हिन्दी कविता की समीक्षाएं

Monday, 24 February 2020

समीक्षा ३३

समीक्षा २९
एक कविता डॉ सीमा शाहजी की। वे मेघनगर महाविद्यालय में हिन्दी की प्राध्यापक हैं। राष्द्रीय स्तर की लेखिका, कवियित्री हैं।

"माँ तुम क्यों नही बोली"

निर्ममता से जीवन
खत्म करने के कंस भाव
मेरी गर्दन के आसपास डोले
चीखी-डरी-सहमी
नाल के इर्द गिर्द लिपट गई
सिसक सिसक कर टूट गया
नन्हा मासुम प्राणो का स्पंदन
ना दरकी माॅ तुम्हारी छाती

आॅखो से नही अश्रुदल बोले
रंगा खुन से हाथ देख
नही किया तुमने कोई क्र्रंदन
मै तुम्हारी ही छाया थी
खुद ने ही खुद को छला
अपनी ही अंश कृति को
फाँसी पर चढा
तुम्हारा मन
बचाने को क्यो नही डोला
माॅ !
तुम क्यो नही बोली
क्या तुमने भी ओढ लिया
एक अदद बेटे की चाह का चोला
डॉ सीमा शाहजी
🌹🌹🌹🌹🌷🌷🌷

मेरी नजर में

नारी की विविधता को दो रूपों मे देखा जा सकता है 
१, भावनामयी, स्नेह-ममतायुक्त समर्पणमयी नारी यह नारी का आदिम स्वरूप है। यह गुण समस्त जीवधारियों में जन्मदात्री माँ के रूप में देखी जा सकती है।
२. बुद्धि-प्रधान तर्कमयी विचारशीला नारी कामायनी की श्रद्धा और इड़ा इन रूपों का प्रतिनिधित्व करती हैं। यह स्वरूप नारी का अर्पित और तापसमय स्वरूप है।
इन दोनो के समन्वय से ही जीवन को पूर्णता की उपलब्धि होती है। 'नारी तुम केवल श्रद्धा हो' कह कर प्रसाद ने उसे श्रद्धा अर्पित की है। 
कहते हैं- "यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।" लेकिन तन के अतिक्रमण से परे जा कर द्युतिमान मनोमय जीवन की संकल्पना ही नारी को सुरक्षा और सम्मान दिला सकती है। 
कविता एक प्रश्न से प्रारम्भ होती है। "माँ तुम क्यों नही बोली?" यह प्रश्न उस अजन्मी बालिका का है जो अभी गर्भनाल से जीवन का रस पी रही है। कविता की भावभूमि पर जाना है तो विचार करना होगा कि यह वह क्षण है जब यह ब्रह्ममय जीव एक असहाय निरीह, निराशी होते हुए मृत्यु के वीभत्स द्वार पर खड़ा है। मेरी नजर में यह प्रश्न केवल माँ से नहीं वरन् पिता और सम्पूर्ण मानवता से किया जाना चाहिये। पिता तुम क्यों बोले/नहीं बोले? समाज का कोई भी व्यक्ति क्यों नहीं बोला?
माँ के भीतर स्वयं एक द्वन्द्व युद्ध चल रहा है। अपने मातृत्व और बेटियों के संसार में वर्तमान स्थिति देख कर। बेटी जन्म लेगी तो क्या क्या समस्याएँ पैदा हो जाएँगी। 
देश भर में सबसे ज्यादा महिला उत्पीड़न, यौन- शोषण, दहेज प्रताड़ना, जैसी कई घटानाओं से समाचार पत्र अटे पड़े हैं। कानून की कमजोरियों और लगने वाली देरी से लड़की के अभिभावक भयभीत हैं। हमारे राष्ट्रपति ने इस बात पर अफसोस जताया था कि लड़कियाें को लडक़ाें के समान महत्व नहीं मिलता। लडक़ा-लडक़ी में भेदभाव हमारे जीवनमूल्याें में आई खामियाें को दर्शाता है। 
राष्ट्रकवि मैथिलीशरणजी की पंक्तियाँ गौतम बुद्ध पर सही बैठती हैं जो समाज के दोहरे मानदंडों की ओर भी इंगित करती हैं - 
'नर-कृत शास्त्रों के सब बंधन हैं नारी को ले कर।
अपने लिये सभी सुविधाएं पहले ही से कर बैठे नर।
और..
'दो-दो कौर अन्न पा लेंगी और धोतियाँ चार।
नारी तेरा मूल्य यही तो रखता है संसार।।
उसकी निरीह अवस्था का मार्मिक चित्रण गुप्त जी के काव्य में हुआ है। 
उपनिषद् कहता है प्राणी का प्रथम अवतरण आदमी के गर्भजल में होता है और वह पोषण के लिये स्त्री में स्थानन्तरित होता है। इसलिये पिता के आह्वान के बगैर यह संभव नहीं है। इसलिये बालिका का प्रश्न पिता को भी जाना चाहिये। 
क्या तुमने भी ओढ लिया
एक अदद बेटे की चाह का चोला ?
मातृत्व इतना हेय कभी हो नहीं सकता कि वह सन्तति का स्वयं गला घोंट दे। जहाँ कविता पूर्ण होती है वहाँ फिर एक प्रश्न है कि क्या माँ की इच्छा भी यही है कि उसे बेटी नहीं बेटा चाहिये। दबी जुबान प्रथम प्रश्न का यही उत्तर है। लेकिन एक "भी" शब्द आने से यह उत्तर स्पष्ट करता है कि माँ नहीं चाहती कि बेटी उसे अस्वीकार है। तात्पर्य यह कि या तो पिता, या परिवार अथवा समाज में दबाव पूर्ण बनी स्थिति इस गर्भस्थ बालिका का निर्मम अन्त कर देना चाहती है। कंस और रावण को पौराणिककाल से चरमश्रेणी के आततायी समझे जाते हैं। कंस तो बच्चे को जन्मने के बाद मारता था पर भ्रूण हत्या तो ब्रह्म-हत्या की श्रेणी में हो कर साधारण हत्या से भी जघन्य है। इस अपराध का जिम्मेदार किसे माना जाय? क्या केवल माँ? क्या पिता भी? या सम्पूर्ण विकासशील/पतनोन्मुखी मानव जाति? 
कविता ने ये प्रश्न केवल माँ के लिये नहीं छोड़े हैं बल्कि उन सभी से हैं जो बेटी नहीं बेटा चाहते हों चाहे वह पिता हो, परिवार हो, स्वयं मातृशक्ति हो या पारम्परिक रूढ़ीगत सामाजिक ढाँचा हो। एक विभषिका और मुह बाए खड़ी है कि गिरते स्त्री-पुरुष अनुपात प्रकृति से सीधी छेड़छाड़ है जो अराजकता फैला देगी। 

रामनारायण सोनी
२३.०२.२०२०

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