हिन्दी कविता की समीक्षाएं

Monday, 17 February 2020

समीक्षा ३०

समीक्षा २७

एक कविता, रोटरी काव्यमंच द्वारा प्रकाशित "काव्य सुरभि" संपादक कृष्णलाल जी गुप्ता के साझा काव्य संकलन के पृष्ठ क्रमांक 94 से उद्धृत है। 

रचनाकार: मनीष त्रिवेदी जी। शिक्षा: एम.एस.सी. (गणित)। शौक: काव्य लेखन, सामाजिक सेवा आदि में रत। संप्रति: वर्तमान में भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक सी.ए.जी. में अधिकारी।

सच क्या है 
तुम्हारा सच तो सच है,  मेरा सच भी सच है
फिर दुनिया का सच... वो भी तो सच है। 
परंतु सच तो एकनिष्ठ, शाश्वत, अनन्य है, 
सच न तो कटु होता है ना ही दिशाहीन। 
सच अंधकार में भी प्रदीप्त मान है, 
सच तो सूर्य के समान है,
जो स्थिर, स्थाई, अडिग, अचल, अटल है, 
सूर्य कभी अपने स्थान, स्थिति को परिवर्तित नहीं करता, 
विद्यमान है ब्रह्मांड में सदियों से।
हम पृथ्वी पर खड़े निहारते हैं उसे,
सामना करने का प्रयास करते हैं, 
उसे परिभाषित करते हैं अपनी दृष्टि से।
कहीं यह सूर्योदय है, कहीं सुदूर से सूर्यास्त
जबकि सबसे बड़ा सच तो यह है 
कि सूर्य का उदय कभी होता ही नहीं, 
और सूर्य कदापि अस्त होता नहीं 
इस ब्रह्मांड का सच यही है, 
जिसका कोई प्रतिबिंब नहीं, कोई परछाई नहीं,
सच सिर्फ सच है उसे स्वीकार करो। 
तुम्हारा सच तो सच है, 
मेरा सच भी सच है 
फिर दुनिया का सच... वो भी तो सच है।
🌹🌷🌹🌷🌹🌷🌹🌷

मेरी नजर में

कवि का व्यक्तित्व निराला है। उनकी शिक्षा स्नातकोत्तर साइन्स (गणित) विषय में, सेवा अंकेक्षण (ऑडिट) विषय में और यह काव्य सृजन हिन्दी साहित्य में है। पतित पावनी गंगा का एक नाम है "त्रिपथगा"। गंगा तीन विभिन्न रास्तों से चल कर एक स्थल पर आकर मिलती है जहाँ से आगे वह गंगा कहलाती है। इसी तरह के सृजक हैं। यह सृजन तीनों विषयों के समन्वित ज्ञान का सुन्दर, ज्ञान-विज्ञान और अध्यात्म से परिपूर्ण सम्मिश्रण है। इसमें दर्शन शास्त्र के सत्य का उल्लेख है, विज्ञान के ब्रह्माण्डीय विज्ञान का विवेचन है और कविता अंकेक्षण अथात् सच का ऑडिट कर के उसमें से ब्रह्म स्वरूप "सत्य" के ऑडिट पेरा तक ले जाती है। बहुधा ऑडिटर कुछ प्रश्न ले कर निरीक्षण-परीक्षण करता है जो दधिमन्थन के जैसा होता है। सब जानते हैं कि परिणाम केवल "माखन" जैसा संक्षिप्त सा होता है। यहाँ वह परिणाम "सत्य" है।
विज्ञान में एक फेनोमेना होता है इल्यूजन। यह इल्यूजन जादूगर के इन्द्रजाल के जैसा होता है। यह सिद्ध कर देता है कि हर आँखों देखा हुआ सच वास्तव में सच नही होता है। एक और सिद्धान्त है जिसे सापेक्षता का सिद्धान्त कहते है। जैसे वाराणसी तो धरती पर अपनी जगह फिक्स है पर दिल्ली का आदमी उसे पूर्व दिशा में स्थित कहेगा और बंगाल वाला पश्चिम दिशा में स्थित बतायगा। इस सापेक्षता के इल्यूजन से बाहर आना है तो वाराणसी के अक्षांश-देशान्तर फिक्स करना होगे। दोनों फेनोमेना को मिलाकर कवि ने "सच" को एक प्रयोगशाला में रख दिया ताकि सत्य तक पहुँचा जा सके। दिल्ली और बंगाल के दोनों आदमी अपना अपना सच बयान कर रहे हैं परन्तु वह तो सच नहीं वरन् "यथार्थ" है। जैसा दिखे वैसा का वैसा बताना "यथार्थ" है परन्तु यथार्थ के माथे पर खड़ा हो कर सच को पहचानना आवश्यकीय और संभव भी है अन्यथा एक अजीब सा भटकाव और व्यर्थ का वितण्डावाद तैयार हो जाना तय है और फिर अनर्गल वाद-विवादों को जन्म देना है।

"सच क्या है ?"

