हिन्दी कविता की समीक्षाएं

Saturday, 15 February 2020

समीक्षा २९

समीक्षा २६

एक कविता शब्दवट से ली गई है जो सितारे की तरह पृष्ठ क्र. ५९ पर टँकी है। कवि का परिचय उपलब्ध न होने से कविता को उनका परिचय अंकित किया जावे।

मैं क्या हूँ?

कौंधता है 
जो बार-बार 
मेरे भीतर एक सवाल 
कि मैं क्या हूँ 
ईश्वर की मात्र एक कृति हूँ 
बहन हूँ, बेटी हूँ, प्रेयसी हूँ, पत्नी हूँ 
नहीं... नहीं... इतना ही नहीं 
मैं कुछ और भी हूँ। 
मैं हूँ उषा की लालिमा 
जो जगाती है धरा को हौले से 
मैं जल पर तैरती हुई 
पंकज की कली हूँ 
जो पाकर भास्कर का 
सुर्ख सुनहरा स्पर्श 
खोलती है पट घूँघट का 
और बढ़ा देती है 
अर्घ्य सूरज को। 
मैं नीर की उर्मियों को 
लहराती नचाती 
शीतल पवन हूँ 
जिसे भरकर पंख में अपने 
निकल पड़ता है पाखी 
नापने गगन की थाह। 
मैं क्या हूँ...? 
मैं मंदिर की गूँजती 
घंटी का नाद हूँ...
मैं मस्जिद की अर्जों का 
पहला और अंतिम स्वर हूँ।
मैं नन्ही सी ओस की बूँद हूँ जो झिलमिलाती है 
धरती के कण-कण में 
मैं क्या हूँ...? 
मैं ही सूर्य की पहली किरण हूँ 
जिसे समेट कर/ जाग उठता है 
उजियारा मन का 
मैं उपवन में इठलाती बलखाती 
गंध पराग समेटती
तितलियों की उड़ान हूँ 
मैं निशा के आंचल से 
झाँकती तरीका हूँ 
मैं धरती पर बिछी 
स्नेह की रस धार हूँ 
मैं आँगन में महकती 
कुलाचें भरती रुन-झुन दौड़ती 
किलकती 
एक नन्ही सी परी हूँ 
यह सर्वोत्कृष्ट कृति है 
ईश्वर की इस धरा पर 
जी हाँ/ "बच्ची"। और/
यह बच्ची मौजूद है/ मुझमें 
इसलिए तो मैं, "मैं" हूँ 
वरना मात्र एक देह हूँ

श्रीमति आयशा सैयद कुरैशी
झाबुआ

🌹🌷🌹🌷🌹🌷

मेरी नजर में...

"जथा सुअंजन अंजि दृग साधक सिद्ध सुजान।
कौतुक देखत सैल बन भूतल भूरि निधान॥"

भावार्थ:- जिस प्रकार आश्चर्यचकित तरीके से मनुष्य पर्वतों, बनों और पृथ्वी के अंदर छिपे रत्नों को पाकर समृद्धि को प्राप्त हो जाता है, उसी प्रकार उन मणियों के प्रकाश रुपी सुरमा को अपने दिव्य नेत्रों में लगाकर साधक परम-सिद्धि को प्राप्त कर जाता हैं।

