हिन्दी कविता की समीक्षाएं

Wednesday, 5 February 2020

समीक्षा १५

समीक्षा १३

एक कविता कृष्णलाल गुप्ता जी की। वे संस्कृत और हिन्दी विषयों में स्नातकोत्तर हैं। श्रेष्ठ अध्यापक रहे हैं, श्रेष्ठ साहित्य सृजक और समाज सेवी हैं। प्रस्तुत कविता 31 मनीषी कवियों के साझा प्रकाशन "काव्य सुरभि" में पृष्ठ क्रमांक 34 पर प्रकाशित हुई है। इस कृति के संपादक भी स्वयं कृष्णलाल जी गुप्ता ही हैं।

*"ईश्वर की अनुभूति"*

       १
कली का खिलना 
उसका फूल के रूप में उभरना 
और सुगंध बिखेरना 
ये सब 
फूल के अस्तित्व का बोध ही नहीं 
परमात्मा की उपस्थिति का संकेत भी है 
हम उसे तलाश सकते हैं 
फूलों की बगिया में, 
पेड़ों पत्तों में भी 
तो आओ 
उसे तलाशें 
       २
जुगनुओं की चमक 
इंद्रधनुष की सतरंगी शोभा 
परिंदों की चहचहाट 
पेड़ों पौधों की हलचल 
इन सब में छिपा है 
वह विराट रूप 
ईश्वर/अल्लाह/परवर दिगार 
कई नाम है उसके 
देखने के लिए वैसी निगाह चाहिए।

कृष्णलाल गुप्ता
🌹🌹🌹🌹🌹🌹

मेरी नजर में

कभी वट वृक्ष के बीज को काट कर देखना और  खुर्दबीन से ढूँढने की कोशीश करना कि उसमें वट वृक्ष के पत्ते, फूल, फल दिख जाएँ। परन्तु निश्चित रूप से वह नही दिखेगा। इसी बीज को बोया जाय, उसे हवा पानी और प्रकाश मिले तो उसमें अंकुरण होता है। बीज वृक्ष के रूप में परिणित हो जाता है। इस समस्त प्रक्रिया में तुम माली हो सकते हो पर तुम अपनी संपूर्ण शक्ति लगा कर भी इस बीज को वृक्ष नही बना सकोगे। हमने ऐसा ही सब कुछ रोज देखा है पर यह कभी जानने का शायद प्रयत्न नहीं किया कि वह कौन है जो अदृष्य रूप से लगा हुआ है इस बीज से वृक्ष बनाने में। कोई क्षण ऐसा नही है जब उसमें विकास नही हुआ है। तुम बो कर सो गए हो पर कोई है जो निरन्तर जाग रहा है और इस सम्पूर्ण रूपान्तरण को अंजाम देने में लगा हुआ है। किसने देखा है उसे और हाँ, देख भी नही सकेगा। बीज जो वृक्ष बन गया, विकास उसका ही हुआ है, अंकुर फूटा, पत्ते आए, शाखाएँ फूल और फल आए। उसने भी नही देखा कि कौन है जो उसे जड़ वस्तु से उसे चेतन की सत्ता में ले आया। न माली समझ पाया न बीज। याने उसे इतना तो याद है कि वह कभी बीज था और अब एक सम्पूर्ण वृक्ष। परन्तु वृक्ष होते ही बीज का अस्तित्व बोध भी जाता रहा। इस समस्त घटना में केवल संकेत मिलता है कि वह शक्ति सदैव यहीं उपलब्ध है जो उसे इस स्थिति तक ले आई। हर क्षण में हर घटना के मूल कारण में उसकी सत्ता का संकेत विद्यमान है। हमे इस तथ्य को और संकेतों की तलाश करनी चाहिये। 
यह तय है कि कारण के बगैर कोई कार्य नही होता। नदी में बाढ़ आयी है तो कहीं पानी बरसा ही है या किसी बाँध की कोई नहर खुली ही है, लोहा गर्म है तो किसीने तपाया ही है, जीवन है तो जन्म हुआ ही है। तुमने खा तो लिया है पर उसे आग में पका कर पोषक तत्व जुदा करने वाला कोई तो है। कौन है वह?
अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः।
प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम्।।भगवद्गीता। 15/14।।
 मैं ही समस्त प्राणियों के देह में स्थित वैश्वानर अग्निरूप होकर प्राण और अपान से युक्त चार प्रकार के अन्न को पचाता हूँ।।

गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा।
पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः ।।15.13।।
मैं ही पृथ्वीमें प्रविष्ट होकर अपनी शक्तिसे समस्त प्राणियोंको धारण करता हूँ; और मैं ही रसमय चन्द्रमाके रूप में समस्त ओषधियों-(वनस्पतियों-) को पुष्ट करता हूँ।

सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च।
वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो
वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम्।।15.15।।
यह अनुभूति परोक्ष है परन्तु हमें जरूरत है उस की ही अपरोक्ष अनुभूति की। चारों ओर संकेत बिखरे पड़े हैं जो उस परम सत्ता को अनुभूत करने का। तलाश होना चाहिये हमें हर दम उसकी अपरोक्ष अनुभूति की। गुलाब को गुलाब कहो या रोज़ या कोई अन्य नाम से पहचानो उसके न गुण बदलेंगे न सुगन्ध। उस सत्ता के गुण वे ही हैं और प्रभाव भी वैसे ही हैं। 
प्रस्तुत कविता सहज शब्दों और सरल रूपकों के माध्यम से जीवन दर्शन के मूल्यों की समझाइश देती है और उस विराट की परम सत्ता की परोक्ष अनुभूति के माध्यम से इस तरह परिचय कराती है कि जैसे प्रत्यक्ष अनुभूति हो रही हो। एक प्रज्ञापूर्ण विहंगम दृष्टि चाहिए जो समस्त व्यष्टि और समष्टि में उस विराट का दर्शन करा सके। 

रामनारायण सोनी
०३.०२.२०२०

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