डॉक्टर सुषमा रावत की कविता "लहरों के बीच" साझा काव्य-संकलन "काव्य सुरभि" से।
"लहरों के बीच"
समन्दर की शोर मचाती लहरों के बीच,
एक सीप, शांत गहराई में,
पनपाती है अनमोल मोती।
रोजमर्रा की आपाधापी मैं
मन शान्त रखकर
चन्द लोग
ऐसे ही कुछ काम कर जाते हैं।
कैक्टस के पौधे की तरह
विपरीत परिस्थितियों में पुष्पित हो सकना
शौर्य है।
जो सीपियाँ विप्लवी लहरों के संग उछलकूद करके प्रमुदित हो लेती हैं उन्हे समन्दर अपनी लहरों द्वारा बलात् तट पर फेंक देता हैं। यदि सीपियाँ अपनी उपादेयता छोड़ दे तो नियति क्या होगी? वे लहरों पर मौज कर लेगी पर जल्द ही अपना जीवन खो देगी। यह लहरों की निर्ममता नहीं सीपियों की अपनी अदूरदर्शिता और अकर्मण्यता है। लहरें अपना स्वभाव नहीं छोड़ती, वे अपनी नैसर्गिक गर्जन भी नहीं त्यागती। उनकी यात्रा समन्दर के बीच से किनारे की है। जो रास्ते में आवेगा उसे किनारे वे किनारे पर फेंक देंगी। वहाँ टिकना संघर्ष है। उसके नीचे उतरना तप है और समन्दर की तलहटी में पैठ कर साधना में लीन होना समाधि है। जब सीपी समाधिस्थ होगी लहरों के उत्पात वही के वही होंगें। इस उत्पात के रहते सहते उसे अपनी साधना पूर्ण करनी होगी। साधना नहीं तो सिद्धि नही, धैर्य नहीं तो तप नहीं और संघर्ष नहीं तो अस्तित्व नहीं। स्वाँति की बूँद समन्दर की भेंट हो जाती तो खारा पानी बन जाती पर सीपी की साधना उसे अनमोल मोती बना देती है। अस्तित्व और सिद्धि के बीच धैर्य, तप और साधना मिल कर इस क्रिया को सकारात्मक कर्मफल में रूपान्तरित कर देता है। सिद्धों का जीवन ऐसा ही होता है।
कैक्टस की पहचान काँटो से है लेकिन इन काँटों की जमावट में अनोखा सौंदर्य है, बसन्त सिर्फ अमलतास और वन-उपवन पर ही नहीं केक्टस पर भी आती है। कोमल शाखों का पुष्पित और पल्लवित हो जाना सहज सरल है पर कैक्टस का पुष्पित होना निश्चित रूप से शौर्य है। यह विषम परिस्थिति में भी सकारात्मकता का संदेश है। मानव का क्रमिक विकास प्रकृति में उपस्थित अवरोधों पर विजय की कहानी है। विश्व की महानतम विभूतियों के जीवन चरित्रों का अध्ययन करने पर पता चलता है कि जो जितनी विषम परिस्थिति से जूझ कर आया वह उतना महान हुआ। बुद्ध ने तो राजमहल छोड़ कर निर्वासित जीवन चुना। यह भी हो सकता था कि कई अन्य राजाओं की तरह बुद्ध भी राज्यसुख भोग कर अपना जीवन जी सकते थे। बोधिसत्व सरल और कठिन में से कठिन का चुनाव करने पर उपलब्ध हुआ है।
कवि ने विषम परिस्थितिमें सकारात्मक संघर्ष को ही शौर्य कहा है। बुद्ध का तप, गाँधी का विमर्ष, तेनसिंह का आरोहण, लक्ष्मीबाई का संग्राम इसी तरह के शौर्य के साक्षात् बिम्ब हैं। सम्पूर्ण मानव जाति के इतिहास का अक्षर-अक्षर इस शौर्य की विजयगाथा है।
कविता संसार की ऋणात्मकता और अवरोधों को नकारने की बात बिल्कुल नही करती पर इनके रहते हुए भी संघर्ष और कर्म का पाठ पढ़ाती है। साधना का महात्म्य बताती है, धैर्य का आलम्बन लेना सिखाती है। कविता आश्वस्त करती है कि मूल्यहीन बूँद से अनमोल मोती बनाना साध्य है। "चन्द लोग" से तात्पर्य वे लोग हैं जो विषमताओं के होते हुए भी कामयाबी का शिखर चूमते हैं।
शब्द बहुत थोड़े हैं
पर अर्थ बहुत चौड़े हैं।
रामनारायण सोनी
No comments:
Post a Comment