साहित्यकार में एक विशेष गुण या कहिये अवगुण होता है, वह पहले अपने भीतर कौतुक करके आड़े तिरछे प्रश्न अथवा समस्याएँ खड़ी करता है, उलझनें पैदा करता है, तर्क वितर्क करता है लेकिन ये कौतुक उसके अपने क्षेत्र विशेष के होते हैं। कई बार तो वह कराहते दर्द को अपने भीतर आहूत करता है और उसकी अनुभूतिजन्य परिणामों से सृजन के आयाम खड़े करता है। यह ठीक उस तरह का छ्द्म प्रपञ्च होता है जैसे पुलिस डिपार्टमेन्ट मॉकड्रिल करता है। यह रिहर्सल नहीं प्रिहर्सल है। सेना भी इसी तरह का छद्म युद्धाभ्यास करती है। इसलिये जो जितनी महारत से अभिकल्पनाएँ करता है वह उतना श्रेष्ठ साहित्य सृजन करता है। लेकिन कल्पित घटनाएँ और परिदृष्य वास्तविकता और संभावनाओं के सन्निकट हों। भिखारी की आत्मकथा लिखता है तो अपने भीतर कौतुक से एक भिखारी को हू-ब-हू जीता है। रावण का चरित्र लिखते समय क्रूरता की छद्म आकृतियाँ उसके भीतर उत्पात मचाती है। एक अच्छे लेखक और रंगकर्मी का यह प्रथम गुण है। यदि आप इस तरह के कौतुक नहीं कर सकते तो अपनी कलम छुपा कर कहीं रख दीजिये। 
अब ये उठाये गये प्रश्न और समस्याएँ उनके उचित उत्तर अथवा हल सुझाए बगैर पाठकों/दर्शकों में फेंक दी तो यह फ्लॉप शो होगा। जितने अच्छे प्रश्नोत्तर होंगे सर्जना उतनी ही श्रेष्ठ होगी। अच्छी भावभूमि पर विभिन्न रसों का रसायन भी प्रभावशील होगा।

प्रस्तुत कविता का प्रारम्भ एक प्रश्न से है। "मैं क्या हूँ"? प्रश्न खुद का, खुद से, खुद के लिये और देखा जाय तो उत्तर के एकदम निकट ही खड़ा है। उत्तर भी कविता ही देती है-"बच्ची हूँ।" सीधे से प्रश्न का दो सहज से शब्दों का उत्तर। लेकिन कविता ने इस नि:सार सार के लिये जन्म नहीं लिया है। प्रश्न से उत्तर तक पहुँचने के लिये मॉकड्रिल की गई है। एक सौम्य सहजता के साथ काव्य के सृजन के मनोरम उद्देष्य तक बहुत सरलता से पहुँचा देती है। 
मेरी नजर में उत्तर तक पहुँचने के दो रास्ते हैं। एक लौकिक और दूसरा आध्यात्मिक। लौकिक अर्थों में भरपूर सौंदर्य है और आध्यात्मिक पथ में देहात्मभाव से ऊपर उठ कर आत्मा का निराला प्रकाश देदिप्यमान दिखाई देता है। 
लौकिक दृष्टिकोण से कविता कहती है मैं रिश्तों के बन्धनों से परे जो हूँ मैं उस ईश्वर की प्राकृत सृष्टि की तरह सहज, सौम्य, सरल, प्रवाहमय और कान्तिमान हूँ। याद आता है कालिदास का मेघदूतम् जिसकी नायिका का सौंदर्य प्रकृति के नैसर्गिक सौंदर्य के उपमानों से समृद्ध होता है। यहाँ बच्ची भी उसी तरह नायाब है। शायद अनजाने में ही कविता की बच्ची में प्रकृति स्वयं अवतरित हो गई है।
कविता की सुन्दरता यह है कि सम्पूर्ण यात्रा में कोई पूर्वाग्रह नही है न ही किसी बड़े सैद्धान्तिक पृष्ठभूमि की इसे जरूरत है। वह "एक बच्ची" मन्दिर में गूँजते नाद और मस्जिद में उभरते स्वरों में विलक्षण समरसता का अनुभव करती है। पक्के घड़े के रंग कुम्हार के होंगे पर कच्चे घड़े में मिट्टी का नैसर्गिक रंग है। यह विशुद्ध अध्यात्म है। दिया, घड़ा, सुराही आकृतियाँ से जानी जाती है पर सब की एक पहिचान मिट्टी है। कहती है---
एक नन्ही सी परी हूँ 
यह सर्वोत्कृष्ट कृति है 
ईश्वर की इस धरा पर 
जी हाँ/ "बच्ची"। और/
यह बच्ची मौजूद है/ मुझमें 
इसलिए तो मैं, "मैं" हूँ 
वरना मात्र एक देह हूँ
कविता "मैं" अर्थात् अस्मिता तक ले जाती है। काया से उस अक्षुण्ण रूह की कान्ति तक ले जाती है। समग्र कविता की सादगी मनहर है। उसकी लघुता में विलक्षण गुरुता है। 
रचना में माधुर्य और प्रासादिक गुण होने से पाठक को गुदगुदाती है।
महसूस करो!

रामनारायण सोनी
१५.०२.२०२०

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