हिन्दी कविता की समीक्षाएं

Saturday, 8 February 2020

समीक्षा १८

समीक्षा १६

एक दोहे में प्रच्छन्न औपनिषदेय चिन्तन।

"टूटी सब मदहोशियाँ स्वप्नों की झंकार।
हम जो जागे नींद से जागी अन्तर्धार।।"

                डॉ जय वैरागी

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मेरी नजर में

जागा कौन है और कौन है सोया?
क्या जागे हुए व्यक्ति का अर्थ है कि वह जो सोया नहीं है अथवा जिसे नींद नहीं आई हो? या कि जिसके स्वप्न टूट गये हों? 
क्या सोए हुए व्यक्ति का अर्थ है कि वह जो जाग नहीं रहा है? या जिसे नीद आ गई है? या कि जो जिसको किसी प्रकार का कोई स्वप्न नजर नहीं आ रहा है?
एक तीसरी स्तिथि भी है सोने और जागने की संधि पर जो खड़ा है अर्थात् जो अभी जागने और सोने को बराबर अनुभव कर रहा है। यह अवेयरनेस है।
असल में "जागना" ही वर्तमान में रहना है। जागा हुआ केवल वह है जो केवल वर्तमान में चल रहे समग्र घटना क्रम का दृष्टा है, सजग है। जागा वह है जो व्यर्थ की उलझनों की भूल भुलैया से बाहर है। वह जो भविष्य के अंधेरे कुएँ में सुई जैसी को चीज़ ढूँढने में व्यस्त नही है। वह भी जागा हुआ नही है जो अतीत के महासागर की किसी अतल गहराई में बिन मोतियों की सीपयाँ ढूँढने में लगा हुआ है। 
जो जागा हुआ है वह मूर्छा से बाहर है। जो जागा है वह भीतर से बाहर देखता है, अपनी अन्तर्दृष्टि से देखता है। जो अन्दर भी होश में है और बाहर भी होश में है, जिसकी मूर्छा पूरी तरह टूट गई है वही जागा है। यह टोटल अवेयरनेस है।
नींद से बाहर होना और मूर्च्छा से बाहर होना अलग अलग बात है। जागते हुए वर्तमान में न होना मूर्छा ही है लेकिन सोते हुए को मूर्छा नहीं हो सकती। मूर्छा का टूटना स्वप्नों का अभाव ही है। स्वप्न वह है जो सत्य नही हैं, जो नित्य नही है। जो नित्य है केवल वही "सत्य" है। हमारी जाग्रति अपनी अन्तर्धारा की जाग्रति है।
वस्तुतः वास्तविक जागरण तो अपनी चेतना की अन्तर्धारा का स्फूर्त होना है। अन्तर्धारा के मूल में अन्तश्चेतना का वैभव सन्निहित है।
दो पंक्तियों मे औपनिषदेय चिन्तन की झलक मिलती है।
एक राजा रात्रि में सुखपूर्वक राजमहल में सो गया। उस ने स्वप्न में देखा कि दूसरे राजा ने उस पर आक्रमण कर दिया और उसे जीतकर देश निकाला दे दिया। वह जंगल-जंगल मारा फिर रहा है। भूख-प्यास, सर्दी-गर्मी से बदहाल है। परन्तु जैसे उसकी निद्रा भंग हुई उसके अपार दुःख का अंत हो गया। निद्रा खुलते ही वह अपने को राजमहल में सोने के पलंग पर देखकर प्रसन्न होता है। 
मूर्छा में व्यक्ति स्वस्वरूप को ही भूल जाता है। किन्तु बोध होते ही क्या होता है ?
अनादि मायया सुप्तो यदाजीव: प्रवुध्यते।
अजमनिद्रमस्वप्नमद्वैतंवुध्यते तदा।। माण्डूक्य कारिका।।
अनादि अविद्या में सोया हुआ जीव जब जागता है, तब निद्रा तथा स्वप्न से रहित एवं तीनों गुणों से रहित अपने स्वरूप का साक्षात्कार करता है। यह अन्तर्धारा की जाग्रति है। गीता इस जाग्रति को ज्ञान कहती है।
"ज्ञानं लब्ध्वा परां शांतिमचिरेणाधिगच्छति"
---- श्रीमद्भगवद्गीता

डॉ जय वैरागी के इस एकल छ्न्द (दोहे) में प्रच्छन्न है उपनिषद् के संदेश की आहट प्रतीत होती है। 
साधुवाद

रामनारायण सोनी


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