हिन्दी कविता की समीक्षाएं

Sunday, 15 March 2020

समीक्षा ४०

समीक्षा ४०

एक कविता श्री भगवान दास गुहा जी की " वो पिता ही होता है"।

वो पिता ही होता है"

जो दुख दर्द को हरदम पीता है 
ग़म खाता, ग़मज़दा नहीं होता
वो पिता ही होता है!!

उसके दु:ख दर्द का 
पता किसे होता है? 
लेकिन कौन करता है महसूस?
हाँ! वह अकेले में रोता है 
आसुओं को पीकर भी 
बाहर से खारा और अंदर से
अन्दर से "मीठा"ही होता है।
वो पिता ही होता है !!

सब कुछ! हाँ सब कुछ, 
"सब" को देने की चाहत में
"मैं", "मेरा", "अपना", 
सब कुछ दे चुका होता है
वो! पिता ही होता है!!
लेकिन, कभी वह
सुनकर वे शब्द, 
बेहद दु:खी, विचलित होता है
"क्या किया आपने हमारे लिए"?
क्या यही "सुनने" के लिए...  
उम्र भर, मर-मर के जीता है 
जीते जी मर कर भी जीता है,
वो विष पीकर भी जीता रहा है
वो! पिता ही होता है!
वो पिता ही होता है!!

     भगवान दास गुहा 
🌹🌷🌹🌷🌹🌷

मेरी नजर में

पिता - "पा" रक्षणे धातु से पिता शब्द निष्पन होता है, य: पाति स पिता अर्थात् 'जो रक्षा करता है वह पिता कहलाता है। 
निरूक्त कहता है -- 'पिता पाता वा पालयिता वा।' पालक, पोषक और रक्षक को पिता कहते हैं। वेद, पुराणों, स्मृतियों इत्यादि में पिता की महिमा का पर विशेष उल्लेख है। 
मनु कहते हैं --
उपाध्यान्दशाचार्य आचार्यणां शतं पिता।
अर्थात् दस उपाध्यायों से बढ़कर एक आचार्य, सौ आचार्यों से भी बढ़ कर पिता का स्थान ऊंचा है।
आगे कहा है --
"
पिता मूर्ति प्रजापते" अर्थात् पिता पालन करने से प्रजापति का मूर्तिरूप है।
महाभारत के वन पर्व में यक्ष युधिष्ठिर संवाद में प्रसंग आया है।     
यक्ष उवाच --
का स्विद गुयतरा भूमे:कि स्विदुच्चतरं च खात।
किं स्विच्छीघ्रतरं वायो: किं स्विदवहुतरं तृणात् ।।
अर्थात्-- पृथ्वी से भारी क्या है? आकाश से ऊंचा क्या है ? वायु से भी तीव्र चलने वाला क्या है? और तृण से भी असंख्य क्या है ? 
युधिष्टर उवाच --
माता गुरूतरा भूमे: पिता चोच्चतरं च खात।
मन: शिघ्रतरं वात चिन्ता तृणात्।
युधिष्टर ने कहा ---
माता पृथ्वी से भारी है, पिता आकाश से ऊंचा है, अर्थात्  पिता के हृदय रूपी आकाश में अपने पुत्र के लिए असीम प्रेम होता है।
और--
पिता धर्म: पिता स्वर्ग: पिता ही परम तप:।
पितरि प्रीतिमापन्ने  सर्वा: प्रीयन्ति देवता ।।
पिता ही धर्म है, पिता ही स्वर्ग है और पिता ही सर्व श्रेष्ठ तपस्या है, पिता के प्रसन्न हो जाने पर सारे देवता प्रसन्न हो जाते हैं।
'अथर्ववेद' में कहा गया है कि 'अनुव्रत: पितु: पुत्रो मात्रा भवतु संमना:' यानी पुत्र पिता के अनुकूल कर्म करने वाला और माता के साथ उत्तम मन से व्यवहार करने वाला हो।' 
सन्तान की प्रथम पाठशाला माँ है तो द्वितीय पिता है।  पिता उसको  उंगली पकड़कर चलना सिखाने के साथ जीवन जीने के समस्त पाठ पढ़ाता है। भोजन , वस्त्र, घर व अन्य सुविधाएँ उपलब्ध कराने के लिए वह दिन रात काम करता है उसे न रात दिखाई देती है न दिन दिखाई देते है पिता को बस परिवार के हालात भर दिखाई देते हैं।
समाज में कतिपय सन्तानों की बढ़ रही पिता के प्रति उपेक्षा से कातर है पिता। सन्तानों के कुछ शूल से चुभते प्रश्नों ने माता-पिता के जीवन को दुर्दान्त कर दिया है। जब वह अपने अतीत में झाँक कर देखता है तो बस एक आहत सिंह की तरह अपने व्रणों को स्वयं चाटता रहता है। हमारी संस्कृति के शब्दकोष में "वृद्धाश्रम" कहीं नही था। ये वृद्धाश्रम व्यवस्था नहीं विकल्प हैं जो परिवार और संस्कृति को छिन्न-भिन्न कर रहे हैं। वे पुत्र शायद भविष्य की उस अपनी सुलगाई आँच को नहीं महसूस कर रहे हैं जो एक दिन उन्हें भी जलाएगी। समाज में घुल रहे इस विष को कौन हटाएगा। 
इस दैन्य को उघाड़ती कविता, मर्म को भेदती कविता, पर पीड़ा को अनुभूत कराती कविता, कवि के व्यथित मन को उद्घाटित करती कविता है यह।
कहते हैं कि कविता कवि के हृदय की अनुकृति है, फोटो कॉपी है। जैसे मूर्ति तो मूर्तिकार के हृदय में पहले जन्म लेती है पत्थर में से वही प्रकट होती है, उसी तरह पीड़ा का आघात पहले कवि के हृदय में होता है बाद में उसे वह पृष्ठों पर उतारता है। काव्य के मनु कहे गए वाल्मीकि का हृदय भी क्रोंच की पीड़ा का आत्मानुभूत कर गया था और तब से सृजन का यह संसार चल पड़ा। कवि, लेखक व साहित्यकार सृजन धर्मा हैं।
कविता पिता का माहात्म्य, उसका तप तो बताती ही है पर सन्तति में कृतघ्नता से उपजे भावों के प्रति समाज के आज के युवाओं को सचेत भी करती है।

रामनारायण सोनी
१६.०३.२०२०

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