस्था अब तेज़ी से बिखरने लगी है। शादी, नामकरण, स्थानीय देवताओं की पूजा, जागर, जत्रा, बैसी, चौरासी आदि में हमारे ही लोक वाद्यों की आवश्यकता होती है। बिना इनके वादन के हमारे मंगल कार्य सम्पन्न नहीं होते हैं। अतः इन लोक वाद्यों को पौराणिक वाद्य के साथ-साथ सामाजिक वाद्य भी कहा जाय तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।
        ढोल तो कारुलाल की माँ ने बजाया
                या रावटी के छगन बा ने,
           रोटी के लिये बजाया गया बाजा
               निकल गया कितना आगे।
रावटी रतलाम जिले ३५ किलोमीटर दूर एक ऐतिहासिक आदिवासी बहुल कस्बा है। यह महाराजा रतनसिंहजी के राज्य की राजधानी रही है। यहाँ आज भी आदिम संस्कृति को जीवन्त देखा जा सकता है। विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर यहाँ आदिवासी जन सैलाब उमड़ता है तथा ढोलक, थाली और मांदल की थाप पर आनन्दोत्सव मनाया जाता है। लगता है कवि ने स्वयं इन दृष्यों को रूबरू देखा है जो कविता में कथ्य के रूप में साकार होता दिखाई देता है।
              एक बार ढोल बजाकर तो देखो,
                         तुम दूर बैठे हो
                       तो बहुत अच्छा है,
            ढोल भी दूर के ही सुहावने होते हैं।
"कान्हा आओ तो सरी।" कान्हा को खुला आमन्त्रण है कि वह हमारे बीच आवें और इस आनन्दोत्सव में सहभागी बने, सम्मिलित होवे। एक बार बजाओगे तो बजाते ही चले जाओगे।
कविता ढोल की प्रतीकात्मकता के माध्यम से उत्सव प्रियता, सांस्कृतिक सम्पन्नता, सामूहिकता और लोकमंगल की बात करती है। रावटी के छगन बा में प्रयुक्त 'बा' ग्रामीण अंचल में प्रौढ़ व्यक्ति के प्रति सम्मान प्रकट करता हुआ शब्द है। रावटी शब्द कपड़े का बना हुआ एक प्रकार का छोटा घर या डेरा होता है जिसके बीच में एक बँडेर होती है और जिसके दोनों ओर दो ढालुएँ परदे होते हैं। यह राजपूताना दौर का विशाल कैम्प हाउस है जो सामूहिक उत्सव मनाने का स्थल है। कविता प्रेम और संघर्ष रूपी दुकूलों के बीच बहने वाली सहज सुसंस्कृत जीवन सरिता से परिचय कराती है। अपने उदर पोषण के लिये किया गया उद्यम भी लोकरंजक और लोकमंगलकारी हो। कविता का निहित संदेश मांगलिक है।

रामनारायण सोनी

१९.०३.२०२०



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