हिन्दी कविता की समीक्षाएं

Tuesday, 31 March 2020

समीक्षा ४२

समीक्षा ४२

एक प्रेम कथा बेंच पर

अरे! तुम?
इस तरह? यहाँ?
आज अचानक कैसे?
आओ, आओ बैठें 
जमाने गुजर गए 
कुछ अपनी कहें 
कुछ तुम्हारी सुनें

हाँ कुछ भी नहीं बदला है 
तुम्हारे जाने के बाद 
सब कुछ वैसा ही है यहाँ 
मेरे आस-पास 
वैसे तो बहुत कुछ 
हुआ है यहाँ
हुआ तो होगा 
वहाँ भी 

आओ... चाहो तो 
हल्का कर लें बोझ
अब तक के अनकहे का 
अब तक के सहे का 
हाँ ठीक वैसा ही हूँ
पहले की तरह 
रोज आता हूँ
यहां 
इस बेंच पर 
......
हाँ अकेला ही तो 

और क्या सुनाऊँ?
कहने को कुछ नया नहीं है 
बरस पर बरस बीते हैं 
अब तो गीत सुरों से रीते हैं 
रातें हारी दिन जीते हैं 
बस 
इसी तरह जीते हैं 
हाँ तुम भी तो 
अपनी कुछ कहो 
बताओ कब तक यहाँ हो?
..........
..........
अरे नहीं तो?
..........
..........
क्यों क्या हुआ ऐसा ?
...........
...........
चलो जाने भी दो सब 
हमारी तब और अब को 
अब मिल जाने दो 
तुम्हारे कल को हारने 
और आज को जीत जाने दो

अरविन्द व्यास

शब्दवट 
पृष्ठ ३४
सेवानिवृत्त प्राचार्य
🌷🌹🌷🌹🌷🌹

मेरी नजर में

प्रेम कथा बेंच पर
कविता में कोई कथा है, यह कथा प्रेम(?) कथा है। कथा बेंच पर बैठ कर सुनाई जा रही है।
यह चार प्रश्नों से प्रारंभ होती है-अरे! तुम?,
इस तरह?, यहाँ?, आज अचानक कैसे?
"तुम" किसे सम्बोधित है यह आगे पता चलेगा। "यहाँ" से लगता है परिदृष्य में कोई बगीचा है उसमें कहीं एक बेंच है और प्रेम कथा इसी रंगमंच पर कही जा रही है। प्रेम कथा प्रेम की कथा है या नहीं यह तो अन्त में ही पता चल पाएगा पर यह साफ-साफ समझ में जाता है कि-
आओ, आओ बैठें
जमाने गुजर गए
कुछ अपनी कहें
कुछ तुम्हारी सुनें

