हिन्दी कविता की समीक्षाएं

Wednesday, 5 February 2020

समीक्षा ३

हमारे मित्र श्री बी. डी. गुहा की एक  भावप्रणव कविता पर दो शब्द

पलकें उठा कर आना, पलकें गिरा कर जाना।

सागर में कितना औदर्य है, गाम्भीर्य है, शील है? जितना सागर बड़ा है इनके उत्तर उससे भी बड़े हैं। किनारों का सामान्य अर्थ है कि इस हद में पानी आ कर ठहर जावे लेकिन विपुल जल राशि का स्वामी शक्तिमन्त यह सागर जहाँ आत्म-संयम से खड़ा हो जाता है उसे हम लोग किनारा कहते हैं। यह उसका शील है। वह अपने विस्तार की सीमाएँ स्वयं तय करता है।  इसके ज्वार भाटों और लहरों का उत्पात केवल सतही है लेकिन इसका अन्तर विशाल और शान्त है। यह अनन्त जीवों की शरण स्थली है। इस तरह इसकी अतल गहराइयाँ इसका गाम्भीर्य है।
"पलकें उठा कर आना, पलकें गिरा कर जाना" इस कविता का चर्मोत्कर्ष है। यह सागर का सर्वथा औदार्य है। सागर अपने इस किनारे का धोवन सजगता से करता है पर इस उपकार के बाद भी वह दानवीर कर्ण की तरह नजरें झुका कर लौट जाता है। बहुत सारी नदियाँ इसमें अपना जल उँडेलती है पर उन्हे आत्मसात कर लेना औदार्य है। किनारे सागर की तुलना में कितने क्षुद्र है परन्तु उनका स्वाभाविक सहज बन्धन स्वीकारना सागर को महिमा प्रदान करता है।
कविता में सागर के गुण समाहित हैं।

रामनारायण सोनी

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