यह प्रश्न है या शीर्षक लेकिन शायद यह दोनो ही है। यह पहले तो शीर्षक है जो कविता में सत्य के दर्शन तक ले जावेगी और दूसरा यह प्रश्न है जो स्वयं से है और उत्तर की खोज कविता के माध्यम से हो रही है। दोनों प्रशंसनीय है। देखें पंक्तियाँ...
"तुम्हारा सच तो सच है,  मेरा सच भी सच है
फिर दुनिया का सच... वो भी तो सच है।"

संदर्भित कविता में सच के भाव दो प्रकार से लिये गये हैं। पहला झूठ का विलोम "सच" और दूसरा वह "सत्य" जो ईश्वर है। लेकिन कवि ने बड़े सहज रूप में प्रथम भाव को दूसरे पुनीत भाव तक पहुँचाया है।
सत्य को जानना कठिन है। सत्य का लौकिक अर्थ : ईश्वर ही सत्य है, सत्य बोलना भी सत्य है, सत्य बातों का समर्थन करना भी सत्य है। सत्य समझना, सुनना और सत्य आचरण करना कठिन जरूर है लेकिन अभ्यास से यह सरल हो जाता है। जो भी दिखाई दे रहा है वह सत्य नहीं है, लेकिन उसे समझना सत्य है अर्थात जो-जो असत्य है उसे जान लेना ही सत्य है। असत्य को जानकर ही व्यक्ति सत्य की सच्ची राह पर आ जाता है। 
परंतु सच तो एकनिष्ठ, शाश्वत, अनन्य है, 
यहाँ से कविता उस भ्रमजाल और इन्द्रजाल से बाहर निकल कर सद्यस्नाता हो जाती है। वह विशुद्ध अध्यात्म और दर्शन के शाश्वत सिद्धान्तों का व्यावहारिक स्वरूप का चित्रण करती है। जो लोग "कटु सत्य" जैसे शब्दों का उपयोग करते हैं उन्हें कविता सावधान करती है कि सत्य कभी कटु हो नही सकता, वह दिशाहीन भी नहीं हो सकता क्योंकि वह (ईश्वर) सार्वदेशीय, सर्वव्यापक, परिपूर्ण ब्रह्म है। अज्ञान रूपी अंधकार में ज्ञान स्वरूप प्रकाश है।  
सच न तो कटु होता है ना ही दिशाहीन। 
आगे कविता कहती है....
"सच अंधकार में भी प्रदीप्त मान है, 
सच तो सूर्य के समान है,
जो स्थिर, स्थाई, अडिग, अचल, अटल है, 
सूर्य कभी अपने स्थान, स्थिति को परिवर्तित नहीं करता, 
विद्यमान है ब्रह्मांड में सदियों से।
हम पृथ्वी पर खड़े निहारते हैं उसे,
सामना करने का प्रयास करते हैं, 
उसे परिभाषित करते हैं अपनी दृष्टि से।
कहीं यह सूर्योदय है, कहीं सुदूर से सूर्यास्त
जबकि सबसे बड़ा सच तो यह है 
कि सूर्य का उदय कभी होता ही नहीं,"
ईश्वर सत्य है, नित्य है। सत्य ही ईश्वर है।
सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म।। तैत्तिरीय उपनिषद्, ब्रह्मानन्द वल्ली १/१।। ब्रह्म सत्य ज्ञान अनन्त स्वरूप है।
सत्य सृष्टि के सृजन के पूर्व भी था, वह वर्तमान भी है और सृष्टि के लय के पश्चात् भी रहेगा। हमें यह भ्रम होता है कि सूर्य डूबता-उगता है परन्तु हम इसे सापेक्ष भाव में देखते है। सूर्य इसलिये चलता हुआ दिखने वाला है पर वह अपने ब्रह्माण्ड के केन्द्र में स्थिर रूप से स्थित है। 
यह समस्त व्यष्टि और समष्टि अव्यक्त से व्यक्त और फिर व्यक्त से अव्यक्त हो जाती है। सब मौलिक है। गीता--
अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत।
अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना।।2.28।।

कविता आगे यही प्रतिपादित करती है।
"और सूर्य कदापि अस्त होता नहीं 
इस ब्रह्मांड का सच यही है, 
जिसका कोई प्रतिबिंब नहीं, कोई परछाई नहीं,
सच सिर्फ सच है उसे स्वीकार करो।"

"तुम्हारा सच तो सच है, मेरा सच भी सच है 
फिर दुनिया का सच... वो भी तो सच है।"
अन्त में बताये गये सारे सच जो आभासी है वे सत्य नहीं है। उपनिषदों के अनुसार न जाग्रत सत्य है न स्वप्न सत्य है। जो सच दिखाई दे रहा है वह मिथ्या अर्थात् अनित्य है। नित्य तो केवल वह "सत्य" ही है।
वस्तुतः कविता लौकिक व्यवहार के "सच" के विक्षेप और भ्रम के कोहरे से बाहर ला कर उस परम सत्ता की सहज अनुभूति कराती है। जब कविता गढ़ी गई होगी तो मूल भारतीय दार्शनिक मूल्यों का जाने अनजाने में अथवा प्रारब्ध में रचे बसे तत्वो का समावेश हो गया होगा। कविता सच के लौकिक व्यावहारिक स्वरूप से चल कर सत्य स्वरूप तक सहज रूप से पहुँचाने मे सफल हुई है। 
ऐसा मैं सोचता हूँ।

रामनारायण सोनी


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