समीक्षा २८
श्रृंगार रस की एक छोटी सी बड़ी कविता ; एक लब्धप्रतिष्ठित मूर्धन्य, बहुमुखी साहित्यकार "वेद हिमांशु" की।
शिक्षा : एम ए (हिंदी साहित्य)
प्रकाशित कृतियां ; स्याह हाशिए, नवीन धारा, फैक्ट्स के विरुद्ध।
सम्मान : भारत गौरव, साहित्य मनीषी, आचार्य-रत्न आदि।
विशेष : अमेरिका से परिचय ग्रंथ "हूँ इज हूँ" में विश्व की प्रमुख 268 विशिष्ट विभूतियों में शामिल।
अभिरुचि : कविता लेखन, लघुकथा, कहानी, व्यंग्य, समीक्षा रिपोर्ताज।
प्रसारण : बीबीसी लंदन, दूरदर्शन, आकाशवाणी आदि से।
प्रकाशन : धर्मयुग, हिंदुस्तान, कादंबिनी, वीणा, धर्मयुद्ध में।
शिखर वार्ता : साहित्य गुंजन आदि
"फूल छूना मना है"
कभी-कभी
कोई चिर परिचित चेहरा
बहुत अजनबी लगता
जैसे पहली बार देखा हो
निहायत भोला और मासूम
मन करता है कि हथेलियों में
लेकर,
नेह से सहला दें,
और चन्द मधुर स्मृतियाँ
अंकित कर दें,
पलकों की चंचल तितलियों पर
किन्तु वर्जनाओं की मौजूदगी
वहां तक है
जहां हवा भी नहीं जा सकती
भला कहो तो-
ऐसा कहां लिखा है कि
फूल छूना मना है।
वेद हिमांशु
🌹🌷🌹🌷🌹🌷
मेरी नजर में
कोई कहे कि टोपी पहन का "बुर्ज खलीफ़ा" का वर्णन करो तो टोपी गिरना तय है। सारा साहस बटोर कर यह साहस कर रहा हूँ।
संस्कृत में कहा गया है कि "रसात्मकम् वाक्यम् काव्यम्" अर्थात् रसयुक्त वाक्य ही काव्य है।
रस अन्त:करण की वह शक्ति है, जिसके कारण इन्द्रियाँ अपना कार्य करती हैं, मन कल्पना करता है, सपनों की स्मृति रहती है रस आनंद रूप है और यही आनंद विराट का अनुभव भी है। यही आनन्द अन्य सभी अनुभवों का अतिक्रमण भी है।
श्रृंगार रस का स्थायी भाव है रति अथवा प्रीति है। इसके अभाव में जीवन की कल्पना व्यर्थ है।
श्रृंगार रस को रसराज या रसपति कहा गया है। नायक और नायिका के मन में संस्कार रूप में स्थित रति या प्रेम जब रस की अवस्था को पहुँचकर आस्वादन के योग्य हो जाता है तो वह 'श्रृंगार रस' कहलाता है। यह परिभाषा हिन्दी साहित्य के व्याकरण में थ्योरी की तरह लिखी है पर इस छोटी सी कविता में प्रेक्टीकल के रूप में लिखी है। यह प्रेक्टीकल साक्षात् जीवन की प्रयोगशाला का है। चौंकियो मत। यहाँ संपूर्ण कविता "वर्जनाओं की मौजूदगी" में अपनी परिधियों में चलती है और वहाँ पहुचती है जहाँ खुले आकाश और स्वच्छन्दताओं में भी शायद नहीं पहुँच पाते। वर्जनाएँ ऐसी है कि वे प्रदर्शन पर तो प्रतिबन्ध लगाती है पर आनन्द और आह्लाद के विस्तीर्ण प्राङ्गण में अनुभूति के शिखर तक ले जाती है। इन वर्जनाओं के चलते मुझे समीक्षा में भी प्रतिबन्धों का परिपालन करना है वस्तुतः संकेतों और रूपकों का ही आश्रय लेना होगा।
किसी जमाने में साहिर लुधियानवी का एक गीत बड़ा प्रसिद्ध हुआ था:
"चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएँ हम दोनों।"
