हिन्दी कविता की समीक्षाएं

Tuesday, 11 February 2020

समीक्षा २३

समीक्षा २३

"ये पूरी शाख तेरी है घरोंदा क्यू बनाता है।"

जहाँ मर्ज़ी हो तेरी आशियाँ तू डाल तन डेरा 
खुला आकाश है फिर व्यर्थ में करता है क्यू फेरा 
कभी इस शाख पे झूमो कभी उस डाल पर नाचो 
सुनहरा पृष्ठ जीवन है इसे चाहे जहाँ बाचों 

परिधि तो जटिल इन बन्धनों का नाम दूजा है 
शिवाला तुम कहो या हम कहे की कोई पूजा है
घरोंदों की कहानी में अकेला पन छलकता है 
परिधि में मनुज की बंधना का छल झलकता है

अगर ओढा हुआ आकाश हो तो सोच बदलेंगी 
धरा भी रूप आंगन में कही तो दृश्य बदलेगी ।

अखिल आकाश तेरा हो तो फिर से सोच बदलेगी।
धरा हो धाम तेरा तो यही परिदृष्य बदलेगी।
तुझे एहसास होगा जब कभी उस सृष्टिकर्ता का
सुखों की ओर जीवन की तेरी यह धार बदलेगी।

कभी अन्हभूत कर कम्पन वो नीले छत्र धारी का
अभी तू छोड़ दे गुणगान करना विष कटारी का 
धरा पे गीली माटी का ये लौंदा क्यू बनाता है ।।
ये पूरी शाख तेरी है घरोंदा क्यू बनाता है ।

जय वैरागी 

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मेरी नजर में

धरा पे गीली माटी का ये लौंदा क्यूँ बनाता है।
ये पूरी शाख तेरी है घरोंदा क्यूँ बनाता है।।

पंक्तियाँ सीमित से विराट की यात्रा है, स्वयं को एक पोखर से सागर की ओर चलने को कहती है, विचारों और हौसलों की उड़ान भरने को कहती है। कविता समस्त को आत्मानुभव में लाने का कहती है वहीं वह उस सृष्टिकर्ता की सर्वहारा अनुकम्पा का बोध कराती है। धरा को आंगन और आकाश को ओढ़नी बताने वाली कविता अपनी वसुधैव कुटुम्बकं की साध पूरी करती है। घरोंदो की कहानी में अकेलापन महसूस करने वाली कविता सशक्त संगठित समाज में सम्मिलित रहने को कहती है। 
कविता की विशेषता यह है कि वह जगत और जगदीश को साथ लेकर चलती है। यह वैरागी जी का अनोखा वैराग्य है। जीवन दर्शन के मर्म को रेखांकित करती पंक्ति "सुनहरा पृष्ठ जीवन है इसे चाहे जहाँ बाचों" जिजीविषा की ओर संकेत करती है। 
"परिधि तो जटिल इन बन्धनों का नाम दूजा है 
शिवाला तुम कहो या हम कहे की कोई पूजा है।"
परिधियाँ सीमा रेखाएँ हैं। परिधियाँ अपनी अपनी बनाई हुई हैं। आदमी का बस चले तो आकाश को बाँट ले, सागर को टुकड़े टुकड़े कर ले, हवा के आयतन सीमित कर रे। कबीर दास कहते हैं--
हद हद करते सब गये,
और बेहद गयो ना कोय
अनहद के मैदान में,
रहा कबीरा सोय।
हद में रहकर के सब लोग दुनिया से चले गये, कोई भी बेहद नहीं गया। हर किसी की हद अलग अलग है। हद जात-पाँत की, धर्म की, मंदिर-मस्जिद की, ऊँच-नीच की, भाषा-भेष की। कबीर साहब अनहद के मैदान में रहते है। वह जो असीम है, विराट है, अनन्त है वह ही पूर्ण है। 
कवि की पंक्तियाँ कबीर की तरह विराट के दर्शन कराती है। और यह पुनः पुनः स्मरण कराती है कि परमात्मा और उसकी सृष्टि का स्पन्दन महसूस करें और आनन्द में रहें।*

रामनारायण सोनी

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