हिन्दी कविता की समीक्षाएं

Friday, 13 March 2020

समीक्षा ३७

समीक्षा ३७

एक कविता एक सरल रेखा सी, श्री रमेशदास वैरागी जी की। उपनाम "उधार"।
संक्षिप्त परिचय:-
नाम                   रमेश दास वैरागी
पिता                 श्री तुलसीदास वैरागी
माता                 गीताबाई वैरागी
जन्म स्थान         ग्राम कल्याणपुरा जिला   
                      . झाबुआ (म.प्र.)
मूल स्थान           ग्राम खवासा,तहसील थांदला
                         जिला झाबुआ(म.प्र.)
शासकीय सेवक    सेवा निवृत्त कनिष्ठ 
                         लेखाअधिकारी
विभाग                 आदिवासी विकास विभाग
उद्देश्य/ध्येय           साहित्य व समाज सेवा

उधार जी की नगद कविता।

'वह मासूम लड़की"

एक नन्ही गुड़िया सी
घर के आंगन में
वह खेल रही थी
बारिश की कुछ बूंदें
झेल रही थी
कल्पनाओं के भँवर में
कुछ सपने, बुन रही थी
कुछ अपने-सपने
चुन रही थी
कुछ गीली,
कुछ सूखी मिट्टी
घूँध रही थीं

बचपन से यौवन तक
वर्तमान से भविष्य के
आकाश में 
कुछ ढूँढ रही थी
गीली-सूखी मिट्टी से
कुछ छोटे-बडे़ बनाए
कुछ बिगड़े, कुछ बने घरौंदे
देख रही थीं
क्या होंगे सपने-अपने पूरे वो?
तौल रही थी
वो बचपन का खेल
खेल-खेल में ही
बस यूँही खेल रही थी
असली जीवन से
बिलकुल अनभिज्ञ
वह क्या जान रही थी?
शायद कुछ पता नहीं...

वह मासूम लड़की
बिना बोले ही कुछ भी
सब कुछ अपनी आँखों से
बोल रही थी

   आर. डी. वैरागी "उधार"
🌹🌷🌹🌷🌹🌷

मेरी नजर में

कविवर रविन्द्रनाथ टैगोर की प्रसिद्ध कहानी काबुलीवाला में एक लड़की है जिसका नाम "मिनी" है। काबुलीवाले का असली नाम रहमत है। काबुलीवाला अफगान से व्यापार करते करते कलकत्ता आ जाता है। चलते चलते उसे एक परिवार की इस मिनी से मुलाकात हो जाती है। कहानी अपनी जगह चलती है पर काबुलीवाले को उस लड़की में अपनी लड़की दिखाई देती है। उसका जुड़ाव इतना प्रगाढ़ हो जाता है कि मिनी उसके जीवन का हिस्सा बन जाती है। यह निर्मल-कोमल रिश्ता एक अलौकिक अनुभूति है। मिनी को वह "लल्ली" कह कर बुलाता है।
इस कविता में भी कवि "उधार" को एक "लल्ली" मिल जाती है जिसे वह एक मासूम लड़की कहता है। अनजाने में उसका रिश्ता कवि से लल्ली की तरह का जुड़ जाता है। इस महीन रिश्ते में वह उस भोली-भाली के मर्म को गहराई से पढ़ता है जैसा वहाँ लिखा वैसे का वैसा ही। "बारिश की कुछ बूँदे झेल रही थी" एक बालसुलभ क्रिया है जो उसको एक आह्लाद का अनुभव कराता है। इस बीच उसे खिलौने बनाने की याद आती है। यह लड़की प्रकृति में बनावटी नहीं प्राकृतिक संसाधनों से ही खेलती है। "घूँधना" शब्द आंचलिक भाषा का शब्द है जो "सानना" का समानार्थी शब्द है। इस शब्द ने लड़की को हमारे ग्रामीण परिवेश का अंग बना दिया है जिससे यह शब्दचित्र हमें ठेठ गाँव में सौंधियाती गीली-सूखी मिट्टी का अनुभव कराता है। कांक्रीट के शुष्क जंगल में गीली मिट्टी कहाँ उपलब्ध है। घूँधी हुई इस मिट्टी से उसे वह बनाना है जिसकी वह विचारणा करती है, संकल्पना करती है। कवि ने इसे आगे "अपने-सपने" कहा है। ये सपने वास्तव में उस लड़की के निजी है। ये सपने नहीं बल्कि वे बीज हैं जो उसने अपने मन की धरती पर बो दिये हैं। कवि टटोलता है कि ये कौनसे बीज हैं जो मासूम लड़की के जीवन में प्रस्फुटित होंगे। सपने जो भी हों पर घरौंदे को बनाने की कशिश और उसके बनने बिगड़ने के उतार चढ़ाव को खुली आँखों से देखना जीवन की सच्चाई से रूबरू होना है। इस लड़कपन में भविष्य को आँक लेना, वह भी अत्यन्त सहजता से, एक विहंगम दृष्टि का परिचायक है। 
वह मासूम लड़की
बिना बोले ही कुछ भी
सब कुछ अपनी आँखों से
बोल रही थी
अन्तिम चार लाइने कविता का क्लाइमेक्स है। उस लड़की का मौन उसकी वैचारिक गम्भीरता का द्योतक है पर सब कुछ आँखों से बोल जाना उसका भावनात्मक कौशल है। असल में यह कौशल कवि का है जो कथन को सादगी से इस चरम बिन्दु तक लाता है। इस मासूम लड़की की सादगीपूर्ण क्रिया कलापों में घट रहे वर्तमान की गोद में पल रहे भविष्य को उकेरता है। लल्ली और इस मासूम लड़की में कितना साम्य है। कविता बेटियों की श्रेष्ठ विचारशीलता और सृजनधर्मिता को रेखांकित करती है। संपूर्ण कविता में गत्यात्मकता है। रचना सोद्देश्य है।

रामनारायण सोनी
१२.०३.२०२०

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