कहानी जो कुछ भी हो वह अपनी जगह है पर वह कहानी अभिव्यक्ति चाहती है। उसमें पैदा हुई घुटन से ऐसा लगता है जैसे जमीन पर बारूदी सुरंगें बिछी जिसमें अचानक किसी दबाव के विस्फ़ोट हो जावेगा। "जमाने गुजर गए, कुछ अपनी कहें, कुछ तुम्हारी सुनें।" गुजरे जमाने का तात्पर्य उस गुजरे जीवन से है जो व्यस्त रहा, क्रियात्मकता से भरा रहा और जहाँ आस-पास रिश्ते ही रिश्ते थे परन्तु सबसे खास बात यह थी कि वे रिश्ते कुछ कहते भी थे और सुनते भी थे। 
पर आज के बदले परिवेश में अनकहे भाव, अनकहे जजबात ही वे बारूदी सुरंगें है जो कहीं सुनाए नहीं गए तो विप्लव खड़ा करेंगे। परन्तु आज इस तथा-कथा को सुनेगा कौन? सुनने वाले के पास समय नहीं है, समय है तो उसे पसन्द नहीं है। कभी गाँव में बड़े बूढ़े कहावत कहा करते थे कि तेरा दुखड़ा कोई नही सुने तो जंगल जाया कर और खेजड़ी को सुना आया कर। खेजड़ी एक ऐसा छोटा वृक्ष होता है जो लगभग आदमी के कद का होता है। उसे अपनी सुनाने वाले का जी हल्का हो जाता था। पर अब ये सब वृक्ष कट गए हैं। गाँव में एक चौपाल संस्कृति हुआ करती थी जहाँ कोई कुछ कहता था और बाकी सब उसकी सुनते थे। बाद में ये चौपाल पेड़ों की छाँव वाले ओटलों (चबूतरों) में बदल गए जो कुछ हद तक चौपालों का प्रतिनिधित्व करते रहे। ये वे सामुदायिक स्थल थे जहाँ कवि की ये पंक्तियाँ "कुछ अपनी कहें, कुछ तुम्हारी सुनें" चरितार्थ होती थी। इन जगहों पर कहने वाले भी थे और सुनने वाले भी थे। यों तो हर पुरानी पीढी नई नस्लों से शिकायतें करती चली आयी है कि भई जमाना कितना बदल गया है, वगैरह-वगैरह। परन्तु जो परिदृष्य पिछली आधी सदी में बदला है उसने जीवनशैली, सोच और आदमी की आचारसंहिता में आमूल चूल परिवर्तन कर दिया है। लोगों के पास आपस मे कहने सुनने का वक्त नहीं रह गया है। कविता में चल रही कथा के नेपथ्य में इन्हीं वृत्तियों की अनुगूँज स्पष्ट सुनाई पड़ रही है। चौपाल, ओटले जैसे सामुदायिक स्थल या जंगल की खेजड़ी की जगह पार्क में एक कोने में पड़ी इस बेंच ने ले ली है। हमारा नायक यहाँ रोज आता है। आज उसने कहने सुनने का अपना ढंग खोज लिया है।
"बताओ कब तक यहाँ हो?
..........
.........."
इसमें "बताओ कब तक यहाँ हो? एक एरियल गन से दागा गया पश्न है परन्तु यह प्रश्न नहीं है बस सुरंग का खाली होना है जो आगे दो पंक्तियाँ  के ........ अर्थात् इस अनलिखे शून्य से स्पष्ट है। यही कविता के प्रारंभिक चार प्रश्नों का तात्पर्य भी है।
और यह संवाद भी विचित्र संवाद है:-
"अरे नहीं तो?
..........
..........
क्यों क्या हुआ ऐसा ?
...........
..........."
कविता का अत्यन्त मार्मिक हृदयस्थल है जो पाठक को आंदोलित करता है। यहाँ खाली छोड़ी गई पंक्तियाँ सबसे ज्यादा बोल रही हैं। इस प्रेमकथा की ये पंक्तियाँ केवल नायक सुन रहा है उस सहनायक की आवाज जो अपनी कल्पना-शीलता से नायक ने गढ़ लिया है और बड़े स्नेह से इस बेंच पर बैठाल लिया है कुछ अनकहे वाकियात कहने को। कविता पहले ही कह चुकी है कि जो यहाँ मेरे साथ घटा है वह तुम्हारे साथ भी वहाँ वैसा हुआ होगा यानी तुम्हारा जीवन भी ऐसा ही चला होगा और तुम्हें भी कोई सुनने वाला नहीं मिला होगा।
नायक विक्रम बना इस अपने भीतर पैदा हुए इस शून्य के वैताल को कब तक पीठ पर लाद कर चलेगा? कविता में पूछे गये प्रश्न यक्ष प्रश्न से बहुत छोटे हैं और उस बगीचे की फिजाएँ युधिष्ठिर की तरह नही है जो कोई जवाब दे पायेगी।
आज समाज में संवादहीनता बढ़ती जा रही है। कविता प्रश्न नहीं एक खालीपन को उघाड़ती है। खालीपन आदमी से आदमी के बीच का, खालीपन पीढ़ियों के बीच का, खालीपन रिश्तों के बीच का, खालीपन परस्पर साहचर्य का। कविता चिन्ता नहीं चिन्तन प्रस्तुत कर रही है। इस रचना के सृजन के समय यही कवि की अन्तर्वृत्ति रही होगी। कविता स्वयं एक संवाद है जो पाठक को सरसता प्रदान करता है, तसल्ली देता है। यहाँ कहीं भी व्यथा, आक्रोश और पीड़ा का प्रदर्शन नहीं है इसलिये यह कथा प्रेम कथा ही है।

रामनारायण सोनी
३१/०३/२०२०


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