"न मेरे दिल की धड़कन लड़खड़ाये
मेरी बातों में
न ज़ाहिर हो तुम्हारी
कश्मकश का राज़ नज़रों से"
यहाँ भी वही वर्जनाएँ आ कर खड़ी हो गई। प्रदर्शन नहीं अनुभूति की ऊँचाइयाँ मौजूद हैं। परन्तु कवि और शायर इतने चतुर होते हैं कि वे "नहीं" के माध्यम से "वही" कह देते हैं जो कहना चाहते है। डोली में बैठी दुल्हन के चारों तरफ पर्दे होते हैं पर शायर दुल्हन का श्रृंगार और "भावसंसार" ज्यों का त्यों वर्णन कर देता है। वास्तव में स्वप्नों के धरातल वास्तविकता से भी अधिक विलक्षण और अद्भुत होते है। वेद हिमांशु जी ने भी इस कृति में यह प्रयोग बड़ी चतुराई से किया है। उनका यह कमाल ही उनका कलाम है। कविता का नायक चिर परिचित चेहरे को नित नवल ही रखना चाहता है क्योंकि शायद वह उस प्रथम दर्शन की उन अलौकिक अनुभूतियों को विस्मृत नहीं करना चाहता। "नेह" शब्द संस्कृत के स्नेह का तद्भव है जो मृदुलता का आभास देता है इसीलिये प्रेम का स्नेह पर्याय है। नायक इन्ही संकेतों में नायिका की मृदुलता से स्पर्श कर गया और वर्जनाओं का परिपालन हो गया। कविता का शीर्षक है "फूल छूना मना है। बचपन में कहीं गाँधी जी का कोटेशन पढ़ा था - सुन्दरता निहारते हैं, छूते नहीं। शायद नायक ने इस थ्योरी को पढ़ लिया होगा लेकिन यह कथ्य उस व्यावहारिक कथन तक निभ नहीं पाया और नायक बड़ी सहजता में प्रश्न करता है - "ऐसा कहाँ लिखा है कि फूल छूना मना है।" वह जानता है कि इस प्रश्न का उत्तर उसके हक में है। कवि वर्जना की परिधी तो तय करता है पर वहाँ पहुँच जाता है जहाँ हवा भी नहीं पहुँचती।
बहुत सरल है उपदेश लिखना पर सबसे कठिन है श्रृंगार लिखना। प्रेम अर्थात् प्रीति श्रृंगार का स्थाई भाव है। प्रेम गूँगे का गुड़ है। मीठा होना तो समझा दोगे पर मीठा कैसा होता है नही समझा सकोगे। फिर ऐसे श्रृंगार की प्रस्तुतियाँ स्तुत्य है जिसे हर उम्र के लोग वर्जनाओं की सीमाओं में रह कर पढ़ और समझ सके और अनुभूतियों के सागर में डूब सके। प्रेम के बिना मनुष्य का हृदय मरूस्थल है और जीवन जड़वत् है। प्रेम धरती पर जीव के पहले आया है। प्रेम का न कोई धर्म है न प्रणति। कोई इसे स्वीकारे या नकारे प्रेम के स्वरूपों में एक पावन स्वरूप वह है जो इस सृष्टि के क्रम को कायम करता है। प्रेम प्रकृति का अक्षुण्ण और शाश्वत विनियमन है। सहज आकर्षण इसका मूल स्वभाव है। शायद इसलिये भी वर्जनाएँ अत्यन्त अनिवार्य है। इस एक शब्द ने इस कविता को अग्रिम पंक्ति में खड़ा कर दिया है। मैं तो बच्चोँ से भी यही कहूँगा कि हिन्दी व्याकरण के अध्ययन में श्रृंगार के लिये इस प्रकार की कविताओं को उदाहरण के रूप में प्रयोग करें।
रामनारायण सोनी
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