हिन्दी कविता की समीक्षाएं

Saturday, 14 March 2020

कविता की अन्तर्धाराएँ


काव्य वह वाक्य रचना है जिससे चित्त किसी रस या मनोवेग से पूर्ण हो अर्थात् वह जिसमें चुने हुए शब्दों के द्वारा कल्पना और मनोवेगों का प्रभाव डाला जाता है। कविता का शाब्दिक अर्थ है काव्यात्मक रचना या कवि की कृति, जो छन्दों की शृंखलाओं में विधिवत बाँधी जाती है। कविता के गुणधर्म विभिन्न समीक्षाओं में कहीं कहीं उन संदर्भों में भी लिखने का प्रयास किया गया है।
आदमी के व्यक्तित्व के तीन तल हैं पहला उसका शरीर, दूसरा मानस और तीसरा उसका अंतरतम। इन तीनों तलों पर प्रकृति, पर्यावरण, व्यवहार और संवाद का प्रभाव होता है। इन के संयुक्त प्रभावों का समावेश साहित्य में होता है जिसकी गुणवत्ताएं अलग अलग होती हैं। साहित्यकार इन भावों और प्रभावों से पहले स्वयं प्रभावित होता है फिर उनकी अनुभूतियों, संकल्पनाओं के जरिये कथन को किसी संदेश तक ले जाने का प्रयास करता है। कृतियों का सृजन करते समय ये तत्व उसके भीतर सक्रिय रहते हैं तो कृति लेखनी से साकार हो उठती है।
किसी के लिखे पर लिखना बड़ा दुस्कर कार्य है। अपनी अनुभूतियाँ लिखना तो सरल है। रचना लिखते समय किसी कवि ने किस अन्तर्वृत्ति में लिखा होगा यह जानना बड़ा मुश्किल काम है। इसमें चूक होना स्वाभाविक है क्योंकि कविता में प्रयुक्त शब्द-शक्तियों और भावप्रणवता को पढ़ा जाना एक अनुमान की तरह ही होता है। वास्तव में तो सारा लेखन पाठक के लिये ही होता है। पाठक द्वारा कविता के पढ़ने पर जो प्रभाव होता है वह सबसे महत्व पूर्ण है। आलोचना का आधार भी यही प्रभाव है। आलोचना इस भाव-सेतु का विवेचन भी है। किसी को देखना एक कृत्य है पर उस देखने वाले को उसके भीतर ही देखना कौतुक है। किसी भी दृश्य को, घटना को अथवा क्रिया- कलाप को देखने पर किसी संवेदनशील व्यक्ति के मानसपटल पर गहरा प्रभाव होता है। कभी कभी यह क्षणिक होता है पर कभी कभी यह प्रभाव उसके अन्तस्तल में पैठ जाता है। ऐसे कई प्रभाव मिलकर व्यक्ति में "अन्तर्वृत्ति" का निर्माण करते हैं। कवि, कथाकार, साहित्यकार में यह गुण पूर्ण रूप से विकसित होता है। उसके अपने स्वभाव और गुणधर्म से मिल कर एक अद्भुत संयोजन तैयार होता है जिसका प्रतिफल सृजन के रूप में सामने आता है। एक रचना का सृजन करते समय रचनाकार की अन्तर्वृत्ति जैसी रही होती है रचना का स्वरूप उसके अनुरूप ही होता है। 
आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी ने आलोचना में सात प्रतिमानों को वरीयता क्रम दिया, जिसमें कवि की अन्तर्वृत्ति को सर्वोपरि माना, तथा अंत में कवि के निहित सामाजिक संदेश को रखा। उनके अनुसार काव्‍य में मूलत: सौन्‍दर्यानुसन्‍धान को जीवन-चेतना से जोड़ा जाना अनिवार्य है। यहाँ हर कृति में...
"कवि की अन्तर्वृत्ति का सूक्ष्म व्यवच्छेद, हृदय की मुक्तावस्था, ‘आनंद की साधनावस्था’, ‘आनंद की सिद्धावस्था’, ‘लोक-सामान्य’, ‘साधारणीकरण’, ‘लोकमंगल’ आदि प्रतिमानों पर आधारित समीक्षा करने का प्रयास किया है। जिस भाव-भंगिमा, मुद्रा और तन्मयता के साथ कवि ने अपने काव्य की रचना की है, उसमें उतनी ही संवेदनशीलता और सहानुभूति के साथ मैंने कविता में प्रवेश करने की ईमानदारी से पूरी पूरी चेष्टा की है। मैं नहीं जानता कि ऐसा मैं कितना कर पाया हूँ।
मैने माना है कि किसी भी रचना की तरह समीक्षा भी उसकी पुनर्रचना होती है। मेरा प्रयास रहा है कि समीक्षा में मूल मानव वृत्तियों के साथ सहजात सम्बन्ध स्थापित हो और उस कविता में से उघाड़ कर उसे पाठकों के समक्ष रखा जाना चाहिये।
इस पुस्तक में शब्दवट, रिश्तों के बीज, भोर का उजास, साँसों के साथ मेरे अनुप्रयोग और कविता के झरनों पर नामक पुस्तकों की संक्षिप्त समीक्षा भी की गई है। इसमें इक्कीस कवियों/साहित्यकारों की ४० कृतियों की समीक्षा है जिनमें विभिन्न प्रकार रसों, वर्णिकछन्दों, मात्रिक छन्दों, मुक्त छन्दों आलेखों का समावेश है। "मेरी नजर में" ये कृतियाँ जैसी लगी वही समझ कर लिखी गई है इसलिये ये समीक्षाएँ मेरे अपने विचारों से अछूती नहीं है। इस समझ में हुई त्रुटियों के लिये संबन्धित साहित्यकार का मैं क्षमा प्रार्थी हूँ। 
समीक्षाएँ पाठकों को समर्पित हैं। आशा है ये उन्हें रुचेंगी।

रामनारायण सोनी

No comments:

Post a Comment

काव्य की अन्तर्धाराएँ विषयक

काव्य की अन्तर्धाराएँ एक प्रयोग है।  यह समालोचना के सम्पूर्ण परिक्षेत्र में नूतन प्रयोग है। क्योंकि अधिकतर समीक्षाएँ या तो एक कवि, या एक काव...