हिन्दी कविता की समीक्षाएं

Friday, 14 February 2020

समीक्षा २८

समीक्षा २५

एक कविता "शब्दवट" राष्ट्रीय-काव्य संग्रह से।
यह काव्य-संग्रह साहित्य एवं "संस्कृति परिषद् वनाञ्चल" के शब्द रूपी वट की घनेरी छाया तले राष्ट्रीय, आंचलिक और प्राचीन-अर्वाचीन हिन्दी साहित्य के रचनाकारों के सृजन से सुसज्जित हैं। शब्दवट के परिचयात्मक पृष्ठ में अंकित प्रबन्धक मण्डल में छ्ह, जी हाँ छह डॉक्टर्स और  दो ग्राउण्ड झीरो के उत्कृष्ट समाजसेवी हैं। फलतः शब्दवट की गुणवत्ता उच्चस्तरीय हो गई है। शब्दवट के आवरण पृष्ठ का चित्रांकन प्रबन्धक मण्डल की सदस्या भारती जी सोनी ने किया है। मुझे बचपन याद आता है। याद है गाँव के ओंकार कुण्ड के पास खड़े उस वट के तनों से लटकती उसकी वे जड़ें। इन जड़ों को पकड़कर झूला झूलते किलकते वे साथी बच्चे भी याद हैं। शाम सुबह जहाँ रक्तकंठी तोते चिटिर पिटिर की आवाज करते समवेत हो जाते थे। इस "शब्दवट" में उसकी सुखद प्रतिच्छाया दिखाई दे रही है। इसकी पुष्ट जड़े नये तनों का प्रतिमान हो चुकी हैं। सच मानें तो एक विशाल वटवृक्ष कई वटवृक्षों का समवेत स्वरूप होता है। मुझ जैसी अबल बेलें भी जिसका सहारा लेकर ऊपर चढ़ जाती हैं। हम कृतज्ञ हैं इस शब्दवट के।

पुस्तक के २५वें पृष्ठ पर टँकी एक कविता है "थावरिया! उस रोज मिले तुम"। डॉ मुरलीधर चाँदनीवाला इस सर्जना के शिल्पकार हैं। शब्दवट के वे परिपुष्ट स्तम्भ हैं। वे सफल शिक्षाविद् हैं। वेदों की ऋचाओं का काव्यानुवाद कर उन्हें जन-जन तक पहुँचाना उनके जीवन की आत्यन्तिक उपलब्धि है। वे हिन्दी साहित्य के सहृदय उपासक हैं। वेदों की ऋचाएँ उनसे बतियाती रहती हैं।
उनके सृजित कृतीत्व और उनके व्यक्तित्व पर कुछ लिखना मेरा दुस्साहस ही है पर इस धृष्टता के लिये मैं उनका क्षमा प्रार्थी हूँ। आशा करता हूँ कि वे इस आलेख को आशीष प्रदान करेंगे।

🔥एक कविता...
                                
             "थावरिया ! उस रोज मिले तुम"
              ______________________
                          थावरिया !
                     उस रोज मिले तुम
                         भगोरिया में 
                  तो तुमने अपना इतिहास 
                 खोलकर रख दिया सामने।
 
                       पहली बार जाना
           कि अथर्ववेद तुम्हारे भीतर से उगा
                   और सारे तीज-त्यौहार
                तुम्हारे घर से चलकर पहुँचे 
                          महानगरों में।

                     पहली बार जाना कि 
                 हरज्यो-धोंणी, फूलड़ो, छुड़ी
                          और टिपका 
                    समन्दर पार घूम आये,
               भिल्ल और किरातों की सेना  
                   रामायण-महाभारत में 
        खड़ी दिखाई दी अत्याचारों के विरुद्ध, 
               एकलव्य दिखाई दिया वहाँ, 
       निषाद के पदचिह्न अंकित दिखाई दिये।

        पहली बार सुने तुम्हारे मुँह से यातुगीत  
            और उनमें भरे पड़े दिखाई दिये
               तीर-कामठी और कुल्हाड़े,
           पहली बार देखा तुम्हारी आँखों में 
               गणेह मंडोळ का वह चेहरा
        जो सभ्यता का प्रथम पूज्य है अब भी,
                ढंढुकाळ के किस्से सुनकर
          मुझे नींद नहीं आई कई दिनों तक।

            पहली बार देखा भिलोड़ी गरबा
                'सुना रूपा नो से गरबो रे
                    सालों जोवा रे जायें '
          भीलांगनाओं की घुटी हुई आवाज 
                 नाचती हुई सी लगती,
                    और वह गवरी ?
          भोपा की ढब भुलाये नहीं भूलती,
                  मांदळी की थाप पर 
                 गोल-गोल घूम जाती 
              लाल लुगड़े में कोई लुगाई।

                         थावरिया !
                   वे टापरे याद आये ,
                   वे गोदने याद आये ,
                   आँखों में तैरते रहे 
               स्वर्गलोक गये परिजनों के
                      प्रस्तर-स्मारक
             जो गाँव में हमेशा जीवित हैं ,
                 वह रावळा याद आया ,
        भिलट बावा का ऊटळा याद आया,
                 याद आया टंट्या भील , 
         याद आया मौज-मस्ती का दिवासा
         और फिर तुम बार-बार याद आये।

