एक छोटी सी बड़ी कविता
डाॅ. सीमा शाहजी व्याख्याता, शास. महाविद्यालय, थाँदला, जिला झाबुआ को भारत सरकार संस्कृति मंत्रालय नई दिल्ली ने सीनियर फैलोशिप अवाॅर्ड से नवाजा है। राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में लेखन के अलावा आकाशवाणी के इंदौर केंद्र से भी उनकी कहानियों, कविताओं एवं वार्ताओं का प्रसारण होता रहता है।
प्रेम पगी वह बूँद
"मेरे मनमीत..
उसी प्रेम की एक बूंद को,
छुपाकर रखा था
मैंने सीप के दायरे में,
डुबो दिया था समन्दर की
अतल गहराईयों में,
आज बनकर निकली है खरा मोती..
प्रेम में पगी वह एक बूंद,
और कर दिया है फिर से सराबोर
मुझे तुम्हारे प्रेम की उसी श्वेत चमक में…ll"
डॉ सीमा शाहजी
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मेरी नजर में
"प्रेम में पगी वह एक बूँद।"
हर मोती पहले बूँद ही था पर इस कल्चर में हर बूँद मोती बनेगा इसकी कोई गारंटी नही। फिर बूँद मोती बन भी गया तो संस्कार अधूरा है और भावना के राजपथ पर सच कहें तो सिंगार अधूरा है। कागज के फूलों का सौंदर्य आकर्षित तो कर सकता है पर अन्तस तो सुवास के बिना प्यासा ही रहेगा। धूनी में तपा साधु मैले मन से केवल एक भटकाव से ही गुजरता है वह न दीन का है न दुनिया का।
तप कर पिघले हुए कंचन को एक साँचा चाहिये आकार पाने को अन्यथा ढेले को न तो कंचन कह पाएँगे न आभूषण। साधारण जल की बूँद को नियति का साँचा चाहिये। बूँद का नैसर्गिक स्वभाव है बहना। बहना जिधर ढलान मिल जाए। परन्तु ठहरे बिना कुछ नया न हो सकेगा। तो बूँद की तासीर बदले कैसे? सीपी के गर्भ में बूँद की मौन समाधि लगती है। जहाँ गतियाँ शून्य हो जाती है, जहाँ वह शून्य में आसन जमा कर बैठ जाता है। विराट की गोद वहाँ बस प्रेम का प्रदर्शन नही वरन् वह आत्म-दर्शन है। लगन बस प्रेम की, साध बस प्रेम की, समर्पित हो जाना प्रेम में। अपना सब भूल जाना प्रेम में। बूँद जब मोती बनती है तो अपना मूल स्वभाव छोड़ती है, बूँद अपना नाम तक खो देती है मोती बनने के लिये। बूँद के इस आलम्बन से बात हुई है अध्यात्म की। अपनी मैं का खोना "समाधि" है। अपने अहं का खोना केवल प्रेम में ही संभव है। कबीर कहता है- "सीस दिये पर हरि मिले तो भी सस्ता जान।" सीस देने का अर्थ है मैं का अर्थात् अहं का समर्पण। और हाँ यह तो प्रेम का प्रधान लक्षण है।
इसलिए ए मेरे मन(मीत) प्रेम की इस श्वेत चमक में अवगाहन कर ले। इस बूँद से वह मोती बन।
यह शाश्वत सत्य है कि प्रेम एक पवित्र रुपान्तरण करता है, ट्रान्स्फार्म करता है। जीवन में रसात्मकता जगाता है।
प्रेम करो! बस प्रेम!! विशुद्ध आत्मीय प्रेम!!! ए मेरे मन!!!!
रामनारायण सोनी
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