समीक्षा २४
एक कविता, "मैं दर्पण हूँ, भारती सोनी, झाबुआ की। उनकी एक अन्य कविता की इसी स्तम्भ के अन्तर्गत चर्चा की गई थी, में संक्षिप्त परिचय दिया जा चुका है।
मैं दर्पण हुँ
मैं दर्पण हूँ
केवल मुझमें मेंरा
स्वरूप ही प्रतिबिम्बित नही होता
मेरे भाव...मेरा रुदन...मेरी खुशी
मेरा जीवंत होना
भी दिखता है मुझ जैसा।
फिर मैं उसी आवरण को
और भी श्रृंगारित करती हूँ
ताकि वही दिखूँ जो चाहती हूँ
बहुत खूबसूरत है ज़िन्दगी
उम्र और चिंता ने
कभी सोचा भी नही होगा
कि आज भी उस बचपन की झलक
इस दर्पण में मुस्कुराती है....
जो ज़िद भी करती है प्यार से,
कभी कभी रोती है किसी आस से,
बेफिक्र सी दौड़ती हुई
उन्नत खुले आकाश में..
जहाँ विचारों का कोई ठौर नही
सबके सब स्वतंत्र है
वहाँ बिना किसी स्वार्थ से
मैं दर्पण हुँ, मैं दर्पण हुँ
भारती सोनी
लोगों के गले टँगे आइने मिलते है वे कहते हैं इसमें देखो तुम कैसे लगते हो? इस आईने को घर जाने पर दीवार पर टाँगते हैं और निहारते हैं।
"तेरी ख़ुशी की जो वज़ह है
ध्यान से देख! वो आइने में है।"
आइने मे खुद को देख कर खुश हो रहे हो पर जो तुम्हे दिख रहा है वह मात्र देह यष्टि और लिबास है। इससे भी बड़ा सच यह है कि कुछ चतरे लोग मुखौटा लगा कर आइने के सामने खड़े हो जाते है और आइने से रौब से कहते हैं "मेरी तारीफ़ कर"। लेकिन तुम्हारे अन्तःकरण को दिखाने वाला कोई बाहरी आइना नही तुम खुद ही हो। उसे देखने के लिये अन्तर्यात्रा करनी होगी।
मेरी पुस्तक "जीवन संजीवनी" का अंश...
टूटे हुए आईने में आप भी कई टुकड़ों टुकड़ों में दिखाई देते हो । जितने टुकड़े उतने टूटे मुखड़े, टूटे हाथ-पैर। आप समझने लगते हो कि आप टूट गए हो। अपने आप को संभाल-संभाल कर देखते हो कि कहीं वास्तव में मैं टूट तो नहीं गया हूँ। आईना जोड़ने में मत लग जाओ वरन एक साबुत आइना तलाशो। जहाँ आप पूरे दिखोगे। आईने की विकृति अपने ऊपर मत ओढ़ो। आईना ही आपको अपना चेहरा दिखाने में सक्षम है। इसी तरह जिन विचारों में आप स्वयं ही टूटे हुए दिख रहे हो उन्हें त्याग दो। नए आइने की तरह नए विचारों का आह्वान करो।
आपका समूचा व्यक्तित्व, आपके अपने विचारों का ही प्रतिफल है।
"मृग की नाभि मह कस्तूरी बन बन फिरत उदासी।"
मोहे सुन सुन आवै हाँसी।
कविता में रचनाकार को ऐसा मृग मिल गया है जिसे अपने भीतर कस्तूरी का पता चल गया है। दर्पण का आलंबन ले कर वह अपने महमहाते बाल जीवन की खुशबू लेती है। यह रेगिस्तान की चिलचिलाती गर्मी में जीवन की तृषा बुझाने के लिये दौड़ते हिरणों के लिये एक पावन संदेश है। अपने खुद के इस दर्पण में स्वरंजित भावनाएँ, सुख दु:ख के लटपट अनुभव, और खुशियों के खजाने आदि के इन्द्रधनुषी रंग भरे पड़े हैं। इस दर्पण में आभास करके देखो कि तकलीफों का बीत जाना भी आज एक अतिरिक्त सुखानुभूति जगाता है।
खुली आँख से जो दिखता है वह तो देखते ही रहते हो थोड़ा सा आँख को बंद कर भी देख लो। हम सब के पास अपना खुद का एक एक दर्पण है। देख सकते हैं और उन पलों को जीवन्त बना कर वर्तमान में उन्हें जी भी सकते है। उनमें कल के वे "नौ रस" आज के "नव रस" हो सकते हैं। अकेले में, एकान्त में आप अकेले नही होंगे। हो सकता है कि अनचाही बेतुकी भीड़ आस पास होने पर ऐसे समय में भी आपका यह दर्पण आपकी आपसे मेलजोल बढ़ाता है। यह अद्भुत दर्पण आवरण भी दिखाता है और अन्तस के राजमन्दिर का इन्टीरियर भी दिखाता है। कविता समष्टि और अन्तःकरण को बखूबी साथ ले कर चलती है।
दर्पण कहता रहता है, "मैं दर्पण हूँ, मैं दर्पण हूँ। आपका हमराज, आपका हमसफर, आपका राजदार। आप के लिये मैं आकाश की तरह खुला हूँ, धरती की तरह विश्राम दायक हूँ, जल की तरह स्निग्ध भी हूँ। यादों की तिजोरी हूँ मैं। ध्यान रहे! मैं कभी मैला न होऊँ अन्यथा वह सब नहीं दिखा सकूँगा जिसकी मुझसे अपेक्षा है।
कविता अपने सफ़र में कामयाब है। थोड़े से शब्दों में भावों का विशाल वैभव समाहित है। कविता की सशक्तता इतनी है कि पढ़ते पढ़ते हमारे हाथ में हमारा दर्पण आ जाता है। कविता चलती रहती है नेपथ्य में और अपने रंगमंच के स्वसाक्षी हो गए।
ऐसी रचनाएँ कालजयी होती है जो आत्मसाक्षात्कार कराती हैं और आत्म मन्थन के अवसर प्रदान करती है।
साधुवाद
रामनारायण सोनी
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