हिन्दी कविता की समीक्षाएं

Wednesday, 5 February 2020

समीक्षा ४ (प्रतिक्रिया सहित)

एक सुन्दर कविता आदरणीया डॉ सीमा शाहजी की। आप शास. महाविद्यालय, थाँदला में हिन्दी विभाग में प्राध्यापक हैं और कई प्रादेशिक तथा राष्ट्रीय स्तर के सम्मानों से विभूषित हैं।
क्रिया प्रतिक्रिया के साथ प्रस्तुत हैं। व्हाट्सएप पर। दिनांक ०९.१०.२०११

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माँ

रसोई में चूल्हे पर
रोटियां सेंकती 
मेरी माँ का 
लाल लाल 
दमकता चेहरा 
मुझे साहस मेहनत 
विश्वास देता है

अंधेरों में
टिमटिमाती ढिबरियों में
मेरी माँ की
चमकती दो आंखे 
टपरियो में आने वाले 
तूफानों के 
आघात व्यवघात से 
भय मुक्त होने का 
मुझे आश्वासन देते हैं ।

कुत्ते भौंकते है 
बिल्लियां लड़ती है
ताले टूटते है 
चीखें हवाओं में तैरती है
नदियां लाल होती है 
आकाश फटता है 
धरती रोती है
मेरी माँ के चौकन्ने कान 
हरदम मुझे चौकस 
कर देते है

ह्रदय के अंतः स्थल पर 
मेरे बचपन के डर को
जब वह कस कर दबोच लेती है
स्नेह का बहता अमृत
एक पुष्ट होता संस्कार
मुझे चमकते भविष्य का
आभास देता है

परिवार के किनारों को
सुघड़ता से संवारते 
मेरी माँ के सधे हुवे ठोस हाथ 
उसकी कसी हुई मुट्ठियाँ
उत्ताल तरंगों में
कुछ न कुछ 
करने की तमन्ना 
मुझे 
विराट सत्य से स्थापित होने के 
तादात्म्य को 
सायास 
ऊर्जा किरणों का 
समास देती है

    डॉ सीमा शाहजी
    थांदला जिला झाबुआ

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मेरी नजर में

*"माँ, मातृत्व और बच्चू"*
माँ कृतित्व पुषार्थ और सर्मपण का औदार्य ओढ़े पदों में अल्फाजों की कमी पर भावों की गहनता है। लाल लाल दमकता चेहरा चेहरे का रंग नहीं है वस्तुतः वह सेवा के हृदयस्थ भावों की तड़ित है, चमक है। "टिमटिमाती ढिबरी" जीवन के अनुभवों की प्रौढ़ता है न कि उम्र की सिलवटों में छिपी आँखें। जिसने उम्र भर झंझा झेले हैं वह स्वयं में एक प्रतिमान है। यह कुछ उस तरह का प्रसंग है कि जैसे कछुआ अपने शल्क के आवरण में अनुरक्षित होता है।
माँ के चौकन्ने कानों में अपेक्षित अनपेक्षित ध्वनियों के रिसीप्टर लगे हैं उनका अनुवाद माँ कर लेती है और सावधान कर देती है। स्नेह का झरझर बहता अमृत वास्तव में तो जीवन भर के लिए अखूट आसव है जिसके स्मरण मात्र से हम आज भी ऊर्जित हो जाते हैं। परिवार उसकी धुरी पर वैसे ही चलता है जैसे धरती अपनी कील पर ले कर घूमती है। धरती जो समस्त विश्व को धारण करती है उसे धरती माँ कह कर धरती का नहीं माँ का ही सम्मान होता है। अन्त में मातृत्व की उस विशाल प्रभुसत्ता का उद्घाटन है जिसमें वह उस विराट सत्य के अहोभाव से समृद्ध करने का सामर्थ्य रखती है। अनूठी कविता माँ से अधिक मातृत्व भाव को स्थापित करती है जिसे पढ़ते पढ़ते मैं बच्चा होता जा रहा हूँ।

साधुवाद

रामनारायण सोनी

आदरणीय सोनी जी 
मेरी इस रचना की आपने सिर्फ  समीक्षा ही नही की है । आपने तो इसे पृरी तरह जी लिया है ।चेतना के हर स्तर को  साकार करती है समीक्षा ।जिस जिस लाइन को जिस भावभूमि पर रचा गया आपने वही भाव पुनः समीक्षा में उधृत किया है ।हैरान हूं मैं भी की कैसे एक रचना में इतनी गहराई से कोई उतर सकता है । ।समीक्षा रचना से भी अधिक लाजबाब बन पड़ी है जिसके लिए आभार शब्द बहुत ही छोटा होगा ।

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आदरणीया सीमा जी!
वन्दन!

मैं विद्युत यंत्री हूँ। मैं अपने जीवन में कभी अतिविशिष्ट छात्र नहीं रह पाया। बिजली  एक ऐसा विषय जिसमें जो अदृष्य हो उसका ही अध्ययन है। बिजली तारों में, उपकरणों में,यंत्रों में चलती है किसी को दिख नहीं सकती पर पहचान उसके प्रभाव और परिणाम से स्पष्ट हो जाता है। बाकी सारे विषय साधन से साध्य की ओर जाते हैं। 
आपकी कविता में माँ आपको प्रकट में दिखी है, आप उसको लिखती हैं और एक प्रभाव, परिणाम और वातावरण निर्मित हुआ। जब इस काव्यधारा में मैं पूर्ण मनोयोग से साथ हो लिया तो ही मैं धारा के उद्गम को पहचान सका। ऐसे मैं स्वाभाविक रूप से निश्चेष्ट बह लिया तो वही पर्याप्त होगा। वही यहाँ हुआ है। शब्द के साथ चले तो कविता का स्थूल स्वरूप ज्ञेय होगा और भाव के साथ चले तो चेतना जागृत होगी यह विशुद्ध अध्यात्म है। अध्यात्म शास्त्र पढ़ने से नही आ सकता क्योंकि वह अनुभूति का जागरण है और अनुभूति अन्तस का विकास है। 
अब प्रश्न यह है कि जो माँ आपने लिखी वह माँ मुझ में अनुभूत कैसे हुई। निश्चित रूप से लेखनी वहाँ ले जाने में सक्षम हुई है। यह सही है कि उस माँ को तत्क्षण मैंने जिया होगा तो चेतना वहाँ अनुवृत हुई होगी। 
दूसरा और सबसे बड़ा कारण है कि मैंने अपने बालपन में अपनी माँ को खो दिया; आपकी कविता ने मुझे अपने अबोध अनुभूत शैशव में उतार दिया इसलिये मैं अब आगे नहीं लिख पाऊँगा।
🙏💐🙏💐🙏

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