मेरी सनद है
कुछ सुकृतियाँ,
धरोहर है कुछ भित्तियाँ
जिन पर कीलित है
वे शब्द चित्र
जिन्हें पढ़ता हूँ जब जब
खामोशियाँ बोल पड़ती है
इनमें से एक है...
👍👍👍👍
मैं निर्मल स्रोत निर्झर हूँ भूधर से फूट आया हूँ ।
धुआँ बन कर अगन की भित्तियों से टूट आया हूँ
बहुत उलझन बहुत पीड़ा घनेरी मोह पाशों में
उन्ही कुछ दीर्घ धागों से वहम के छूट आया हूँ
डॉ जय वैरागी
हाथी का बच्चा जब छोटा होता है एक साधारण सी रस्सी उसके पैर में बाँधी जाती है वह बँधा महसूस करता है। यह बन्धन उसके अचेतन मन में पैठ जाता है। धीरे धीरे हाथी बड़ा हो जाता है तब भी वह हल्की सी जंजीर से बँधा रहता है लेकिन अपार शक्ति का स्वामी होते हुए भी वह जंजीर को तोड़ कर मुक्त होने की सोचता तक नहीं। ऐसा इसलिये होता है कि उसका अवचेतन हल्की जंजीर को अटूट बंधन मान कर बैठा है। यही नियम उस आदमी पर भी लागू होता है जो अपने कुत्ते को जंजीर से बाँध कर घुमाने ले जाता है। जंजीर हाथ से छूट जाए और कुत्ता भागने लगे तो आदमी उसके पीछे दौड़ने लगता है। स्पष्ट है कुत्ता आदमी से नही आदमी कुत्ते से बँधा है। यह अवचेतन कमाल का है। विमोह हम ओढ़ते हैं और दोष किसी अन्य को देते हैं। यह खूबसूरत वहम हमारे अवचेतन में अवस्थित हो चुका है। वस्तुतः ये वहम के दीर्घ सूत्र ही अपने अवचेतन से हटाने हैं। ये दीर्घ भी इसलिए लग रहे हैं कि हमने इन्हें दीर्घ मान लिये हैं अन्यथा तो ये सुबह पत्तों पर लगी ओस के जमाव से अधिक नहीं है। भूगर्भ में मौजूद निर्मल शीतल जल को निर्झर बनने में सतह की कुछ पर्तें ही तो अवरोध बनी होती है। फिर यदि निर्झर दृष्यमान है तो तय है कि वह सारे बन्धनों से मुक्त हो चुका है और अपने से आत्म साक्षात्कार कर चुका है।
भारतीय ऋष्य पंरपरा में विचारक जब आत्मचिन्तन के अतिरेक में पहुँचता है तो सूत्र लिखे जाते हैं। उपरोक्त चार पंक्तियाँ सूत्रात्मक हैं। इनका विस्तार करने पर लगता है कि वे प्रकृति और पुरुष के अक्षुण्ण विधान के ही विवेचन है। साधुवाद।
रामनारायण सोनी।
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