समीक्षा ३४
एक कविता जय वैरागी जी की।
उम्र की बीती कहानी याद फिर आयी कहीं से ।।
रोशनी है तो धुआँ उठ कर रहेगा
आग सुलगी लकड़ियों से क्या कहेगा
सिमट जाना राख बन कर जब बहेगा
वक्त है यह भावना को ही दहेगा।
रोशनी ने अनछुए दस्तूर पाले
कुछ उजालो के अभी भी रूप काले
मकड़ियाँ भी भेद जो पाए न जाले
है क्षणिक पर दीर्घ पाबंदी के ताले।
दीर्घ निःश्वासें अभी विस्तारणा है
हो अनिमेषी वही तो धारणा है
यह अतीति धार पल की वारणा है
ओर सेतु बन्ध पल सब तारणा है।
जो गए पल रीत सुख संताप रीते
काल गति को कौन है जो आज जीते
अश्रु की तुरपाई सपने नित्य सीते
लहर सृष्टि की चली मझधार बीते।
हर कहानी बहता धारा, पाल कैसी
जो बहा फिर पूछना क्या चाल कैसी
ज़िन्दगी फिसलन भरी है ढाल कैसी
नाद के अनुगूंज में फिर ताल कैसी ।।
जिंदगानी धार बन कर लौट फिर आयी वही से ।।
उम्र की बीती कहानी याद फिर आयी कहीं से ।।
जय वैरागी
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मेरी नजर में
"उम्र की बीती कहानी याद फिर आयी कहीं से।"
अतीत की कन्दराओं में उकेरे भित्तिचित्रों में भी कई आख्यान उभरते हैं। जैसे बुन्देले हरबोलो के मुख से झाँसी का इतिहास फूट पड़ता है। इन आख्यानों में छुपे होते हैं कुछ रहस्य। इनमें समाहित हैं जीवन से जुड़े यथार्थ के धरातल, खट्टे-मीठे, कषाय-तिक्त और संगतियों-विसंगतियों के भिन्न भिन्न आस्वादन। इस कहानी में रास्ते हैं, मील के पत्थर हैं, पड़ाव हैं और बहते समय का प्रवाह है। थकन है, अहसास है, भूख है-प्यास है कुछ अँधेरे तो कुछ उजास है। जो बीत गई वह कहानी तो है पर यही इतिहास भी है। उम्र जिन्दगी का पर्याय है। यह जिन्दगी साँप की तरह गुजर गई पर पीछे छूट गई लकीर कहानी है। वक्त भी गुजरता गया घड़ी की सुईयाँ सरकती रही बस चाल ही पता चल सकी माप तो संवत्सरों के हवाले रही। इस माप से जिन्दगी का नाप कैसे हो। जिन्दगी तो कहानी के वजन से ही नपी है।
*"रोशनी है तो धुआँ उठ कर रहेगा*
*आग सुलगी लकड़ियों से क्या कहेगा"*
जहाँ धुआँ है वहाँ आग होगी, जहाँ उजास है वहाँ कहीं पास ही अन्धकार होगा। नैसर्गिक गुण धर्मों से सज्जित ज्वालाएँ ऊर्जा की परम स्रोत है पर लकड़ियाँ अपना उत्सर्ग कर के उन्हें उत्पन्न करती है। उम्र की कहानी भी इसी तरह जीवन की कई विसंगतियों का अद्भुत रसायन है। हम चल रहे है, चल कर यहाँ तक आए हैं ओर चलते चलते अतीत के आइने में झाँक झाँक कर देखते रहते हैं। जीवन मूल्यों का पता धुएँ से नही आग रूपी अर्चियों से पता चलता है।
"रोशनी ने अनछुए दस्तूर पाले
कुछ उजालो के अभी भी रूप काले"
इस उजास में कुछ उजले चेहरे दिखाई देते हैं उन बगुलों की तरह जो उड़ते हुए सफेद दीखते हैं परन्तु झील के किनारे मछली की टोह में बैठे चितकबरे दिखाई पड़ते हैं। उनकी निगाह शिकार पर ही होती है।
"सिमट जाना राख बन कर जब बहेगा
वक्त है यह भावना को ही दहेगा"
एक कहावत है कि "जीवन भर तेल फ़ुलेल लगाया पर अन्त में खुशबू नहीं आई।" इन्सान की अंतिम परिणति एक मुट्ठी राख है उसे भी कोई संभाल कर नही रखेगा। लेकिन समय का घूमता चक्र पली बढ़ी भावनाओं को लील जाएगा। "काल गति को कौन है जो आज जीते"
"ज़िन्दगी फिसलन भरी है ढाल कैसी
"नाद के अनुगूंज में फिर ताल कैसी।"
नाद की अनुगूँज में लय और प्रलय है, सृष्टि का सृजन है विध्वंस से परे क्रम और अनुक्रम है।
जिन्दगी की बहती धारा में ठहराव भी है दोहराव भी है। कल्प भी है प्रकल्प भी है और इन सिद्धान्तों का निरूपण भी सहज रूप से किया है। वस्तुतः "जिंदगानी धार बनकर लौट फिर आयी वही से।"
कविता का सुदृढ़ कलापक्ष गीतात्मक है। माधुर्य और प्रासादिक गुणों से ओत प्रोत है। ऐसे सृजन चलते ही रहने चाहिए।
रामनारायण सोनी
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