               🍁डॉ मुरलीधर चाँदनी वाला
                     रतलाम, मध्यप्रदेश

मेरी नजर में

कविता व्हेनसांग अथवा फाह्यान की तरह आदिवासी के वनाञ्चल में यात्रा पर निकलती है। वहाँ उसे थावरिया मिल जाता है। थावरिया एक पात्र है जिससे यह कुछ पूछती है। प्रश्न जो भी रहे हों पर उत्तर बहुत रोचक हैं। हमें परिचय कराते हैं एक संस्कृति से, जन-जीवन से उनकी व्यथा कथा से। 
कविता की पंक्तियॉं परिचय कराती है कि--
अथर्ववेद की ऋचाओं का प्राकट्य भी वनस्थलियों में ही हुआ। त्यौहारों की पावन परंपराएँ वहीं जन्मीं और उनमें अधिक विकृति न होने से उनका मूल स्वरूप आज भी मौजूद है। भगोरिया उसका ज्वलन्त उदाहरण है।
पहली बार जाना कि 
हरज्यो-धोंणी, फुलड़ो, छुड़ी
और टिपका
समंदर पार घूम आए,
"भिल्ल और किरातों की सेना 
रामायण-महाभारत में 
खड़ी दिखाई दी अत्याचारों के विरुद्ध, 
एकलव्य दिखाई दिया वहाँ, 
निषाद के पद चिन्ह अंकित दिखाई दिये 
पहली बार सुने तुम्हारे से यातुगीत 
और उनमें भरे-पड़े दिखाई दिए 
तीर-कामठी और कुल्हाड़े'

आदिवासियों के आख्यान और मिथक, उनकी परम्पराएँ बीते युगों की कहानी तो कहती ही हैं, बल्कि उनकी संस्कृति और बौद्धिक प्रासंगिकता भी बयान करती है। उनकी कलात्मक अभिव्यक्तियाँ, नैसर्गिक चेष्टाएँ और अनुष्ठानिक क्रियायें मात्र मनोरंजन नहीं वरन् उनकी पूरी जिन्दगी का अटूट हिस्सा होती है। आदिवासी जन जीवन की आधारशिला उनकी परम्पराएं हैं। ये परम्पराएँ अलिखित संविधान है कबीलों का, वनजनों-गिरिजनों का। समाज-संस्कृति का नियमन भी वहीं से होता है। अनुशासन और मानवयी संबंध उस की छत्रछाया में पुष्पित-पल्लवित होते हैं|
यह विडम्बना ही है कि तथाकथित सभ्य समाज जनजातीय और गैरजनजातीय संस्कृतियों के पार्टीशन की बात करता है। चातुर्वर्ण्य सृष्टि में जनजातीय समाज का हमने स्थान तय नहीं किया और इस वर्ग विभेद के कारण हम से उनका तादात्म्य स्थापित नहीं हो पाया। जबकि रामायण और महाभारत कालीन संदर्भों में वे जनपदों के साथ खड़े दिखाई पड़ते हैं। परन्तु वहाँ भी वर्णव्यवस्था में स्पष्ट संकेत अनुपलब्ध है।
कहीं न कहीं एक विभाजन की लकीर सदैव दिखाई पड़ी। जैसे भीम ने हिडिम्बा से विवाह किया पर उसे राजप्रासादों में नही लाया गया। घटोत्क्च और बर्बरीक भी वनस्थली में ही रहे। गुरु द्रोण ने एकलव्य का अँगूठा दान में ले कर जनजातियों से अन्याय ही किया।

पहली बार देखा तुम्हारी आंखों में 
गणेह मंडोळ का वह चेहरा 
जो सभ्यता का प्रथम चेहरा 
जो सभ्यता का प्रथम पूज्य है अब भी,
ढंढुकाळ के किस्से सुनकर 
मुझे नींद नहीं आई कई दिनों तक।

एक संरिप्त
पहली बार देखा भिलोड़ी गरबा 
सुना रुपा नो से गरबो रे 
सालों जोवा रे जाए।
भीलांगनाओं की घुटी हुई आवाज 
नाचती हुई सी लगती,
और वह गवरी 
भोपा की ढब भुलाए नहीं भुलती,
मांदळी की थाप पर 
गोल-गोल घूम जाती 
लाल लुगड़े में कोई लुगाई।
थावरिया! 
वे टापरे याद आए,
वे गोदने याद आए, 
आंखों में तैरते रहे 
यमलोक गए परिजनों के 
प्रस्तर-स्मारक 
जो गाँव में हमेशा जीवित है,
वह रावळा याद आया 
भिलट बाबा का ऊँटला याद आया 
याद आया टंट्या भील, 
याद आया मौज-मस्ती का दिवासा 
और फिर तुम बार-बार याद आए
ध्यान से उन शब्दों को पढ़ कर देखें जैसे माँदल, लुगड़ी, टापरे, गोदना आदि उत्सव और जनजीवन में प्रयुक्त होने वाले साधन साध्य आदि हैं। भीलांगनाओं की घुटी आवाज की रसात्मकता तो मन को आन्दोलित कर देती है।
मैं ऐसा इसलिये कह पा रहा हूँ कि में झाबुआ जिले में ४वर्षों तक रहा हूँ और (दोनो जिलों) के देहाती क्षेत्रों को करीब से देखा है।

कविता की यात्रा भीली वनाञ्चल की ड्रोन यात्रा है। वह संवेदी केन्द्रों पर ठहरती है और संपूर्ण प्रान्तर की कॉमेन्ट्री जसदेव सिंह की तरह सुनाती/दिखाती है। वहाँ की संस्कृति की सुवास से वह भी सुगन्धा हो गई है। रचना अत्यन्त प्रभावी और मर्मस्पर्शी है। 
यदि शोधार्थी झाबुआ आलीराजपुर के अन्तप्रदेश में जावें तो यह कविता उन्हें शोध के वाइड-विजन प्रदान कर सकती है। 

रामनारायण सोनी

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